हावड़ा ब्रिज से जुड़े वो राज़, जिनकी आपको भनक तक नहीं होगी

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Howrah Bridge
Howrah Bridge

Howrah Bridge: क्यों अंग्रेजों ने हावड़ा ब्रिज की चाबी नहीं दी भारत को, क्या है इस चाबी का राज?

Howrah Bridge: कोलकाता के हावड़ा ब्रिज का नाम आपने कई बार सुना होगा, आप में से अधिकतर लोगों ने इस ब्रिज को देखा भी होगा और इसके बारे में बहुत कुछ सुना भी होगा, लेकिन आपने इन रहस्यों के बारे में शायद ही कभी सुना होगा जो आपको आज के इस लेख में जानने को मिलेंगे, जैसे की ब्रिज का ठीक 12 बजे बंद हो जाना, ब्रिज की एक ऐसी चाबी जिसे अंग्रेजों ने आजतक भारत से छिपाकर रखा है, क्यों आजतक हावड़ा ब्रिज का उद्घाटन न हो सका इसके साथ और भी बहुत कुछ।

Howrah Bridge का इतिहास

कोलकाता की हुगली नदी के ऊपर हावड़ा ब्रिज (Howrah Bridge) वर्ष 1942 में बनकर तैयार हुआ था। इससे पहले हावड़ा से कोलकाता आने वाले लोगों के लिए हुगली नदी के ऊपर वर्ष 1874 में सर ब्रेडफोर्ड लेसली द्वारा पीपे के पुल का निर्माण कराया गया था। इस पुल की उस वक्त लागत थी 22 लाख रुपये और इसकी लंबाई थी 1528 फीट, वहीं इसकी चौड़ाई थी 62 फीट।

अब सवाल ये है कि जब हुगली नदी के ऊपर पहले से ही एक पुल था तो क्यों इसकी जगह पर दूसरे पुल यानी की हावड़ा ब्रिज (Howrah Bridge) को बनाने की जरूरत आन पड़ी। दरअसल जब हुगली नदी के रस्ते कोई भी जहाज गुजरात जाता था तो बीच से इस पुल को खोलना पड़ता था ताकी जहाज आगे जा सके।

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इसके बाद वर्ष 1906 में हावड़ा स्टेशन बना, इस स्टेशन के बनने से पुल में काफी भीड़ होने लगी और साथ ही जब जहाज को पुल के नीचे से पास कराना होता था तो बीच से पुल को खोलने के बाद भी यहां काफी ट्रैफिक होने लगता था, जिसके बाद इस पीपे के पुल की जगह यहां दूसरे पुल के निर्माण की जरूरत लगने लगी।

इसके बाद अंग्रेजों को हुगली नदी के ऊपर फ्लोटिंग पुल बनाने का विचार आया, जिससे बड़ी ही आसानी से पुल के नीचे से जहाज की आवाजाही हो सके। अब जैसे ही फ्लोटिंग पुल बनाने का काम शुरू ही होने वाला था कि तभी पहला विश्व युद्ध छिड़ गया, जिसके बाद जब तक विश्व युद्ध खत्म नहीं हुआ तब तक हावड़ा ब्रिज (Howrah Bridge) का काम शुरू ही नहीं हुआ।

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Source: Social Media

इसके बाद 1922 में न्यू हावड़ा ब्रिज कमिशन का गठन किया गया। इसके लिए टेंडर भी निकाला गया, जिसका कई कंस्ट्रक्शन कंपनियों ने टेंडर भी भरा। इस ब्रिज को बनाने की शर्त थी कि इस पुल के बीच में कोई भी पिलर नहीं होना चाहिए, ये शर्त इसलिए रखी गई थी ताकी ब्रिज के नीचे से कोई भी जहाज आसानी से निकल सके।

किस कंपनी ने बनाया Howrah Bridge?

कई कंस्ट्रक्शन कंपनियों में से हावड़ा ब्रिज (Howrah Bridge) को बनाने के लिए ब्रेथवेट, बर्न एंड जोसेप कंस्ट्रक्शन कंपनी को चुना गया। इसके बाद हावड़ा ब्रिज का डिजाइन तैयार किया गया, जिसमें केवल 4 ही पिलर बनाए जाने के इंस्ट्रक्शन्स दिए गए थे, यानी की दो पिलर एक तरफ और दो दूसरी तरफ। इन पिलर्स की लंबाई है 280 फीट और इन पिलर्स के बीच की दूरी है 1500 फीट।

Howrah Bridge को बनाने में कितना लगा स्टील?

हावड़ा ब्रिज (Howrah Bridge) को बने हुए 80 साल हो चुके हैं लेकिन आज भी ये ब्रिज काफी मजबूती से खड़ा है, जिसके ऊपर से रोजाना लाखों गाड़ियां जाती है। इसकी मजबूती के पीछे इसमें इस्तेमाल होने वाली स्टील का हाथ है। इस ब्रिज को बनाने में कुल 26500 टन स्टील का इस्तेमाल हुआ है। इसमें से 23500 टन स्टील तो टाटा स्टील की ओर से सप्लाई की गई थी।

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Source: Social Media

वहीं इस पुल को बनाने में किसी भी नट-बोल्ट का इस्तेमाल नहीं किया गया है, बल्की इसकी जगह पर धातु से बनी हुई कीलों का इस्तेमाल किया गया है। इस ब्रिज के बनने के बाद इसके ऊपर से ट्राम तक गुजर चुकी है लेकिन इससे ट्रैफिक बढ़ने के कारण ट्राम की इस ब्रिज से आवाजाही को रोक दिया गया।

क्यों नहीं हुआ हावड़ा ब्रिज का आजतक उद्धाटन

1942 में हावड़ा ब्रिज (Howrah Bridge) बनकर तैयार हुआ था और इसे लोगों के लिए 3 फरवरी 1943 को खोल दिया गया, वो भी बिना उद्घाटन के। मगर क्यों हावड़ा ब्रिज का उद्घाटन आजतक नहीं हुआ। दरअसल जिस समय पर हावड़ा ब्रिज बनकर तैयार हुआ था उस समय द्वितीय विश्व युद्ध चल रहा था। इसी कारण न उस समय हावड़ा ब्रिज (Howrah Bridge) का उद्घाटन हुआ और न ही उसके बाद कभी हावड़ा ब्रिज का उद्घाटन किया गया।    

जापान का हमला भी झेल चुका है हावड़ा ब्रिज

1942 में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापान द्वारा हावड़ा ब्रिज (Howrah Bridge) को तबाह करने के लिए इस ब्रिज पर एक बम भी गिराया गया था, लेकिन ये बम हावड़ा ब्रिज से थोड़ी दूरी पर जाकर गिरा। बम के आस पास गिरने के बावजूद भी ये ब्रिज टस से मस नहीं हुआ।  

ब्रिज के नीचे फंस चुका है मालवाहक जहाज

वहीं 2005 में हावड़ा ब्रिज (Howrah Bridge) के नीचे एक मालवाहक जहाज भी फंसा था, जिसका नाम था एमवी मणि। इस मालवाहक जहाज के फंसने से हावड़ा ब्रिज को भी काफी नुकसान हुआ था। इसके बाद 2011 में हावड़ा ब्रिज के पायों की मोटाई कम होने की भी शिकायत सामने आई थी।

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दरअसल बंगाल के लोगों को तंबाकू खाने की लत है और हावड़ा ब्रिज (Howrah Bridge) से गुजरते लोग ब्रिज पर ही तंबाकू थूक देते हैं, जिसके कारण हावड़ा ब्रिज के पायों की मोटाई धीरे धीरे कम होती जा रही थी। इन पायों को बचाने के लिए इनके नीचे फाइबर ग्लास ढंक दिया गया, जिसमें करीबन 20 लाख रुपये का खर्चा आया था।

वर्ष 1965 में हावड़ा ब्रिज (Howrah Bridge) का नाम बदलकर देश के कवि गुरु रविंद्र नाथ टैगोर के नाम पर इस ब्रिज का नाम रविंद्र सेतु रखा गया था, लेकिन आज भी लोग इस ब्रिज को हावड़ा ब्रिज के नाम से ही संबोधित करते हैं।   

क्यों अंग्रेज हावड़ा ब्रिज की चाबी नहीं दे रहे भारत को?

अब आपको बताते हैं हावड़ा ब्रिज (Howrah Bridge) की उस चाबी के बारे में जो अंग्रेजों ने आजतक भारत को नहीं दी। दरअसल ऐसा कहा जाता है कि हावड़ा ब्रिज बनाते समय अंग्रेजों ने इसकी एक चाबी भी बनवाई थी, जिसे उन्होंने आजतक भारत को नहीं दी है। कहा जाता है कि ये चाबी जरूरत पड़ने पर ब्रिज को बीच से खोलने के लिए बनाई गई थी, लेकिन इस बात का कोई भी पुख्ता सबूत नहीं है।

घड़ी में 12 बजते ही क्यों हो जाता है हावड़ा ब्रिज बंद?

वहीं इस ब्रिज से 12 बजे कोई भी इंसान नहीं गुजर सकता। ऐसा क्यों होता है ये आपको बताते हैं। दरअसल जिन इंजीनियर्स द्वारा इस ब्रिज को बनाया गया था उन्होंने कहा था कि ये ब्रिज जब भी टूटेगा वो 12 बजे का समय होगा, लेकिन उन्होंने ये नहीं बताया था कि दिन के 12 बजे या फिर रात के 12 बजे, इसी कराण इस ब्रिज को दिन के 12 बजे और रात के 12 बजे बंद कर दिया जाता है।

तो हावड़ा ब्रिज (Howrah Bridge) के बारे में आपको ये जानकारी कैसी लगी कमेंट करके जरूर बताइएगा और अगर आपके पास भी हावड़ा ब्रिज से जुड़ी कोई भी ऐसी जानकारी है जो हमारे दर्शकों के लिए जरूरी है तो वो भी कमेंट करके जरूर बताइएगा।

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