अकबर ने की थी ज्वाला मंदिर की लौ को बुझाने की कोशिश, फिर..

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Jwala Devi: अकबर ने जब चढ़ाया था माता के मंदिर में सोने का छत्र, क्या हुआ फिर?

Jwala Devi: हमारे देश में ऐसे कई रहस्यमयी मंदिर मौजूद हैं जो अपनी अनोखी कहानियों के लिए जाने जाते हैं। इनमें से कई ऐसे भी मंदिर हैं जिनका असतित्व कई लाखों साल पुराने हैं। इन रहस्यों को सुलझाते सुलझाते अंग्रेजों के भी हाथ पाव फूल गए लेकिन वो भी इन रहस्यों पर से आजतक पर्दा नहीं उठा पाए।

ऐसा ही एक मंदिर स्थित है हिमाचल प्रदेश की खूबसूरत वादियों में जिसका नाम है ज्वाला देवी मंदिर (Jwala Devi). ये मंदिर हिमाचल प्रदेश की कांगड़ा धाटी से करीबन 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। जिस स्थान पर मां ज्वाला देवी (Jwala Devi) का मंदिर स्थित है वहां माता सती की जीभ गिरी थी, जिसके बाद से मां सती यहां ज्वाला (Jwala Devi) के रूप में विराजमान हो गईं।

इस मंदिर में भगवान शिव भी विराजमान हैं, यहां भगवान भोले उन्मत भैरव के रूप में विराजमान हैं। इस पूरे मंदिर में माता (Jwala Devi) की कोई भी मूर्ती नहीं है, यहां आपको केवल पृथ्वी के गर्भ से ज्वाला निकलती दिखाई देगी। इस मंदिर में पृथ्वी के अंदर से 9 अलग अलग ज्वालाएं निकलती हैं जो 9 देवियों का प्रतीक मानी जाती हैं।

पृथ्वी के गर्भ से निकल रहीं ये ज्वालाएं आखिर कैसे इतने सालों से बिना बत्ती और तेल के जल रही हैं, इस बात से सभी हैरान है। इस रहस्य पर से पर्दा उठाने के लिए ब्रिटिश शासन के दौरान भी कई कोशिशें की गईं लेकिन उनके भी हाथ कुछ न लगा।

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वहीं कई भू- वैज्ञानिकों द्वारा इस रहस्य को सुलझाने के लिए कई किलोमीटर तक खुदाई भी की गई लेकिन फिर भी वैज्ञानिक इस बात का पता नहीं लगा पाए कि ये प्राकृतिक गैस कहां से निकल रही है। ज्वाला देवी (Jwala Devi) की इन ज्वालाओं को कई बार बुझाने की कोशिश भी की गई लेकिन आजतक कोई भी इन ज्वालाओं को नहीं बुझा पाया।

मुगलों के शासन के समय में एक बार जब बादशाह अकबर को ज्वाला देवी मंदिर (Jwala Devi) में इन ज्वालाओं के जलने के बारे में पता चला तो उसने अपनी पूरी सेना को इन ज्वालाओं को बुझाने का आदेश दे दिया। अकबर की सेना की कई कोशिशों के बाद भी वो इन ज्वालाओं को नहीं बुझा पाए।

इसके बाद अकबर ने नहर तक खुदाई करवाने की नकामयाब कोशिश की। माता ज्वाला (Jwala Devi) के इन चमत्कारों को देख अकबर भी हैरान रह गया। इसके बाद अकबर ने माता के मंदिर में सोने का छत्र चढ़ाया जिसे माता ने स्वीकार नहीं किया।

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आपको बता दें कि जब अकबर ने माता के मंदिर (Jwala Devi) में सोने का छत्र चढ़ाया तो वह छत्र अपने आप ही नीचे गिर गया और उसके बाद वो छत्र किसी अन्य धातु में तबदील हो गया। इस रहस्य पर से भी आजतक पर्दा नहीं उठ पाया है कि वो सोने का छत्र किस धातु में बदला होगा।

आपको बता दें कि मां ज्वाला देवी (Jwala Devi) मंदिर को पांडवों द्वारा खोजा गया था। इसके निर्माण की बात की जाए तो इस मंदिर (Jwala Devi) का निर्माण राजा भूमि चंद द्वारा करवाया गया था। इसके बाद फिर 1835 में महाराजा रणजीत सिंह और राजा संसार चंद द्वारा इस मंदिर (Jwala Devi) का फिरसे निर्माण कराया गया।

इस मंदिर (Jwala Devi) को लेकर एक पौराणिक कथा भी काफी प्रचलित है। इस कथा के मुताबिक ज्वाला देवी (Jwala Devi) का एक भक्त हुआ करता था जिसका नाम था गोरखनाथ। एक बार गोरखनाथ ने मां ज्वाला देवी (Jwala Devi) से कहा कि उन्हें बहुत तेज भूख लग रही है वो बाहर जाकर भिक्षा मांग कर आते हैं इसके बाद गोरखनाथ ने माता से आग्रह किया कि वह इतनी देर उनके लिए पानी गर्म करके रखें।

इसके बाद गोरखनाथ भिक्षा मांगने चले गए और फिर कभी वापिस नहीं लौटे। ऐसी मान्यता है कि जो ज्वाला, मंदिर में जल रही है, वो वही ज्वाला है जो माता (Jwala Devi) ने पानी गर्म करने के लिए जलाई थी और वो आजतक वैसी की वैसी ही जल रही है। लोगों की ये भी मान्यता है कि जब तक माता का परम भक्त वापिस मंदिर नहीं लौटेगा तब तक ये ज्वाला यूं ही जलती रहेगी। ऐसा माना जाता है कि जिस दिन गोरखनाथ वापिस लौटेंगे वो दिन कलयुग का अंतिम दिन होगा।   

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