भारतीय बैडमिंटन के लिए 21 अगस्त 2026 का दिन ऐतिहासिक बन गया। ट्रेसा जॉली और गायत्री गोपीचंद की जोड़ी ने नई दिल्ली में चल रही BWF विश्व चैंपियनशिप में शानदार प्रदर्शन करते हुए महिला डबल्स के सेमीफाइनल में जगह बना ली। इस जीत के साथ भारत ने महिला डबल्स में विश्व चैंपियनशिप पदक के लिए चला आ रहा 15 साल का इंतजार खत्म कर दिया है। भारतीय जोड़ी ने क्वार्टर फाइनल में चीन की चौथी वरीयता प्राप्त जिया यी फान और झांग शू शियान को 16-21, 21-15, 21-13 से हराया। करीब 69 मिनट चले इस मुकाबले में भारतीय खिलाड़ियों ने पहला गेम गंवाने के बाद जिस तरह वापसी की, वह उनकी मानसिक मजबूती और आक्रामक खेल का शानदार उदाहरण रहा।
यह जीत इसलिए भी खास है क्योंकि ट्रेसा-गायत्री की जोड़ी टूर्नामेंट में अनसीडेड थी, जबकि सामने दुनिया की चौथी वरीयता प्राप्त चीनी जोड़ी थी। इसके बावजूद भारतीय खिलाड़ियों ने दबाव में बेहतरीन प्रदर्शन किया और घरेलू दर्शकों के सामने बड़ी जीत दर्ज की। इस पदक के साथ भारत की विश्व चैंपियनशिप में 2011 से चली आ रही कम से कम एक पदक जीतने की निरंतरता भी बरकरार रही।
पहले गेम में पिछड़ीं, फिर बदला मुकाबले का रुख
क्वार्टर फाइनल की शुरुआत भारतीय जोड़ी के लिए आसान नहीं रही। जिया यी फान और झांग शू शियान ने पहले गेम में बेहतर नियंत्रण दिखाते हुए ट्रेसा और गायत्री को 21-16 से हरा दिया। भारतीय खिलाड़ियों पर दबाव साफ नजर आ रहा था, लेकिन उन्होंने दूसरे गेम में रणनीति बदली और मुकाबले में जोरदार वापसी की।
दूसरे गेम में भारतीय जोड़ी ने अपने आक्रमण को तेज किया। स्मैश के साथ नेट के पास बेहतर खेल ने उन्हें अंक जुटाने में मदद की। चीनी खिलाड़ियों पर दबाव बढ़ता गया और ट्रेसा-गायत्री ने दूसरा गेम 21-15 से अपने नाम कर मुकाबला निर्णायक गेम तक पहुंचा दिया।
निर्णायक गेम में भारतीय खिलाड़ियों ने शुरुआत से ही आक्रामक रुख अपनाया। रैलियों में धैर्य बनाए रखने के साथ-साथ उन्होंने सही समय पर तेज हमले किए। तीसरे गेम में चीन की जोड़ी भारतीय आक्रमण का जवाब नहीं दे सकी और ट्रेसा-गायत्री ने 21-13 से गेम जीतकर मैच अपने नाम कर लिया।
ट्रेसा- गायत्री को 15 साल बाद महिला डबल्स में पदक
ट्रेसा और गायत्री की सफलता का सबसे बड़ा महत्व भारत के महिला डबल्स इतिहास से जुड़ा है। इससे पहले विश्व चैंपियनशिप में भारत की महिला डबल्स जोड़ी ने 2011 में पदक जीता था। तब ज्वाला गुट्टा और अश्विनी पोनप्पा ने कांस्य पदक हासिल किया था।
उसके बाद से भारतीय महिला डबल्स को विश्व चैंपियनशिप के मंच पर पदक का इंतजार था। अब 15 साल बाद ट्रेसा और गायत्री ने उस सूखे को समाप्त कर दिया है।
दिलचस्प बात यह भी है कि इस ऐतिहासिक उपलब्धि के समय अश्विनी पोनप्पा ने ट्रेसा-गायत्री का समर्थन करते हुए उन्हें इससे भी बड़ी सफलता हासिल करने के लिए प्रेरित किया है। 2011 की कांस्य पदक विजेता जोड़ी की विरासत को अब यह भारतीय जोड़ी आगे बढ़ा रही है।
चोट के बाद शानदार वापसी
ट्रेसा जॉली और गायत्री गोपीचंद की सफलता सिर्फ एक मैच की कहानी नहीं है। इसके पीछे चोट, लंबी वापसी और लगातार मेहनत की कहानी भी है।
इस साल ट्रेसा को एशिया बैडमिंटन चैंपियनशिप और उबर कप से पहले ट्रेनिंग के दौरान गंभीर चोट लगी थी। अभ्यास के दौरान उनका पैर मुड़ गया था और जांच में दो हाई-ग्रेड मांसपेशी चोटों तथा दो लिगामेंट चोटों का पता चला। इसके बाद उन्हें लंबे रिहैबिलिटेशन दौर से गुजरना पड़ा।
चोट से उबरने के बाद दोनों ने इंडोनेशिया ओपन से वापसी की और फिर यूएस ओपन में हिस्सा लिया। इस महीने की शुरुआत में फिलीपींस इंटरनेशनल चैलेंज जीतना भी उनकी वापसी का महत्वपूर्ण पड़ाव रहा। विश्व चैंपियनशिप में अब उनकी यह उपलब्धि उस वापसी को एक ऐतिहासिक ऊंचाई तक ले गई है।
घरेलू दर्शकों ने बढ़ाया हौसला
नई दिल्ली के इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम में खेले गए इस मुकाबले में भारतीय खिलाड़ियों को बड़ी संख्या में मौजूद घरेलू दर्शकों का समर्थन मिला। जब भारतीय जोड़ी पहला गेम हार गई, तब भी दर्शकों ने उनका उत्साह बनाए रखा।
ट्रेसा और गायत्री ने मुकाबले के बाद घरेलू दर्शकों के समर्थन को अपनी वापसी में महत्वपूर्ण बताया। भारतीय टीम के लिए यह विश्व चैंपियनशिप इसलिए भी खास है क्योंकि प्रतियोगिता देश में आयोजित हो रही है।
कोचिंग टीम के लिए भी यह पल भावुक करने वाला रहा। गायत्री के पिता और भारतीय बैडमिंटन के दिग्गज पुलेला गोपीचंद भी इस अभियान के दौरान उनके साथ मौजूद रहे। कोच बी. सुमीत रेड्डी ने जीत के बाद गायत्री पर लंबे समय से मौजूद अपेक्षाओं और दबाव का उल्लेख किया। उनके मुताबिक, पुलेला गोपीचंद की बेटी होने के कारण गायत्री पर अतिरिक्त उम्मीदों का बोझ रहा है।
सिर्फ पदक से संतुष्ट नहीं भारतीय जोड़ी
इतिहास रचने के बाद भी ट्रेसा और गायत्री का लक्ष्य केवल कांस्य पदक तक सीमित नहीं है। सेमीफाइनल में पहुंचने के बाद अब उनके सामने फाइनल में जगह बनाने का मौका है। अगर वे सेमीफाइनल जीतती हैं तो भारत के महिला डबल्स इतिहास में पहली बार विश्व चैंपियनशिप के फाइनल में पहुंचने की दिशा में बड़ा कदम होगा।
रिपोर्टों के मुताबिक, सेमीफाइनल में भारतीय जोड़ी का सामना चीन की तान निंग और लियू शेंगशु से होना है। यह मुकाबला भारतीय जोड़ी के लिए एक और बड़ी परीक्षा होगी।
भारत की पदक उम्मीदें अब ट्रेसा-गायत्री पर
विश्व चैंपियनशिप के क्वार्टर फाइनल में भारत की पुरुष डबल्स की प्रमुख जोड़ी सात्विकसाईराज रंकीरेड्डी और चिराग शेट्टी को भी हार का सामना करना पड़ा। उन्हें चीन की लियांग वेई केंग और वांग चांग की जोड़ी ने सीधे गेमों में हराया। इसके बाद ट्रेसा-गायत्री भारत की इस प्रतियोगिता में पदक की प्रमुख उम्मीद बन गई हैं।
यह स्थिति भारतीय महिला डबल्स के लिए और भी महत्वपूर्ण है। जहां एक ओर देश की कई बड़ी बैडमिंटन हस्तियां इस विश्व चैंपियनशिप में अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर पाईं, वहीं अनसीडेड ट्रेसा और गायत्री ने सबसे बड़े मंच पर अपनी पहचान मजबूत कर ली।
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भारतीय बैडमिंटन के लिए नई उम्मीद
ट्रेसा जॉली और गायत्री गोपीचंद की सफलता भारत में डबल्स बैडमिंटन के बढ़ते स्तर का संकेत भी है। पिछले कुछ वर्षों में पुरुष डबल्स में सात्विक-चिराग ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को नई पहचान दी है। अब महिला डबल्स में ट्रेसा-गायत्री का प्रदर्शन एक नई संभावना पैदा करता है।
दोनों खिलाड़ी पहले भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रभाव छोड़ चुकी हैं। उन्होंने 2022 और 2023 में लगातार दो वर्षों तक ऑल इंग्लैंड ओपन के सेमीफाइनल में जगह बनाई थी। 2022 कॉमनवेल्थ गेम्स में उन्होंने कांस्य पदक भी जीता और पिछले साल की शुरुआत में विश्व रैंकिंग के शीर्ष 10 में प्रवेश किया था।
निष्कर्ष
ट्रेसा जॉली और गायत्री गोपीचंद ने 2026 विश्व बैडमिंटन चैंपियनशिप में सिर्फ एक मुकाबला नहीं जीता, बल्कि भारतीय महिला डबल्स के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया है। चीन की चौथी वरीयता प्राप्त जोड़ी को 16-21, 21-15, 21-13 से हराकर उन्होंने कम से कम कांस्य पदक पक्का किया और 15 साल का इंतजार खत्म किया।
चोट से वापसी, अनसीडेड होने का दबाव, विश्व की शीर्ष जोड़ी के खिलाफ मुकाबला और घरेलू दर्शकों की उम्मीदों के बीच भारतीय खिलाड़ियों ने जिस तरह पहला गेम हारने के बाद मैच पलटा, वह उनके आत्मविश्वास और मेहनत को दर्शाता है।
अब इतिहास रच चुकी ट्रेसा-गायत्री की नजरें अगले लक्ष्य पर हैं—फाइनल में जगह और पदक का रंग बदलना। भारत की महिला डबल्स के लिए यह सिर्फ एक पदक नहीं, बल्कि लंबे इंतजार के बाद मिली नई उम्मीद और आने वाली पीढ़ी के लिए प्रेरणा है।

