क्या इस मंदिर में सबसे पहले अश्वत्थामा करता है पूजा?  

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Asirgarh Fort: क्या सचमुच जिंदा है अश्वत्थामा?

Asirgarh Fort: यह दुनिया कई रहस्यों से भरी हुई है, इनमें से कुछ रहस्यों पर से पर्दा उठ जाता है वहीं कुछ रहस्य ऐसे होते हैं जिन पर से पर्दा उठाना नामुमकिन होता है। इसी श्रेणी में आता है असीरगढ़ का किला (Asirgarh Fort) जहां भगवान शिव का एक प्राचीन मंदिर मौजूद है।

जिस रहस्य कि हम बात कर रहे हैं वह महाभारत काल से अब तक रहस्य ही बना हुआ है, दरअसल यह रहस्य महाभारत काल के पात्र अश्वत्थामा से जुड़ा हुआ है, ऐसा कहा जाता है कि अश्वत्थामा आज भी जिंदा है और वह अपने माथे के घाव को लेकर आज भी जगह-जगह भटक रहा है।

ऐसा दावा किया जाता है कि मध्यप्रदेश के बुरहानपुर जिले में मौजूद असीरगढ़ किले (Asirgarh Fort) में एक प्राचीन शिव मंदिर स्थित है, इसी शिव मंदिर (Asirgarh Fort) में अस्वत्थामा रोज ब्रह्म मूहरत में आकर भगवान शिव की पूजा अर्चना करते हैं और उनपर जल चढ़ाते हैं।

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स्थानीय लोगों के मुताबिक अश्वत्थामा सबसे पहले आकर मंदिर (Asirgarh Fort) में मौजूद शिवलिंग पर जल, फूल और गुलाल चढ़ाते हैं और हैरानी की बात तो ये है कि इन्हें मंदिर में आते और जाते आजतक किसी ने नहीं देखा है और न ही किसी ने किसी अन्य व्यक्ति को मंदिर (Asirgarh Fort) में प्रवेश करते देखा है और न ही बाहर जाते हुए, लेकिन बावजूद इसके जब रोज सुबह मंदिर (Asirgarh Fort) का द्वार खोला जाता है तो शिवलिंग पर फूल, गुलाल और जल पहले से ही चढ़ा दिखाई देता है।

इस पर कई बार शोध किया गया यहां तक की कई लोग और न्यूज़ चैनल वालों ने भी इस जगह (Asirgarh Fort) पर पूरी पूरी रात गुजारी लेकिन उन्हें भी न ही मंदिर में प्रवेश करते हुए कोई दिखाई दिया और न ही मंदिर (Asirgarh Fort) से बाहर आते हुए, लेकिन जब सुबह के समय में मंदिर के द्वार को खोला गया तो ये पाया गया कि मंदिर (Asirgarh Fort) में किसी ने पहले से ही पूजा की हुई है, जिसे देख हर कोई हैरान था।    

कई बार शोध किए जाने के बाद भी आजतक कोई भी इस रहस्य पर से पर्दा नहीं उठा पाया है कि आखिर कौन इस मंदिर (Asirgarh Fort) में आकर पूजा करके चला जाता है और किसी को भी इसकी भनक तक नहीं लग पाती, हालांकि स्थानीय लोगों की मानें तो ये पूजा अश्वत्थामा ही करता है जिसे देखने का दावा कई गांव वालों द्वारा किया गया है।

जो भी व्यक्ति अश्वत्थामा को देखने का दावा करते हैं उनका कहना है कि अश्वत्थामा के माथे पर से हमेशा खून बहता रहता है और शरीर में कई कीड़े चलते रहते हैं। दरअसल महाभारत काल में अश्वत्थामा को भगवान श्रीकृष्ण ने एक श्राप दिया था जिसके कारण अश्वत्थामा आज भी जंगलों में भटक रहा है। ये श्राप देने के पीछे का कराण था अश्वत्थामा द्वारा एक अजन्में बच्चे की हत्या करना।

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आपको बता दें कि अश्वत्थामा गुरू द्रोणाचार्य के पुत्र थे और जब महाभारत के युद्ध के दौरान गुरू द्रोणाचार्य की मृत्यु हुई तो ये खबर सुनने के बाद अश्वथामा गुस्से में आगबबूला हो गए जिसके बाद उन्हें बस अब किसी भी हालत में अपने पिता की मृत्यु का बदला लेना था।

गुरू द्रोणाचार्य की मौत का बदला लेने के लिए अश्वत्थामा ने रात का सहारा लिया और उसने रात होते ही द्रौपदी के पांचों पुत्रों को मौत के घाट उतार दिया। इस खबर को सुनने के बाद अर्जुन अपना आपा खो बैठे और वो अश्वथामा को मारने के लिए उसका पीछा करने लगे। अब अपने आप को खतरे में देख अश्वत्थामा ब्रह्मास्त्र चला देते हैं और वो ब्रह्मास्त्र सीधे जाकर अभिमन्यु की पत्नी के गर्भ में जाकर लगता है और अजन्में अभिमन्यु पुत्र परीक्षित की मृत्यु हो जाती है। अब अश्वत्थामा को ब्रह्मास्त्र चलाने का ज्ञान तो था मगर ब्रह्मास्त्र को वापिस लेने का ज्ञान नहीं था।

जिसके बाद भगवान श्री कृष्ण अश्वत्थामा द्वारा चलाए गए ब्रह्मास्त्र से परीक्षित की रक्षा करते हैं और अश्वत्थामा को एक अजन्में बच्चे की हत्या करने के आरोप में दंडस्वरूप उसके माथे पर लगी मणि निकालकर उन्हें तेजहीन कर देते हैं, जिसके कारण उनके माथे से खून बहने लगता है और साथ ही उसे श्राप देते हैं कि जब तक धरती पर जीवन रहेगा तब तक अश्वत्थामा अपने इन जख्मों के साथ धरती पर भटकता रहेगा।

अश्वत्थामा के माथे पर मौजूद उस मणि में इनता तेज और शक्ति थी कि वो अश्वत्थामा को सभी से बचाकर रखता था और जैसे ही श्री कृष्ण ने उनके माथे से वो मणि उखाड़ दी वैसे ही अश्वत्थामा की सभी शक्तियां भी चली गई। इस मणि के निकलने के बाद जो घाव अश्वत्थामा के माथे पर था वो आजतक वैसा का वैसा ही है, उसी प्रकार उसके माथे से खून बहता रहता है जिसे कई लोगों ने देखने का दावा भी किया है।

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