ईशा फाउंडेशन ने हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। इस पर सुनवाई के दौरान, CJI डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने स्पष्ट किया कि मद्रास हाईकोर्ट का ऐसी याचिका पर जांच के आदेश देना सही नहीं था। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि आश्रम में पुलिस का छापा अवैध था और लड़कियों के पिता की याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि लड़कियां, जब आश्रम में गईं, तब उनकी उम्र 27 और 24 साल थी, जो कि बालिग हैं। इस प्रकार, कोर्ट ने यह निष्कर्ष निकाला कि दोनों लड़कियां अपनी मर्जी से आश्रम में रह रही थीं।

SADHGURU ISHA FOUNDATION: अब तक क्या क्या हुआ?
- सेवानिवृत्त प्रोफेसर एस कामराज ने मद्रास उच्च न्यायालय में ईशा फाउंडेशन के खिलाफ एक याचिका दाखिल की, जिसमें उन्होंने गंभीर आरोप लगाए थे कि उनकी दो बेटियों, गीता और लता, को आश्रम में ब्रेनवॉश करके रखा गया है। गीता की उम्र 42 वर्ष और लता की उम्र 39 वर्ष है।
- कामराज का आरोप था कि उनकी बेटियां अपनी इच्छा के विरुद्ध आश्रम में रह रही हैं।
- कामराज की याचिका के आधार पर, मद्रास उच्च न्यायालय ने 30 सितंबर को एक महत्वपूर्ण आदेश जारी किया।
- अदालत ने तमिलनाडु पुलिस को निर्देश दिया कि वह ईशा फाउंडेशन से जुड़े सभी आपराधिक मामलों की जांच करे और इस संबंध में एक रिपोर्ट पेश करे।
- इस आदेश के परिणामस्वरूप, 1 अक्टूबर को लगभग 150 पुलिसकर्मियों ने ईशा फाउंडेशन के मुख्यालय पर छापा मारा। (SADHGURU ISHA FOUNDATION)
- इस संदर्भ में, अदालत ने गहरी चिंता व्यक्त की और आश्रम में संभावित अनियमितताओं की जांच करने का आदेश दिया।
- यह मामला जल्द ही सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां ईशा फाउंडेशन ने मद्रास हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी।
- सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को सुनने के बाद यह स्पष्ट किया कि लड़कियां बालिग हैं और अपनी मर्जी से आश्रम में रह रही हैं।
- कामराज की याचिका पर कोर्ट के फैसले ने न केवल उनके आरोपों को खारिज किया बल्कि यह भी स्पष्ट किया कि ईशा फाउंडेशन और सद्गुरु जग्गी वासुदेव के खिलाफ कोई ठोस प्रमाण नहीं हैं।
सद्गुरु का ईशा फाउंडेशन विवादों में, लड़कियों को बंधक बनाने का आरोप
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