Co-applicant और Co-borrower, ये दोनों शब्द होम लोन या बड़े लोन लेते समय सबसे ज्यादा सुनने को मिलते हैं, लेकिन ज्यादातर लोग इन्हें एक ही चीज समझ लेते हैं। असल में दोनों की भूमिका, जिम्मेदारी और फायदों में कुछ अहम अंतर होते हैं।
लोन के कागजों पर साइन करने से पहले यह समझना जरूरी है कि आप किस भूमिका में जुड़ रहे हैं। इससे आपकी EMI की जिम्मेदारी, प्रॉपर्टी पर हक, टैक्स छूट और सिबिल स्कोर तक सब तय होता है।
को-एप्लिकेंट किसे कहते हैं?
जब कोई व्यक्ति मुख्य आवेदक के साथ मिलकर लोन के लिए आवेदन करता है, तो उसे को-एप्लिकेंट कहा जाता है। बैंक उसकी आय को भी जोड़कर देखता है, जिससे लोन की पात्रता और रकम दोनों बढ़ सकती हैं।
आमतौर पर पति, पत्नी, माता पिता या कमाने वाले भाई बहन को ही यह भूमिका दी जाती है। होम लोन में अगर कोई व्यक्ति प्रॉपर्टी का सह मालिक है, तो ज्यादातर बैंक उसे को-एप्लिकेंट बनाना जरूरी मानते हैं।
को-बॉरोअर किसे कहते हैं?
को-बॉरोअर वह व्यक्ति होता है जो मुख्य उधारकर्ता के साथ लोन चुकाने की बराबर जिम्मेदारी लेता है। अगर EMI नहीं भरी गई, तो बैंक पूरी बकाया रकम किसी से भी वसूल सकता है। को-बॉरोअर का प्रॉपर्टी में हिस्सा हो भी सकता है और नहीं भी। उसकी मुख्य भूमिका लोन के भुगतान में साझेदारी की होती है।
Co-applicant और Co-borrower में मुख्य अंतर
सबसे पहला अंतर जिम्मेदारी के स्तर का है। को-बॉरोअर पहले दिन से EMI चुकाने में बराबर का भागीदार होता है, जबकि को-एप्लिकेंट की भूमिका मुख्य रूप से आवेदन को मजबूत करने की मानी जाती है, हालांकि मुख्य आवेदक के डिफॉल्ट करने पर उस पर भी भुगतान का दायित्व आ जाता है। दूसरा अंतर मालिकाना हक का है।
होम लोन में को-एप्लिकेंट अक्सर प्रॉपर्टी का सह मालिक होता है, जबकि को-बॉरोअर के लिए मालिक होना जरूरी नहीं है। ध्यान देने वाली बात यह है कि कई बैंक इन दोनों शब्दों को लगभग एक ही अर्थ में इस्तेमाल करते हैं। इसलिए लोन एग्रीमेंट में लिखी शर्तें ही असली जिम्मेदारी तय करती हैं, सिर्फ नाम नहीं।
टैक्स छूट किसे मिलती है?
Co-applicant और Co-borrower को होम लोन पर टैक्स छूट का फायदा लेने के लिए व्यक्ति का प्रॉपर्टी में सह मालिक होना और EMI में अपने पैसे से योगदान देना जरूरी है। सिर्फ लोन में नाम जुड़ा होने से छूट नहीं मिलती।
पुरानी टैक्स व्यवस्था में ऐसे हर पात्र व्यक्ति को सेक्शन 80C के तहत मूलधन पर 1.5 लाख रुपये और सेक्शन 24(b) के तहत खुद रहने वाले घर के ब्याज पर 2 लाख रुपये तक की अलग अलग छूट मिल सकती है। यही वजह है कि पति पत्नी अक्सर मिलकर होम लोन लेते हैं।
सिबिल स्कोर पर क्या असर पड़ता है?
दोनों ही स्थितियों में लोन की जानकारी हर जुड़े व्यक्ति की क्रेडिट रिपोर्ट में दर्ज होती है। समय पर EMI भरने से सबका स्कोर बेहतर होता है। लेकिन एक भी किस्त छूटने पर सभी का सिबिल स्कोर गिर सकता है। आगे चलकर खुद का नया लोन लेते समय यह मौजूदा लोन आपकी पात्रता को भी कम कर सकता है।

किसी के लोन में जुड़ने से पहले ये बातें जांच लें
मुख्य आवेदक की आय, नौकरी की स्थिरता और पुराने कर्ज की स्थिति को अच्छी तरह समझ लें। लोन एग्रीमेंट में अपनी भूमिका और जिम्मेदारी को ध्यान से पढ़ें। यह भी याद रखें कि लोन चलते रहने के दौरान अपना नाम हटवाना आसान नहीं होता। इसके लिए बैंक की मंजूरी और कई बार दोबारा जांच की जरूरत पड़ती है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
1. क्या Co-applicant को भी EMI चुकानी पड़ती है?
अगर मुख्य आवेदक भुगतान नहीं करता, तो बैंक को-एप्लिकेंट से भी बकाया रकम वसूल सकता है।
2. क्या को-बॉरोअर का प्रॉपर्टी में हिस्सा होता है?
जरूरी नहीं है। को-बॉरोअर सिर्फ भुगतान में भागीदार भी हो सकता है, मालिकाना हक अलग से तय होता है।
3. क्या दोनों को होम लोन पर टैक्स छूट मिलती है?
टैक्स छूट उसी को मिलती है जो प्रॉपर्टी का सह मालिक हो और EMI में अपना योगदान देता हो।
4. Co-applicant बनने से सिबिल स्कोर पर असर पड़ता है?
हां, लोन आपकी क्रेडिट रिपोर्ट में दिखता है और समय पर भुगतान न होने पर स्कोर गिर सकता है। टैक्स नियमों की आधिकारिक जानकारी आयकर विभाग की वेबसाइट पर देखी जा सकती है।
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उपरोक्त Co-applicant और Co-borrower की जानकारी गूगल और विभिन्न वेबसाइट/समाचार माध्यमों से ली गई है। सटीकता की गारंटी नहीं है।

