कम खर्च और आसान ट्रेडिंग की वजह से ETF नए निवेशकों में तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं, लेकिन निवेश से पहले ETF Risk को समझना उतना ही जरूरी है। कई लोग मान लेते हैं कि इंडेक्स को फॉलो करने वाला फंड पूरी तरह सुरक्षित होता है। सच यह है कि हर ETF के साथ कुछ ऐसे जोखिम जुड़े होते हैं, जो चुपचाप आपके रिटर्न को कम कर सकते हैं।
ETF Risk को समझना क्यों जरूरी है?
ETF शेयर की तरह एक्सचेंज पर खरीदे बेचे जाते हैं, इसलिए इनकी कीमत सिर्फ फंड की NAV से नहीं, बल्कि बाजार में मांग और सप्लाई से भी तय होती है। यही बात इसे साधारण म्यूचुअल फंड से अलग बनाती है। अगर आप इन जोखिमों को पहले से जानते हैं, तो सही ETF चुनना, सही समय पर खरीदना और नुकसान से बचना काफी आसान हो जाता है।
कम लिक्विडिटी का खतरा
लिक्विडिटी का मतलब है कि किसी ETF को बाजार में कितनी आसानी से खरीदा या बेचा जा सकता है। कई छोटे या नए ETF में रोज बहुत कम सौदे होते हैं। ऐसे ETF में खरीद और बिक्री के भाव के बीच का अंतर यानी Bid Ask Spread बड़ा होता है।
नतीजा यह होता है कि आपको खरीदते समय ज्यादा कीमत चुकानी पड़ती है और बेचते समय कम दाम मिलता है। कम वॉल्यूम वाले ETF में बड़ी रकम एक साथ बेचना भी मुश्किल हो सकता है। इसलिए हमेशा उस ETF की रोज की ट्रेडिंग वॉल्यूम जरूर देखें, क्योंकि यही सबसे आम ETF Risk है।
प्रीमियम और डिस्काउंट की समस्या
हर ETF की एक असली कीमत होती है, जिसे iNAV कहा जाता है और यह दिन भर अपडेट होती रहती है। जब बाजार में किसी ETF की मांग अचानक बढ़ जाती है, तो उसका भाव iNAV से ऊपर चला जाता है, जिसे प्रीमियम कहते हैं।
इसी तरह घबराहट में बिकवाली होने पर भाव iNAV से नीचे आ जाता है, जिसे डिस्काउंट कहते हैं। Gold और Silver ETF में तेज मांग के दौरान ऐसा प्रीमियम कई बार देखा गया है, इसलिए इस ETF Risk से बचने के लिए खरीदने से पहले iNAV और बाजार भाव की तुलना जरूर करें।
बाजार के उतार चढ़ाव का असर
ETF उसी इंडेक्स या एसेट की तरह चलता है जिसे वह फॉलो करता है। अगर Nifty 50 गिरता है, तो Nifty ETF भी उतना ही गिरेगा, फंड मैनेजर इसे रोकने के लिए कुछ नहीं करता। Bank ETF या IT ETF जैसे सेक्टोरल फंड में यह ETF Risk और बढ़ जाता है, क्योंकि पूरा पैसा एक ही सेक्टर में लगा होता है। इंटरनेशनल ETF में डॉलर और रुपये के भाव का उतार चढ़ाव भी रिटर्न पर असर डालता है।
Tracking Difference और Tracking Error
Tracking Difference का मतलब ETF के रिटर्न और उसके इंडेक्स के रिटर्न में फर्क। जैसे मान लीजिए, इंडेक्स ने एक साल में 12 प्रतिशत रिटर्न दिया और ETF ने 11.6 प्रतिशत, तो 0.4 प्रतिशत का फर्क ही Tracking Difference है। यह फर्क फंड के खर्च, कैश होल्डिंग, डिविडेंड मिलने में देरी और शेयरों की खरीद बिक्री की लागत की वजह से आता है।
वहीं Tracking Error बताता है कि यह फर्क समय के साथ कितना ऊपर नीचे होता रहता है। SEBI के नियमों के तहत फंड हाउस को अपनी वेबसाइट पर Tracking Error और Tracking Difference की जानकारी देनी होती है। जिस ETF में ये दोनों लगातार कम हों, वही बेहतर माना जाता है।

निवेश से जुड़ी और उपयोगी जानकारी
अलग अलग ETF को समझने के लिए हमारी गाइड भारत में ETF कितने प्रकार के होते हैं पढ़ें। फंड के खर्च का गणित समझने के लिए Expense Ratio की पूरी जानकारी देखें। जोखिम कम करने के लिए सही एसेट एलोकेशन का तरीका भी जरूर समझें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
1. क्या ETF Risk म्यूचुअल फंड से ज्यादा होता है?
बाजार का जोखिम दोनों में लगभग बराबर होता है, लेकिन ETF में लिक्विडिटी और प्रीमियम डिस्काउंट जैसे अतिरिक्त जोखिम भी होते हैं।
2. कम लिक्विडिटी वाले ETF Risk को कैसे पहचानें?
NSE या BSE पर उस ETF की रोज की ट्रेडिंग वॉल्यूम और Bid Ask Spread देखें। कम वॉल्यूम और बड़ा स्प्रेड कम लिक्विडिटी का संकेत है।
3. Tracking Difference कितना होना चाहिए?
यह जितना कम हो उतना अच्छा है। एक ही इंडेक्स वाले कई ETF की तुलना करें और सबसे कम अंतर वाला चुनें, इससे ETF Risk भी घटता है।
4. ETF Risk कम करने का सबसे आसान तरीका क्या है?
ETF Risk कम करने का सबसे आसान तरीका बड़े फंड हाउस के ज्यादा वॉल्यूम वाले ETF चुनें, लिमिट ऑर्डर से खरीदें और पूरा पैसा एक ही सेक्टर में न लगाएं।
5. ETF से जुड़े नियम और दिशानिर्देश कहां देखें?
म्यूचुअल फंड और ETF से जुड़े आधिकारिक नियम और सर्कुलर SEBI की वेबसाइट पर देखे जा सकते हैं।
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उपरोक्त जानकारी गूगल और विभिन्न वेबसाइट/समाचार माध्यमों से ली गई है। सटीकता की गारंटी नहीं है। निवेश से पहले अपने वित्तीय सलाहकार से सलाह जरूर लें।

