GLACIAL LAKE OUTBURST FLOODS: हिमालयी क्षेत्रों में हिमनद झीलों से उत्पन्न होने वाले संभावित खतरों को देखते हुए उत्तराखंड सरकार ने एक बड़ा सुरक्षा कदम उठाया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्देशानुसार, राज्य की 13 अति-संवेदनशील हिमनद झीलों की निगरानी, जोखिम आकलन और उनके खतरों को कम करने के लिए एक उच्च-स्तरीय वर्किंग ग्रुप का गठन किया गया है। इस महत्वपूर्ण परियोजना के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए मुख्यमंत्री ने ₹9.00 करोड़ की धनराशि को मंजूरी दे दी है।
वाडिया संस्थान बना नोडल एजेंसी
इस विशेष वर्किंग ग्रुप का नेतृत्व देहरादून स्थित वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी (WIHG) को सौंपा गया है, जिसे परियोजना का नोडल संस्थान नामित किया गया है। इस समूह में देश के दिग्गज वैज्ञानिक संस्थानों के विशेषज्ञों को शामिल किया गया है, जिनमें प्रमुख हैं:
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सेंट्रल बिल्डिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (CBRI)
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भारतीय रिमोट सेंसिंग संस्थान (IIRS)
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भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI)
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नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइड्रोलॉजी (NIH)
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उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र (USAC) और आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (USDMA)
₹9 करोड़ का बजट: आधुनिक तकनीक और चेतावनी तंत्र पर जोर
मुख्यमंत्री द्वारा अनुमोदित कुल बजट में से ₹7.80 करोड़ की बड़ी राशि सीधे वाडिया संस्थान को उपलब्ध कराई जाएगी। इस धनराशि का उपयोग निम्नलिखित कार्यों के लिए होगा:
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उपकरणों की खरीद: अत्याधुनिक निगरानी यंत्रों और सेंसर की स्थापना।
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अर्ली वार्निंग सिस्टम (EWS): झील फटने की स्थिति में समय रहते सूचना देने वाले तंत्र का विकास।
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सैटेलाइट इमेजरी और सॉफ्टवेयर: अंतरिक्ष तकनीक के जरिए झीलों के आकार में होने वाले बदलावों पर नजर रखना।
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फील्ड ऑपरेशंस: दुर्गम ग्लेशियर क्षेत्रों में जाकर तकनीकी अध्ययन और डेटा एकत्र करना।
इसके अतिरिक्त, शेष ₹1.20 करोड़ की राशि जन-जागरूकता कार्यक्रमों, क्षमता निर्माण और फील्ड सर्वेक्षण के लिए उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के माध्यम से जारी की जाएगी।

GLACIAL LAKE OUTBURST FLOODS का जोखिम कम करना
यह पूरी परियोजना राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA), भारत सरकार के सहयोग से ‘नेशनल ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड रिस्क मिटिगेशन प्रोग्राम (NGRMP)’ के अंतर्गत संचालित की जा रही है। इसका मुख्य उद्देश्य हिमालयी झीलों के अचानक फटने से आने वाली बाढ़ के खतरे को न्यूनतम करना है, ताकि भविष्य में GLACIAL LAKE OUTBURST FLOODS जैसी आपदाओं से जान-माल का नुकसान बचाया जा सके। वर्किंग ग्रुप न केवल निगरानी करेगा, बल्कि उन तकनीकी उपायों को भी लागू करेगा जिनसे झीलों में पानी के बढ़ते दबाव को कम किया जा सके।
GLACIAL LAKE OUTBURST FLOODS क्या होता है?
GLACIAL LAKE OUTBURST FLOODS पहाड़ों और ऊंचे इलाकों में आने वाली एक अचानक और विनाशकारी बाढ़ है। इसे आसान भाषा में समझने के लिए आप इसे एक प्राकृतिक बांध का टूटना कह सकते हैं। जब ग्लेशियर (बर्फ की नदियां) धीरे-धीरे पिघलते हैं, तो उनका पानी पहाड़ों के बीच बने गड्ढों में जमा होने लगता है। इन गड्ढों के चारों ओर मिट्टी, पत्थर और बर्फ का एक कच्चा घेरा बन जाता है, जिसे ‘मोरेन’ कहते हैं। यह मोरेन एक प्राकृतिक बांध की तरह काम करता है और पानी को रोक कर रखता है, जिससे एक झील बन जाती है। इसे ही ग्लेशियल लेक या हिमनद झील कहा जाता है।
बाढ़ की स्थिति तब बनती है जब यह प्राकृतिक बांध किसी वजह से टूट जाता है। इसके टूटने के कई कारण हो सकते हैं, जैसे:
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झील में पानी का स्तर बहुत ज्यादा बढ़ जाना।
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ऊपर से किसी बड़े ग्लेशियर या चट्टान का टूटकर झील में गिरना, जिससे पानी में हलचल पैदा हो और बांध पर दबाव बढ़े।
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भूकंप के झटके लगना, जिससे कच्चे बांध की दीवारों में दरार आ जाए।
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ग्लोबल वार्मिंग के कारण बर्फ का तेजी से पिघलना।

जब यह प्राकृतिक बांध टूटता है, तो झील में जमा लाखों गैलन पानी, मलबा और बड़े-बड़े पत्थर बहुत तेज रफ्तार से नीचे की ओर बहने लगते हैं। GLACIAL LAKE OUTBURST FLOODS की गति इतनी ज्यादा होती है कि रास्ते में आने वाले गांव, सड़कें, पुल और हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट्स को यह पल भर में तबाह कर सकता है। उत्तराखंड के चमोली (2021) और सिक्किम (2023) में आई आपदाएं GLOF के ही उदाहरण हैं। पहाड़ों में तापमान बढ़ने के साथ ही ग्लेशियर पिघलने की रफ्तार बढ़ रही है, जिससे ऐसी झीलों की संख्या और उनमें बाढ़ का खतरा भी बढ़ता जा रहा है।
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