Founder Agreement एक लिखित कानूनी समझौता है, जिसमें स्टार्टअप के सह संस्थापक आपस में तय करते हैं कि कंपनी में किसकी कितनी हिस्सेदारी होगी, कौन क्या काम करेगा और किसी के अलग होने पर क्या होगा। ज्यादातर स्टार्टअप दो या तीन दोस्तों के भरोसे शुरू होते हैं। शुरुआत में सब कुछ जुबानी तय हो जाता है और कागजी काम को बेकार समझा जाता है। लेकिन जैसे ही कंपनी बढ़ती है या पैसा आता है, यही जुबानी वादे झगड़े की वजह बन जाते हैं।
Founder Agreement क्यों जरूरी है?
भारत में कई होनहार स्टार्टअप सिर्फ संस्थापकों के आपसी विवाद की वजह से बंद हो गए। ज्यादातर झगड़े हिस्सेदारी, जिम्मेदारी और बाहर निकलने की शर्तों को लेकर होते हैं। लिखित समझौता इन सवालों का जवाब पहले ही तय कर देता है। इससे भविष्य में विवाद की गुंजाइश काफी कम हो जाती है।
निवेशक भी फंडिंग से पहले यह देखते हैं कि संस्थापकों के बीच शर्तें साफ हैं या नहीं। साफ समझौता टीम की गंभीरता और स्थिरता का संकेत देता है। भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 के तहत सही तरीके से बना और साइन किया गया यह समझौता कानूनी रूप से मान्य होता है।
Founder Agreement में हिस्सेदारी और वेस्टिंग
समझौते का सबसे अहम हिस्सा इक्विटी का बंटवारा है। इसमें साफ लिखा होना चाहिए कि हर संस्थापक के पास कंपनी के कितने प्रतिशत शेयर होंगे। हिस्सेदारी तय करते समय आइडिया, लगाया गया पैसा, समय, अनुभव और आगे की भूमिका को ध्यान में रखा जाता है। बराबर बंटवारा हमेशा सही फैसला नहीं होता।
इसके साथ वेस्टिंग शेड्यूल जरूर रखें। इसमें शेयर एक साथ नहीं, बल्कि समय के साथ धीरे-धीरे मिलते हैं। स्टार्टअप दुनिया में चार साल की वेस्टिंग और एक साल का क्लिफ आम चलन है। यानी कोई संस्थापक एक साल से पहले छोड़ दे, तो उसे वेस्टेड शेयर नहीं मिलते।
भूमिका, जिम्मेदारी और फैसले लेने का तरीका
हर संस्थापक का पद और काम लिखित में तय करें। जैसे कौन CEO होगा, कौन टेक्नोलॉजी देखेगा और कौन मार्केटिंग व फाइनेंस संभालेगा। रोज के फैसले कौन लेगा और बड़े फैसलों के लिए कितने संस्थापकों की सहमति जरूरी होगी, यह भी साफ होना चाहिए।
किसी मुद्दे पर बराबर वोट बंट जाने की स्थिति के लिए डेडलॉक सुलझाने का तरीका भी लिखें। इससे कंपनी किसी एक मतभेद पर अटकती नहीं है। संस्थापकों की सैलरी, कंपनी में लगाई गई पूंजी और भविष्य में और पैसा लगाने की शर्तें भी इसी हिस्से में दर्ज की जाती हैं।
बौद्धिक संपदा और गोपनीयता
स्टार्टअप का कोड, डिजाइन, ब्रांड नाम और प्रोडक्ट आइडिया उसकी असली पूंजी होते हैं। समझौते में लिखा होना चाहिए कि ये सब कंपनी की संपत्ति हैं, किसी एक संस्थापक की नहीं। कंपनी बनने से पहले तैयार किया गया काम भी कंपनी के नाम ट्रांसफर करने का प्रावधान रखें।
गोपनीयता की शर्त भी जरूरी है, ताकि कंपनी की अंदरूनी जानकारी बाहर न जाए। कर्मचारियों और ग्राहकों को अपने साथ न ले जाने जैसी शर्तें भी जोड़ी जाती हैं। ध्यान रहे कि भारत में कंपनी छोड़ने के बाद प्रतिस्पर्धा पर पूरी रोक लगाने वाली शर्तें आमतौर पर अदालत में टिक नहीं पातीं।

संस्थापक के बाहर निकलने की शर्तें
अगर कोई संस्थापक बीच में कंपनी छोड़ दे, तो Founder Agreement में उसके शेयरों का क्या होगा, यह पहले से तय होना चाहिए। इसके लिए गुड लीवर और बैड लीवर की शर्तें रखी जाती हैं। सही कारण से जाने वाले को उचित कीमत मिलती है, जबकि नियम तोड़कर जाने वाले के शेयर कम कीमत पर वापस खरीदे जा सकते हैं। किसी संस्थापक की मृत्यु या लंबी बीमारी जैसी स्थिति के लिए भी प्रावधान रखें। साथ ही विवाद होने पर मध्यस्थता यानी आर्बिट्रेशन से मामला सुलझाने की शर्त जोड़ना समझदारी है।
कब और कैसे बनवाएं?
सबसे अच्छा समय कंपनी रजिस्टर कराने से पहले या ठीक उसके बाद का है, जब सब संस्थापकों के रिश्ते अच्छे हों। इसे स्टांप पेपर पर बनवाकर सभी संस्थापकों के साइन कराएं। किसी स्टार्टअप वकील से ड्राफ्ट जरूर चेक करवाएं, क्योंकि ऑनलाइन टेम्पलेट हर कंपनी पर फिट नहीं बैठते।
कंपनी रजिस्टर होने के बाद इसकी अहम शर्तें आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन और बाद में शेयरहोल्डर्स एग्रीमेंट में भी शामिल की जाती हैं। समय पर बना एक साफ Founder Agreement दोस्ती और कारोबार, दोनों को लंबे समय तक बचाकर रखने में मदद करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
1. क्या Founder Agreement कानूनी रूप से मान्य होता है?
हां, सभी पक्षों की सहमति से साइन किया गया यह समझौता भारतीय अनुबंध अधिनियम के तहत कानूनी रूप से मान्य होता है।
2. Founder Agreement में वेस्टिंग क्लिफ का क्या मतलब है?
क्लिफ वह न्यूनतम अवधि है, जिससे पहले कंपनी छोड़ने पर संस्थापक को कोई वेस्टेड शेयर नहीं मिलता। आमतौर पर यह एक साल का होता है।
3. क्या दो दोस्तों के स्टार्टअप में भी Founder Agreement जरूरी है?
हां, रिश्ते जितने करीबी हों, लिखित शर्तें उतनी ही जरूरी हैं, ताकि भविष्य में गलतफहमी से दोस्ती और कारोबार दोनों न टूटें।
4. शेयरहोल्डर्स एग्रीमेंट और Founder Agreement में क्या फर्क है?
यह समझौता सिर्फ संस्थापकों के बीच होता है, जबकि शेयरहोल्डर्स एग्रीमेंट में निवेशकों समेत कंपनी के सभी शेयरधारक शामिल होते हैं।
5. Founder Agreement से जुड़ी सरकारी मदद और जानकारी कहां मिलती है?
स्टार्टअप रजिस्ट्रेशन, योजनाओं और कानूनी जानकारी के लिए सरकार के स्टार्टअप इंडिया पोर्टल पर जा सकते हैं।
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उपरोक्त जानकारी गूगल और विभिन्न वेबसाइट/समाचार माध्यमों से ली गई है। सटीकता की गारंटी नहीं है। समझौता बनवाने से पहले किसी कानूनी विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।

