HomeNational Headlines‘फॉर्म 6 में किसने बदलाव किया, फैसला सर्वसम्मति से हुआ या बहुमत...

‘फॉर्म 6 में किसने बदलाव किया, फैसला सर्वसम्मति से हुआ या बहुमत से?’ CEC के निलंबन की मांग सुप्रीम कोर्ट ने ठुकराई

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision (SIR) को  चल रहे विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के निलंबन की मांग को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। अदालत ने सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं से कई अहम सवाल पूछे और यह जानना चाहा कि मतदाता सूची में नए मतदाताओं के नाम जोड़ने से जुड़े Form 6 में बदलाव आखिर किस स्तर पर किया गया था।

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने यह भी सवाल उठाया कि चुनाव आयोग में किसी महत्वपूर्ण फैसले को सर्वसम्मति से लिया गया था या बहुमत के आधार पर। अदालत की टिप्पणियां ऐसे समय आई हैं जब SIR की प्रक्रिया को लेकर विपक्षी दलों और नागरिक संगठनों की ओर से चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं।

CEC के निलंबन की मांग पर अदालत का रुखCEC

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ कार्रवाई और उनके निलंबन की मांग की गई थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस मांग को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

अदालत का रुख यह रहा कि किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ इस तरह की कार्रवाई के लिए उचित संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया का पालन जरूरी है। केवल आरोपों या राजनीतिक असहमति के आधार पर मुख्य चुनाव आयुक्त को निलंबित करने का आदेश अदालत नहीं दे सकती।

मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति तथा हटाने की व्यवस्था संविधान में निर्धारित है। इसलिए अदालत ने इस मामले में अपने अधिकार क्षेत्र और संवैधानिक सीमाओं को ध्यान में रखते हुए हस्तक्षेप करने से परहेज किया।

Form 6 पर सुप्रीम कोर्ट का सवाल

सुनवाई का एक महत्वपूर्ण हिस्सा Form 6 को लेकर रहा। Form 6 का इस्तेमाल मतदाता सूची में नए मतदाता के रूप में नाम शामिल कराने के लिए किया जाता है।

अदालत ने सवाल उठाया कि इस फॉर्म में बदलाव किसने किया और इसके पीछे क्या प्रक्रिया अपनाई गई। पीठ ने यह जानने की कोशिश की कि यदि फॉर्म में कोई महत्वपूर्ण बदलाव हुआ है तो क्या वह चुनाव आयोग के स्तर पर सामूहिक निर्णय था या किसी अधिकारी के स्तर पर लिया गया फैसला।

अदालत के सवालों का उद्देश्य यह समझना था कि मतदाता सूची की प्रक्रिया में बदलाव किस वैधानिक और प्रशासनिक आधार पर किए गए।

SIR विवाद में यह सवाल महत्वपूर्ण है क्योंकि मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और सत्यापन की प्रक्रिया सीधे नागरिकों के मतदान के अधिकार से जुड़ी है।

‘फैसला सर्वसम्मति से हुआ या बहुमत से?’

सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाया। अदालत ने पूछा कि संबंधित निर्णय सर्वसम्मति से लिया गया था या बहुमत के आधार पर।

यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि चुनाव आयोग एक बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्था है। मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त मिलकर कई महत्वपूर्ण निर्णय लेते हैं।

यदि किसी फैसले पर सभी सदस्यों की सहमति नहीं थी, तो यह जानना जरूरी हो जाता है कि असहमति किस मुद्दे पर थी और अंतिम फैसला किस प्रक्रिया के तहत लिया गया।

हालांकि, अदालत का यह सवाल अपने आप में यह निष्कर्ष नहीं देता कि चुनाव आयोग का निर्णय अवैध था। अदालत फिलहाल प्रक्रिया और निर्णय लेने के तरीके को समझने की कोशिश कर रही है।

SIR को लेकर जारी है राजनीतिक विवाद

SIR पिछले कुछ समय से राजनीतिक विवाद का बड़ा मुद्दा बना हुआ है। विपक्षी दलों का आरोप है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया में बड़ी संख्या में पात्र मतदाताओं के नाम प्रभावित हो सकते हैं।

विपक्ष का कहना है कि यदि किसी वास्तविक मतदाता का नाम सूची से हट जाता है तो वह अपने लोकतांत्रिक अधिकार से वंचित हो सकता है। इसलिए प्रक्रिया में पर्याप्त पारदर्शिता और नागरिकों को अपनी आपत्ति दर्ज कराने का अवसर मिलना चाहिए।

दूसरी ओर, चुनाव आयोग का तर्क है कि मतदाता सूची को शुद्ध और अद्यतन रखना उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी है। मृत, डुप्लीकेट या अपात्र मतदाताओं के नाम हटाना निष्पक्ष चुनाव के लिए आवश्यक है।

आयोग यह भी कहता रहा है कि पात्र नागरिकों को सूची में शामिल करने और गलत तरीके से हटाए गए नामों को सुधारने के लिए निर्धारित प्रक्रियाएं मौजूद हैं।

अदालत के सामने असली सवाल क्या है?

SIR मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने मूल सवाल केवल यह नहीं है कि चुनाव आयोग को मतदाता सूची में संशोधन करने का अधिकार है या नहीं। इससे जुड़े कई अन्य सवाल भी हैं।

इनमें सबसे महत्वपूर्ण है कि किसी पात्र नागरिक का नाम मतदाता सूची से हटाने से पहले उसे पर्याप्त सूचना और अपनी बात रखने का अवसर दिया गया या नहीं।

इसके अलावा, अदालत यह भी देख सकती है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया कानून और संविधान में निर्धारित अधिकारों के अनुरूप है या नहीं।

मतदाता सूची लोकतांत्रिक चुनाव की बुनियाद है। यदि सूची में गलत नाम शामिल हैं तो निष्पक्ष चुनाव प्रभावित हो सकता है, लेकिन यदि पात्र नागरिकों के नाम गलती से हटाए जाते हैं तो इससे भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर गंभीर असर पड़ सकता है।

CEC की भूमिका पर बढ़ता राजनीतिक दबाव

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर विपक्षी दलों और कुछ नागरिक संगठनों का विरोध लगातार बढ़ रहा है। प्रदर्शनकारियों की ओर से उनके इस्तीफे की मांग भी की गई है।

विपक्ष का आरोप है कि चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता को लेकर सवाल हैं। वहीं चुनाव आयोग अपनी संवैधानिक स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर जोर देता है।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा CEC के निलंबन की मांग ठुकराए जाने के बाद अब विवाद का केंद्र न्यायिक प्रक्रिया और SIR की वैधानिकता पर अधिक केंद्रित हो सकता है।

आगे और समाचार पढ़े:

आगे की सुनवाई में क्या होगा?

Form 6 में बदलाव, चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया और SIR के दौरान अपनाई गई प्रक्रिया जैसे सवाल आगे की सुनवाई में महत्वपूर्ण रह सकते हैं।

अदालत संभवतः यह देखेगी कि चुनाव आयोग ने अपने निर्णय के लिए किस कानूनी प्रावधान का इस्तेमाल किया और मतदाताओं के अधिकारों की सुरक्षा के लिए क्या कदम उठाए गए।

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने CEC के निलंबन की मांग को स्वीकार नहीं किया है, लेकिन सुनवाई के दौरान पूछे गए सवाल बताते हैं कि अदालत प्रक्रिया से जुड़े पहलुओं को गंभीरता से देख रही है।

SIR को लेकर जारी विवाद में अब Form 6 में बदलाव किसने किया, निर्णय कैसे लिया गया और मतदाताओं के अधिकारों की सुरक्षा किस तरह सुनिश्चित की गई—ये सवाल आगे की कानूनी बहस के केंद्र में रह सकते हैं।

अंततः चुनावी लोकतंत्र की विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करती है कि मतदाता सूची कितनी सटीक है और उसे तैयार करने की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी। सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई इसी व्यापक सवाल की जांच की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

 

WhatsApp Group
Join Now
PandeyAbhishek
PandeyAbhishek
Abhishek Pandey is a skilled news editor with 4-5 years of experience in the field, he covers mostly political, world news, sports and etc.
RELATED ARTICLES
- Advertisment -

Most Popular