क्यों अपनी ही बेटी के प्रति जागी ब्रह्मदेव की यौन लालसा?

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Brahma and Saraswati
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Brahma and Saraswati: इस करनी के लिए भगवान शिव ने ब्रह्मदेव को दी क्या सजा?

Brahma and Saraswati: क्या आपको मालूम है कि सृष्टि के रचयिता कहे जाने वाले ब्रह्मा जी के मन में अपनी ही बेटी के प्रति यौन लालसा उत्पन्न हुई थी, जिसके बाद उनकी बेटी सरस्वती (Brahma and Saraswati) को अपने पिता के मनसूबों के बारे में पता चल गया और वो ब्रह्मा जी से छिपने के लिए संपूर्ण ब्रह्माण में छिपने लगीं, लेकिन आखिर में उन्हें ब्रह्मा जी से शादी (Brahma and Saraswati) करनी पड़ी।

मगर सवाल ये है कि सृष्टि के रचयिता के अंदर अपनी पुत्री के प्रति ऐसी लालसा (Brahma and Saraswati) क्यों जागी। जैसे की आप सभी को ये तो मालूम ही होगा कि इस सृष्टि की बागडोग त्रिदेव के हाथों में है। जहां ब्रह्मा जी के कंधों पर सृष्टि की रचना का दायित्व है वहीं विष्णु जी के पास संरक्षण का दायित्व और भगवान शिव के पास विनाश का दायित्व है। जब सृष्टि का विनाश होता है तो उसके बाद सृजन का चक्र दौबारा शुरु होता है।

इस चक्र को शुरु करने के लिए बह्मा जी ने अपने वीर्य से सरस्वती (Brahma and Saraswati) को जन्म दिया था। इस बात का वर्णन सरस्वती पुराण में किया गया है जब बह्मा जी ने अपनी ही पुत्री के साथ विवाह (Brahma and Saraswati) करने की इच्छा जाहिर की थी। दरअसल सरस्वती माता की कोई मां नहीं थीं, उन्हें ब्रह्मा जी ने केवल अपने वीर्य से जन्म दिया था।

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विद्या की देवी कही जाने वाली सरस्वती दिखने में बेहद खूबसूरत थी और आकर्शक भी। अब इस बात का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सरस्वती इतनी खूबसूरत थी कि खुद उनके पिता भी उनसे शादी (Brahma and Saraswati) करना चाहते थे। अपने पिता के मनसूबों को सरस्वती भांप चुकी थी, यही कारण था कि वो उनसे बचने के लिए चारों दिशाओं में छिपती रही और अंत में सरस्वती आकाश में जाकर छिपी जहां से उन्हें ब्रह्मदेव के पांचवे सिर ने ढूढ़ निकाला।

आखिर में सरस्वती को विवश होकर अपने ही पिता से शादी (Brahma and Saraswati) करनी पड़ी और इसके बाद सरस्वती और ब्रह्मा जी ने करीबन 100 वर्षों तक पति- पत्नी की तरह एक जंगल में जीवन व्यतीत किया और इस दौरान उनका एक पुत्र हुआ जिसका नाम था स्वयंभु मनु। ऐसा कहा जाता है कि पृथ्वी में जन्म लेने वाला पहला इंसान मनु ही था और मनु  ही सनातन धर्म, वेदों और संस्कृत भाषा का जनक था।

अब अपनी ही पुत्री से आकर्शित होना और संभोग करने की लालसा रखने के कारण सभी देवी- देवता ब्रह्मदेव (Brahma and Saraswati) को एक दोषी की तरह देखने लगे, जिसके बाद सभी देवगण महादेव के पास पहुंचे और उनसे आग्रह किया कि वह ब्रह्मदेव को अपनी ही बेटी के प्रति यौन लालसा रखने के लिए दंड दे।

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ये वाक्य सुनकर शिव जी अत्यंत क्रोधित हुए और उन्होंने ब्रह्मदेव के पांचवे सिर को उनके धड़ से अलग कर दिया। इस बात का जिक्र शिव पुराण में भी किया गया है कि ब्रह्मा जी के पहले 5 सिर हुआ करते थे लेकिन पांचवे सिर को शिव जी द्वारा उनके धड़ से अलग कर दिया गया था।

भगवान शिव द्वारा ब्रह्मदेव का पांचवा सिर ही इसलिए काटा गया क्योंकि पांचवे सिर से ब्रह्मदेव ने अपनी ही पुत्री सरस्वती से संभोग (Brahma and Saraswati) करने के लिए कहा था जिसके बाद क्रोधित होकर सरस्वती ने ब्रह्मा जी से कहा कि आपका ये मुख सदैव अपित्र बातें करता है और यही वजह है कि आपकी सोच भी विपरीत हो जाती है।

भगवान शिव द्वारा ब्रह्मदेव के पांचवे सिर को काटने के पीछे एक और कहानी काफी प्रचलित है। इसके मुताबिक एक बार भगवान शिव पार्वती माता को ढूढ़ते हुए ब्रह्मा जी के पास पहुंचे। अब जैसे भगवान शिव वहां पहुंचे ब्रह्मा जी के सभी मुखों ने भगवान शिव का अभिवादन किया, लेकिन ब्रह्मा जी के पांचवे मुख ने भगवान शिव का अभिवादन नहीं किया और अमंगल आवाजें निकालना शुरु कर दिया, ऐसे में भगवान शिव ने क्रोध में आकर ब्रह्मदेव का वो पांचवां सिर ही उनके धड़ से अलग कर दिया।   

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