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Co-Lending क्या है? बैंक और NBFC मिलकर लोन कैसे देते हैं, 2026 के नए RBI नियम आसान भाषा में समझें

Co-Lending वह व्यवस्था है, जिसमें एक बैंक और एक NBFC या दो वित्तीय संस्थाएं मिलकर एक ही ग्राहक को लोन देती हैं और लोन की रकम, कमाई और जोखिम तय अनुपात में आपस में बांटती हैं। गांवों, छोटे कस्बों और छोटे कारोबारियों तक बैंक की पहुंच सीमित होती है, जबकि NBFC वहां मजबूत होती हैं लेकिन उनके पास सस्ता पैसा कम होता है।

इन्हीं दोनों की ताकत को जोड़ने के लिए यह मॉडल बना। इस लेख में आसान भाषा में समझेंगे कि यह कैसे काम करता है, RBI के नए नियम क्या हैं और ग्राहक को इससे क्या फायदा होता है।

Co-Lending कैसे काम करता है?

मान लीजिए किसी छोटे दुकानदार को 10 लाख रुपये का लोन चाहिए। उसके इलाके में काम करने वाली NBFC उसकी जांच करती है, दस्तावेज लेती है और लोन मंजूर करती है, इसलिए उसे ओरिजिनेटिंग लेंडर कहा जाता है।

तय समझौते के मुताबिक इस लोन का बड़ा हिस्सा, जैसे 8 या 9 लाख रुपये, बैंक देता है और बाकी रकम NBFC अपनी जेब से लगाती है। दोनों अपने अपने हिस्से का रिकॉर्ड अपनी किताबों में रखते हैं और उसी अनुपात में ब्याज कमाते हैं।

Co-Lending में ग्राहक को दो अलग लोन नहीं संभालने पड़ते। उसकी एक ही EMI बनती है और सारी बातचीत एक ही संस्था से होती है।

2026 से लागू RBI के नए नियम

RBI ने 2020 में प्राथमिकता क्षेत्र के लिए बैंक और NBFC के बीच Co-Lending मॉडल शुरू किया था, जिसमें NBFC को कम से कम 20 प्रतिशत हिस्सा अपने पास रखना होता था। अगस्त 2025 में RBI ने इसके लिए नए दिशानिर्देश जारी किए, जो 1 जनवरी 2026 से लागू हैं।

नए नियमों में यह व्यवस्था सिर्फ प्राथमिकता क्षेत्र तक सीमित नहीं रही, बल्कि हर तरह के लोन पर लागू हो सकती है। अब बैंक, NBFC और अखिल भारतीय वित्तीय संस्थाएं आपस में ऐसे समझौते कर सकती हैं।

Co-Lending के हर साझेदार को हर लोन का कम से कम 10 प्रतिशत हिस्सा अपनी किताबों में रखना जरूरी है, ताकि दोनों की जिम्मेदारी बनी रहे। साझेदार संस्था को अपना हिस्सा लोन बंटने के 15 दिन के भीतर अपने खाते में दर्ज करना होता है और पैसों का लेनदेन एस्क्रो खाते से होता है।

ओरिजिनेटिंग संस्था अपने साझेदार को बकाया लोन के 5 प्रतिशत तक की डिफॉल्ट लॉस गारंटी भी दे सकती है।

ग्राहक को इससे क्या फायदा होता है?

Co-Lending का सबसे बड़ा फायदा यह है कि बैंक का सस्ता पैसा उन लोगों तक पहुंचता है, जिन तक बैंक सीधे नहीं पहुंच पाते। इससे ब्याज दर अक्सर सिर्फ NBFC से लेने की तुलना में कम रहती है।

ग्राहक के लिए ब्याज दर दोनों संस्थाओं की दरों को उनके हिस्से के अनुपात में मिलाकर तय होती है। यह जानकारी लोन के Key Fact Statement में साफ लिखी होनी चाहिए।

किसान, छोटे कारोबारी, महिला उद्यमी और पहली बार लोन लेने वाले लोग इस मॉडल से सबसे ज्यादा लाभ उठा सकते हैं।

किन बातों का ध्यान रखें?

लोन लेते समय यह जरूर पूछें कि आपका लोन किन दो संस्थाओं के बीच बंटा है और शिकायत किससे करनी है। नियमों के तहत ग्राहक को यह जानकारी पहले से देनी होती है।

Co-Lending वाले लोन की जानकारी दोनों संस्थाएं अपने अपने हिस्से के हिसाब से क्रेडिट ब्यूरो को भेजती हैं। इसलिए समय पर EMI भरना उतना ही जरूरी है, जितना किसी सामान्य लोन में।

लोन से जुड़ी ये जानकारियां भी आपके काम आएंगी: Fintech क्या है, बिना गिरवी बिजनेस लोन की सरकारी योजनाएं और MSME रजिस्ट्रेशन और लोन गाइड।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

1. क्या Co-Lending में ग्राहक को दो EMI भरनी पड़ती हैं?

नहीं, ग्राहक को एक ही EMI भरनी होती है और सारी बातचीत एक ही संस्था से होती है। बाकी बंटवारा दोनों संस्थाएं आपस में करती हैं।

2. क्या यह सिर्फ बैंक और NBFC के बीच ही होता है?

नए नियमों के तहत बैंक, NBFC और अखिल भारतीय वित्तीय संस्थाएं आपस में ऐसे समझौते कर सकती हैं।

3. शिकायत किससे करें?

पहले उस संस्था से शिकायत करें, जिससे आपकी बातचीत होती है। समाधान न मिलने पर RBI के लोकपाल पोर्टल का रास्ता खुला है।

4. नए नियमों का पूरा दस्तावेज कहां पढ़ें?

इसके पूरे दिशानिर्देश RBI की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध हैं।

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उपरोक्त जानकारी गूगल और विभिन्न वेबसाइट/समाचार माध्यमों से ली गई है। सटीकता की गारंटी नहीं है।

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