तेजी से बढ़ते शहरीकरण, वाहनों की बढ़ती संख्या और प्रदूषण की चुनौती के बीच नोएडा प्राधिकरण ने शहर के पर्यावरण को बेहतर बनाने के लिए एक महत्वाकांक्षी हरित योजना तैयार की है। इसके तहत नोएडा-ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेसवे के दोनों ओर करीब 45 किलोमीटर लंबा बांस आधारित हरित कॉरिडोर विकसित करने की योजना है। प्राधिकरण का उद्देश्य केवल एक्सप्रेसवे की सुंदरता बढ़ाना नहीं, बल्कि प्रदूषण कम करना, हरित क्षेत्र बढ़ाना, भूजल संरक्षण में मदद करना और आसपास के पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करना है।
नोएडा प्राधिकरण की इस योजना में बांस को प्रमुख पौधे के रूप में इस्तेमाल करने की तैयारी है। बांस तेजी से बढ़ने वाला पौधा है और इसे अपेक्षाकृत कम समय में घनी हरियाली विकसित करने के लिए उपयोगी माना जाता है। इसी वजह से एक्सप्रेसवे जैसे लंबे सड़क मार्ग के किनारे बड़े पैमाने पर हरित पट्टी विकसित करने के लिए इसे उपयुक्त विकल्प माना जा रहा है।
45 किलोमीटर क्षेत्र में विकसित होगी हरियाली 
प्राधिकरण की योजना नोएडा-ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेसवे के आसपास लगभग 45 किलोमीटर के क्षेत्र को हरित पट्टी में बदलने की है। इस परियोजना में बांस के साथ अन्य उपयुक्त प्रजातियों के पौधे लगाने की संभावना भी है, ताकि एक विविध और टिकाऊ हरित क्षेत्र तैयार किया जा सके।
यह क्षेत्र नोएडा और ग्रेटर नोएडा के बीच महत्वपूर्ण संपर्क मार्ग है। एक्सप्रेसवे पर रोजाना बड़ी संख्या में वाहन चलते हैं। ऐसे में सड़क के किनारे घनी हरियाली विकसित होने से क्षेत्र के पर्यावरण पर सकारात्मक प्रभाव पड़ने की उम्मीद है।
प्राधिकरण का मानना है कि हरित पट्टी सड़क के किनारे एक प्राकृतिक बफर के रूप में भी काम कर सकती है। इससे वाहनों से निकलने वाले धुएं और धूल के प्रभाव को आसपास के इलाकों तक पहुंचने से कुछ हद तक कम करने में मदद मिल सकती है।
प्रदूषण कम करने पर जोर
नोएडा और दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण लंबे समय से बड़ी चुनौती बना हुआ है। सर्दियों में प्रदूषण का स्तर बढ़ने के साथ वाहनों से निकलने वाले उत्सर्जन और सड़क की धूल पर भी सवाल उठते हैं।
ऐसे में प्राधिकरण की बांस कॉरिडोर योजना को शहरी हरित बुनियादी ढांचे के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है। पौधों की घनी पट्टी धूल को रोकने और कार्बन अवशोषण में योगदान दे सकती है। हालांकि, वास्तविक प्रदूषण में कितनी कमी आएगी, यह पौधों की संख्या, प्रजाति, रखरखाव और स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
इस योजना का उद्देश्य किसी एक मौसम में प्रदूषण घटाना भर नहीं है। प्राधिकरण इसे दीर्घकालिक पर्यावरणीय परियोजना के रूप में विकसित करना चाहता है।
भूजल संरक्षण में भी मदद की उम्मीद
नोएडा में तेजी से बढ़ती आबादी और निर्माण गतिविधियों के बीच भूजल संरक्षण भी महत्वपूर्ण मुद्दा बन चुका है। प्राधिकरण के प्रस्तावित हरित कॉरिडोर से वर्षाजल को जमीन में पहुंचाने और मिट्टी के संरक्षण में मदद मिलने की उम्मीद है।
यदि हरित पट्टी के साथ उचित जल निकासी और वर्षाजल संचयन की व्यवस्था विकसित की जाती है, तो बारिश के पानी को तेजी से नालों में बह जाने के बजाय जमीन में पहुंचाने की संभावना बढ़ सकती है।
हालांकि, यह लाभ केवल पौधे लगाने से स्वतः हासिल नहीं होगा। इसके लिए परियोजना की डिजाइन, मिट्टी की प्रकृति, सिंचाई व्यवस्था और वर्षाजल प्रबंधन को वैज्ञानिक तरीके से विकसित करना जरूरी होगा।
बांस को ही क्यों दी जा रही प्राथमिकता?
बांस को तेजी से बढ़ने वाली वनस्पति के रूप में जाना जाता है। कई परिस्थितियों में यह कम समय में घना आवरण विकसित कर सकता है। सड़क किनारे हरित पट्टी के लिए इसकी ऊंचाई और घनत्व उपयोगी हो सकते हैं।
इसके अलावा बांस का उपयोग पर्यावरणीय परियोजनाओं में मिट्टी संरक्षण और हरित क्षेत्र विस्तार के लिए भी किया जाता है। राष्ट्रीय राजमार्गों के किनारे भी बांस और घने पौधारोपण के जरिए ग्रीन कॉरिडोर विकसित करने की पहलें चल चुकी हैं। भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने भी बांस प्लांटेशन, घने पौधारोपण और वर्टिकल लैंडस्केपिंग को अपने ग्रीन कॉरिडोर प्रयासों का हिस्सा बताया है।
नोएडा की परियोजना में भी इसी तरह सड़क और पर्यावरणीय बुनियादी ढांचे को एक साथ जोड़ने का प्रयास दिखाई देता है।
सिर्फ ऑक्सीजन नहीं, जैव विविधता पर भी ध्यान
परियोजना को लेकर सामने आई जानकारी में पर्यावरणीय लाभों को व्यापक रूप से देखा गया है। इसका लक्ष्य केवल ऑक्सीजन उत्पादन या सड़क की खूबसूरती बढ़ाना नहीं है। हरित क्षेत्र विकसित होने से पक्षियों, छोटे जीवों और स्थानीय जैव विविधता के लिए भी आवास तैयार हो सकता है।
यदि बांस के साथ स्थानीय और देशज प्रजातियों के पौधों को शामिल किया जाता है, तो हरित पट्टी का पारिस्थितिक महत्व और बढ़ सकता है। इससे एक ऐसी हरित पट्टी विकसित हो सकती है जो सड़क और आसपास के शहरी क्षेत्रों के बीच प्राकृतिक बफर का काम करे।इसके लिए पौधों का चयन स्थानीय जलवायु और मिट्टी के अनुसार करना बेहद महत्वपूर्ण होगा।
जानवरों से जुड़े खतरे को भी कम करने का दावा
एक्सप्रेसवे के आसपास हरियाली बढ़ने के साथ वन्यजीवों और आवारा पशुओं की आवाजाही का सवाल भी महत्वपूर्ण है। सड़क किनारे योजनाबद्ध हरित क्षेत्र को इस तरह विकसित करने की जरूरत होगी कि वह जानवरों को सीधे तेज रफ्तार वाले एक्सप्रेसवे की ओर आकर्षित न करे।
प्राधिकरण की योजना में पर्यावरणीय लाभों के साथ ऐसे व्यावहारिक पहलुओं को भी ध्यान में रखने की बात सामने आई है। यदि हरित कॉरिडोर को उचित बैरियर, सिंचाई और रखरखाव व्यवस्था के साथ विकसित किया जाता है, तो सड़क सुरक्षा और हरित विकास के बीच संतुलन बनाया जा सकता है।
120 साल तक लाभ देने का दावा
परियोजना से जुड़े दावों में इसे लंबे समय तक पर्यावरणीय लाभ देने वाली पहल के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इसी वजह से इसे नोएडा के भविष्य की हरित योजना के तौर पर देखा जा रहा है।
हालांकि, किसी भी पौधारोपण परियोजना की वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि लगाए गए पौधों में से कितने लंबे समय तक जीवित रहते हैं। केवल पौधे लगाने का लक्ष्य पर्याप्त नहीं होता। उनकी नियमित सिंचाई, सुरक्षा, छंटाई और बीमारी से बचाव भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
इसलिए बांस कॉरिडोर की सफलता के लिए निगरानी और रखरखाव की स्थायी व्यवस्था बनाना जरूरी होगा।
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नोएडा के बदलते पर्यावरणीय मॉडल की तस्वीर
नोएडा पिछले कुछ वर्षों में तेजी से विकसित होने वाला शहरी और औद्योगिक केंद्र बन चुका है। नई सड़कें, एक्सप्रेसवे, मेट्रो, आवासीय परियोजनाएं और औद्योगिक क्षेत्र शहर के विस्तार को गति दे रहे हैं। ऐसे में विकास के साथ पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखना प्राधिकरण के लिए बड़ी चुनौती है।
बांस कॉरिडोर जैसी परियोजना इसी चुनौती का जवाब देने की कोशिश के रूप में देखी जा सकती है। सड़क निर्माण और हरित विकास को अलग-अलग गतिविधियों के बजाय एक ही शहरी योजना का हिस्सा बनाना भविष्य में महत्वपूर्ण हो सकता है।
निष्कर्ष
नोएडा-ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेसवे के किनारे प्रस्तावित 45 किलोमीटर लंबे बांस कॉरिडोर की योजना शहर के हरित विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल हो सकती है। प्राधिकरण इसे प्रदूषण कम करने, हरियाली बढ़ाने, भूजल संरक्षण और जैव विविधता को बढ़ावा देने से जोड़कर देख रहा है।
हालांकि, इस परियोजना की वास्तविक सफलता केवल बांस लगाने की संख्या से तय नहीं होगी। पौधों का जीवित रहना, वैज्ञानिक प्रजाति चयन, जल प्रबंधन, नियमित रखरखाव और सड़क सुरक्षा के साथ संतुलन इसकी सफलता की कुंजी होंगे।
यदि योजना को वैज्ञानिक तरीके से लागू किया जाता है और लंबे समय तक उसका रखरखाव सुनिश्चित होता है, तो नोएडा-ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेसवे का यह हिस्सा केवल यातायात का मार्ग नहीं, बल्कि एनसीआर के एक बड़े ग्रीन कॉरिडोर के रूप में विकसित हो सकता है।

