अगर इस शिव मंदिर में पूजा की तो हो सकता है अनर्थ!

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Ek Hathiya Deval
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Ek Hathiya Deval: क्यों है ये शिव मंदिर शापित?

Ek Hathiya Deval: उत्तराखंड का वो शिव मंदिर जहां शिव जी की पूजा करना है बिलकुल मना। अगर आपने यहां शिव जी की पूजा की तो इससे आपको फल नहीं मिलेगा बल्की इससे आपका बुरा हो सकता है। आखिर क्यों है ये शिव मंदिर (Ek Hathiya Deval) शापित। इस मंदिर की एक और बड़ी ही खास बात ये है कि इस मंदिर को एक हाथ वाले शिल्पकार ने एक ही रात में बनाया था।

ये शिव मंदिर (Ek Hathiya Deval) पिथौरागढ़ के अल्मियां और बलतिर गांव के बीच में मौजूद एक चट्टान में स्थित हैं, जहां भगवान शिव की पूजा करना वर्जित है। असल में इस मंदिर को लेकर दो कहानियां काफी प्रचलित हैं। इनमें से पहली कहानी के मुताबिक एक गांव में एक बहुत ही प्रतिभाशाली शिल्पकार रहा करता था। लेकिन इस शिल्पकार का कुछ समय बाद एक दुर्घटना में हाथ कट गया, जिसके बाद शिल्पकार कोई भी कार्य करने के योगय न रहा।

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ऐसे में सभी गांव वाले शिल्पकार का मजाक बनाने लगे, जिसके बाद शिल्पकार इससे परेशान होकर अपनी छिनी और हथौड़ा लिए एक रात निकल पड़ा। ये शिल्पकार अपने गांव के दक्षिण ओर गया और यहां पर इसने रातों रात एक चट्टान काटकर भगवान शिव के मंदिर (Ek Hathiya Deval) का निर्माण कर दिया और ऐसा करने के बाद ये शिल्पकार कभी अपने गांव वापिस नहीं लौटा।

वहीं इस मंदिर को लेकर एक दूसरी कहानी ये भी प्रचलित है कि जिस शिल्पकार ने इस मंदिर (Ek Hathiya Deval) को बनाया उसका हाथ एक क्रूर राजा द्वारा कटवाया गया था। कहा जाता है कि इस क्रूर राजा द्वारा इस शिल्पकार से उसने अपना महल बनवाया था। ये महल इतना खूबसूरत बना कि राजा ने इस शिल्पकार का एक हाथ ही कटवा दिया ताकि वो दोबारा ऐसा कोई नमुना न बना सके। इसके बाद शिल्पकार ने राजा को सबक सिखाने के लिए रातों रात पहाड़ काटकर इस जगह पर मंदिर (Ek Hathiya Deval) का निर्माण करवा दिया।

अब आते हैं इस बात पर कि आखिर क्यों इस मंदिर (Ek Hathiya Deval) में भगवान शिव की पूजा नहीं की जाती। दरअसल मंदिर (Ek Hathiya Deval) का शिवलिंग दक्षिणमुखी था जबकि इसे उत्तरमुखी होना चाहिए था। स्थानीय लोगों का कहना है कि रात के अंधेरे में शिल्पकार को दिशा का अनुमान नहीं हुआ जिसके कारण उसने दक्षिण दिशा में ही मंदिर का निर्माण कर दिया। मंदिर (Ek Hathiya Deval) के गलत दिशा में होने के कारण इस मंदिर में कभी पूजा नहीं की जाती, लेकिन मंदिर के पास में ही मौजूद नौले में यहां के लोग लोकपर्वों में जुटते हैं।   

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