अंतरराष्ट्रीय व्यापार में माल भेजने और मंगाने के दौरान अक्सर यह उलझन रहती है कि माल की डिलीवरी, बीमा और ढुलाई की जिम्मेदारी किसकी होगी। अगर यह पहले से साफ न हो, तो एक्सपोर्टर और इंपोर्टर के बीच विवाद होने की संभावना बढ़ जाती है। इसी उलझन को दूर करने के लिए Incoterms का इस्तेमाल किया जाता है, जो पूरी दुनिया में मान्य व्यापारिक शर्तों का एक सेट है।
Incoterms क्या है?
यह इंटरनेशनल चैंबर ऑफ कॉमर्स द्वारा तय किए गए मानक व्यापारिक शब्दों का एक सेट है, जो यह स्पष्ट करता है कि माल की डिलीवरी, जोखिम, बीमा और लागत की जिम्मेदारी खरीदार और विक्रेता के बीच किस तरह बंटती है। इसका पूरा नाम इंटरनेशनल कमर्शियल टर्म्स है और इसे नियमित अंतराल पर अपडेट भी किया जाता है।
हर टर्म तीन अक्षरों का होता है, जैसे FOB, CIF या EXW, और हर एक की अपनी अलग शर्तें और जिम्मेदारियां होती हैं। Incoterms को अपनाने से खरीदार और विक्रेता दोनों को एक जैसी समझ मिलती है, चाहे वे दुनिया के किसी भी हिस्से में कारोबार कर रहे हों।
Incoterms कैसे काम करता है?
हर टर्म यह तय करता है कि माल कब और कहां विक्रेता से खरीदार के हाथों में जाता है, और किस बिंदु तक की जिम्मेदारी किसकी होगी। उदाहरण के लिए FOB में विक्रेता की जिम्मेदारी माल को जहाज पर चढ़ाने तक होती है, जबकि उसके बाद का जोखिम खरीदार का होता है। वहीं CIF में विक्रेता को माल की ढुलाई और बीमा दोनों की व्यवस्था करनी होती है, जब तक माल तय बंदरगाह तक न पहुंच जाए।
Incoterms में कुल 11 अलग-अलग टर्म होते हैं, जो अलग-अलग परिवहन साधनों और व्यापारिक स्थितियों के हिसाब से इस्तेमाल किए जाते हैं। सही टर्म चुनने से पहले माल की प्रकृति, परिवहन का तरीका और दोनों पक्षों की जोखिम क्षमता को ध्यान में रखना जरूरी होता है।
फायदे और इस्तेमाल
इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि खरीदार और विक्रेता के बीच जिम्मेदारियों को लेकर कोई भ्रम नहीं रहता, जिससे विवाद की संभावना काफी कम हो जाती है। यह इंश्योरेंस, कस्टम क्लीयरेंस और ढुलाई की लागत को पहले से साफ करने में भी मदद करता है, जिससे दोनों पक्ष सही तरीके से बजट बना सकते हैं।

भारत में एक्सपोर्ट-इंपोर्ट कारोबार करने वाली लगभग हर कंपनी अपने कॉन्ट्रैक्ट में Incoterms का इस्तेमाल करती है, चाहे वह छोटा व्यापारी हो या बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी। हालांकि हर टर्म की अपनी बारीकियां होती हैं, इसलिए कॉन्ट्रैक्ट साइन करने से पहले सही टर्म चुनना और उसकी शर्तों को अच्छी तरह समझना जरूरी होता है।
ध्यान रखने योग्य बातें
कॉन्ट्रैक्ट में टर्म लिखते समय उसका सही वर्जन जैसे 2020 या नया अपडेट भी साफ तौर पर लिखना चाहिए, ताकि बाद में कोई गलतफहमी न हो। माल की प्रकृति और परिवहन के तरीके के हिसाब से सही टर्म चुनना जरूरी है, क्योंकि गलत टर्म से लागत और जोखिम दोनों बढ़ सकते हैं। जटिल या बड़े कॉन्ट्रैक्ट में किसी ट्रेड फाइनेंस एक्सपर्ट या लीगल सलाहकार की मदद लेना बेहतर विकल्प माना जाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
सवाल 1: Incoterms किसने बनाए हैं
इसे इंटरनेशनल चैंबर ऑफ कॉमर्स ने बनाया है, जो इसे समय-समय पर अपडेट भी करती रहती है।
सवाल 2: इसमें कुल कितने टर्म होते हैं
वर्तमान में कुल 11 अलग-अलग टर्म होते हैं, जो अलग-अलग परिवहन और व्यापारिक स्थितियों के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं।
सवाल 3: FOB और CIF में क्या फर्क है
FOB में विक्रेता की जिम्मेदारी माल जहाज पर चढ़ाने तक होती है, जबकि CIF में विक्रेता को ढुलाई और बीमा दोनों की व्यवस्था करनी होती है।
सवाल 4: क्या छोटे एक्सपोर्टर के लिए भी यह जरूरी है
हां, चाहे कारोबार छोटा हो या बड़ा, सही टर्म चुनने से जिम्मेदारियां और लागत दोनों स्पष्ट हो जाती हैं।
सवाल 5: Incoterms की पूरी जानकारी कहां मिल सकती है
इसकी विस्तृत और आधिकारिक जानकारी ICC की वेबसाइट पर उपलब्ध है।
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उपरोक्त जानकारी गूगल और विभिन्न वेबसाइट/समाचार माध्यमों से ली गई है। सटीकता की गारंटी नहीं है। किसी भी बड़े बिजनेस या फाइनेंशियल फैसले से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें।

