विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने बदलती वैश्विक व्यवस्था और प्रमुख शक्तियों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा को लेकर अमेरिका की भूमिका पर अहम टिप्पणी की है। 4 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली में आयोजित 62वें म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन (Munich Security Conference) के दौरान जयशंकर ने कहा कि अमेरिका ने अपनी वैश्विक भूमिका में ऐसा बदलाव किया है, जिसके कारण वह एक तरह से “जानबूझकर अधिक अकेली शक्ति” बन गया है। उन्होंने इसे अमेरिका की “चयनित रणनीतिक दिशा” से जोड़कर देखा।
अमेरिका की भूमिका में ‘रेडिकल रीपोजिशनिंग’
जयशंकर ने कहा कि आज की वैश्विक परिस्थितियों की सबसे प्रमुख विशेषताओं में से एक अमेरिका की “radical repositioning” यानी उसकी रणनीतिक और वैश्विक भूमिका में बड़ा बदलाव है। उनके मुताबिक यह बदलाव केवल परिस्थितियों का परिणाम नहीं है, बल्कि इसमें अमेरिकी नीति की पसंद भी दिखाई देती है।
उन्होंने कहा कि अमेरिका ने एक ऐसे रुख को अपनाया है, जिसके चलते वह “deliberately become a lonelier power” यानी जानबूझकर अधिक अकेली शक्ति बन गया है। जयशंकर की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब अमेरिका की विदेश और व्यापार नीति को लेकर दुनिया के कई देशों के साथ उसके संबंधों में नए तरह के समीकरण देखने को मिल रहे हैं।
चीन का बढ़ता प्रभाव भी अहम कारक
जयशंकर ने बदलती वैश्विक व्यवस्था की दूसरी बड़ी विशेषता चीन के उभार को बताया। उन्होंने कहा कि चीन की आर्थिक और राजनीतिक ताकत बढ़ रही है और इसका असर अंतरराष्ट्रीय शक्ति संतुलन पर पड़ रहा है।
उनके मुताबिक अमेरिका और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा अब केवल दोनों देशों तक सीमित नहीं रही है। इसका प्रभाव दूसरे देशों की विदेश नीति, अर्थव्यवस्था, तकनीक और रणनीतिक फैसलों पर भी पड़ रहा है। जयशंकर ने कहा कि दुनिया अब एक ऐसे दौर में है जहां देशों के पास मौजूद आर्थिक, तकनीकी और रणनीतिक क्षमताएं प्रतिस्पर्धा में “leverage” के तौर पर इस्तेमाल की जा रही हैं।
‘लेवरेज’ का हथियार की तरह इस्तेमाल
विदेश मंत्री ने वैश्विक प्रतिस्पर्धा के एक और पहलू की ओर ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि देशों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने उपलब्ध संसाधनों और प्रभाव के साधनों के इस्तेमाल का तरीका बदल दिया है।
उनके अनुसार, किसी देश के पास आर्थिक ताकत, तकनीक, बाजार, ऊर्जा, सप्लाई चेन या रणनीतिक क्षमता जैसी जो भी ताकत है, उसका इस्तेमाल अब अंतरराष्ट्रीय संबंधों में प्रभाव बढ़ाने के लिए किया जा सकता है। उन्होंने इसे “weaponisation of leverage” की स्थिति बताया।
हालांकि जयशंकर ने साथ ही यह भी रेखांकित किया कि प्रतिस्पर्धा के बावजूद दुनिया के देश एक-दूसरे पर निर्भर हैं। यानी वैश्विक राजनीति में टकराव और सहयोग दोनों एक साथ मौजूद हैं।
मिडिल और उभरती शक्तियों के लिए नई चुनौती
जयशंकर ने कहा कि अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा के बीच उभरती और मिडिल पावर देशों के सामने अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखने की चुनौती है। ऐसे देश अब अपने साझेदारियों के दायरे को बढ़ाने, जोखिम कम करने और अलग-अलग देशों के साथ संबंधों में विविधता लाने पर जोर दे रहे हैं।
भारत भी लंबे समय से विभिन्न शक्तियों के साथ अपने हितों के आधार पर संबंध बनाए रखने की नीति पर जोर देता रहा है। जयशंकर के मौजूदा बयान में भी बहुध्रुवीय और अधिक लचीली वैश्विक व्यवस्था की आवश्यकता का संकेत दिखाई देता है।
भारत की भूमिका पर भी जयशंकर का जोर
इसी कार्यक्रम में जयशंकर ने भारत की भविष्य की भूमिका को लेकर भी सकारात्मक दृष्टिकोण व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि भारत के पास आर्थिक विकास, जनसांख्यिकीय स्थिति और नए आर्थिक अवसरों के कारण आने वाले वर्षों में वैश्विक शक्ति संरचना में तेजी से ऊपर जाने की क्षमता है।
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि बदलती दुनिया में भारत को एक साथ कई प्रमुख शक्तियों के साथ अपने संबंधों को आगे बढ़ाना होगा। हाल के वर्षों में भारत अमेरिका, रूस, यूरोप और अन्य प्रमुख साझेदारों के साथ अलग-अलग क्षेत्रों में सहयोग को आगे बढ़ाता रहा है।
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रूस के साथ संबंधों का भी किया जिक्र
जयशंकर ने भारत-रूस संबंधों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि जब भारत की क्षेत्रीय अखंडता और सुरक्षा के सामने चुनौतियां थीं, उस दौर में रूस ने भारत का साथ दिया था। उन्होंने दोनों देशों के बीच 1950 के दशक से चले आ रहे संबंधों को वर्तमान संबंधों की विरासत से जोड़कर देखा।
जयशंकर की टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब वैश्विक राजनीति में अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा, रूस-यूक्रेन युद्ध, व्यापार तनाव और बदलती साझेदारियां अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को प्रभावित कर रही हैं। ऐसे में “lonelier power” वाली उनकी टिप्पणी को अमेरिका की बदलती वैश्विक रणनीतिक भूमिका पर भारत के आकलन के रूप में देखा जा रहा है।

