नेपाल-तिब्बत सीमा पर आई विनाशकारी बाढ़ और मलबे के सैलाब की तस्वीर अब धीरे-धीरे साफ हो रही है। शुरुआती आशंकाओं के बाद अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) और उपग्रह तस्वीरों के विश्लेषण से संकेत मिला है कि इस आपदा के पीछे ग्लेशियर का ढहना और उसके साथ बड़े पैमाने पर बर्फ व चट्टानों का मलबा नीचे गिरना प्रमुख कारण था। देखते ही देखते यह मलबा नदी में पहुंचा और पानी के साथ मिलकर इतना तेज बहाव बना कि विशेषज्ञों ने इसकी तुलना ‘लिक्विड कंक्रीट’ से की।
24-26 अगस्त के बीच हिमालयी क्षेत्र में हुई इस प्राकृतिक आपदा ने नेपाल के रसुवा, नुवाकोट और धाडिंग समेत कई इलाकों को प्रभावित किया। नेपाल-चीन सीमा के पास स्थित रासुवागढ़ी क्षेत्र और भोटेकोशी नदी प्रणाली में पानी का स्तर अचानक तेजी से बढ़ा। सड़कों, पुलों, बिजली परियोजनाओं, घरों और कारोबारी प्रतिष्ठानों को भारी नुकसान पहुंचा। तिब्बत के ग्यारोंग क्षेत्र में भी बाढ़ और मलबे के बहाव ने व्यापक तबाही मचाई।
ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा टूटकर नीचे गिरा
रिपोर्ट के अनुसार, नेपाल-तिब्बत सीमा के पास एक ग्लेशियर का लगभग दो-तिहाई हिस्सा टूटकर करीब 1.2 किलोमीटर नीचे गिर गया। इस दौरान बड़ी मात्रा में बर्फ, चट्टान और मलबा ढलान से नीचे आया और नदी प्रणाली में जा मिला। इसके बाद जो बहाव बना, उसमें पानी के साथ भारी मात्रा में ठोस मलबा शामिल था। इसी वजह से इसका प्रभाव सामान्य बाढ़ की तुलना में कहीं अधिक विनाशकारी रहा।
उपग्रह तस्वीरों के पहले और बाद के विश्लेषण में प्रभावित क्षेत्र के भू-दृश्य में बड़े बदलाव दिखाई दिए हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक, इतनी बड़ी मात्रा में बर्फ और चट्टानों का अचानक खिसकना नदी के प्रवाह को कुछ समय के लिए रोक सकता है। इससे पानी और मलबा जमा होकर एक अस्थायी प्राकृतिक बांध जैसा प्रभाव पैदा कर सकता है। जब यह अवरोध टूटता है तो जमा पानी और मलबा बेहद तेज गति से नीचे की ओर बढ़ता है।
नदी का जलस्तर कुछ ही मिनटों में कई मीटर बढ़ा
इस आपदा की भयावहता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि त्रिशूली नदी का जलस्तर करीब 30 मिनट के भीतर लगभग नौ मीटर तक बढ़ गया। मालेखु नदी में भी जलस्तर लगभग सात मीटर बढ़ने की जानकारी सामने आई है। अचानक हुए इस जलस्तर परिवर्तन ने निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को संभलने तक का मौका नहीं दिया।
तेज बहाव अपने साथ चट्टानें, पेड़, मिट्टी और अन्य मलबा लेकर आगे बढ़ा। इसी कारण नदी के रास्ते में आने वाली सड़कें और पुल बड़ी आसानी से क्षतिग्रस्त हो गए। कई स्थानों पर संपर्क टूट गया और राहत दलों को प्रभावित क्षेत्रों तक पहुंचने में भी कठिनाई हुई।
शुरुआती भूकंप की आशंका, बाद में बदला आकलन
आपदा के शुरुआती घंटों में एक 4.4 तीव्रता के भूकंप को ग्लेशियर टूटने की संभावित वजह माना गया था। घटनास्थल के आसपास भूकंपीय गतिविधि दर्ज होने की जानकारी भी सामने आई थी। हालांकि, बाद के विश्लेषण में USGS ने इसे सीधे भूकंप से हुई आपदा के बजाय ग्लेशियर के ढहने और मलबे के तेज बहाव की घटना के रूप में वर्गीकृत किया।
इसका मतलब यह नहीं है कि भूकंप की भूमिका पूरी तरह समाप्त हो गई है। वैज्ञानिक अभी भी घटनाक्रम की कड़ियों का अध्ययन कर रहे हैं। यह पता लगाया जा रहा है कि ग्लेशियर और चट्टानों के अस्थिर होने में भूकंपीय हलचल की कोई भूमिका थी या नहीं।
सैकड़ों लोगों की मौत, बड़ी संख्या में लापता
आपदा के बाद नेपाल में मरने वालों की संख्या लगातार बढ़ी है। अलग-अलग समय पर जारी रिपोर्टों में मृतकों और लापता लोगों के आंकड़े अलग-अलग सामने आए हैं। 27 अगस्त तक कुछ रिपोर्टों में 390 से अधिक मौतों और 1,400 से ज्यादा लोगों के लापता होने की जानकारी दी गई।
बचाव अभियान के दौरान कई लोगों को सुरक्षित निकाला गया है, लेकिन दूरदराज के पहाड़ी इलाकों में संपर्क और सड़कें टूटने के कारण वास्तविक नुकसान का पूरा आकलन अभी बाकी है। आशंका है कि आने वाले दिनों में मृतकों और लापता लोगों की संख्या को लेकर स्थिति और स्पष्ट होगी।
नेपाल के साथ तिब्बत भी प्रभावित
बाढ़ का प्रभाव केवल नेपाल तक सीमित नहीं रहा। सीमा के दूसरी तरफ तिब्बत में भी ग्यारोंग पोर्ट और आसपास के इलाके प्रभावित हुए। मलबे और पानी के तेज प्रवाह ने सड़क, बिजली और अन्य बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचाया।
यह घटना दिखाती है कि हिमालयी प्राकृतिक आपदाएं प्रशासनिक सीमाओं से कहीं आगे तक असर डाल सकती हैं। एक ऊंचाई वाले क्षेत्र में ग्लेशियर के टूटने से शुरू हुई प्रक्रिया कई दर्जन किलोमीटर नीचे बसे क्षेत्रों तक विनाशकारी रूप में पहुंच सकती है।
क्या जलवायु परिवर्तन भी है जिम्मेदार?
वैज्ञानिकों ने इस आपदा के पीछे जलवायु परिवर्तन की संभावित भूमिका पर भी चिंता जताई है। हिमालयी क्षेत्र में तापमान बढ़ने के कारण ग्लेशियरों के पिघलने, ऊंचाई वाले इलाकों में बर्फ और चट्टानों की स्थिरता बदलने तथा पर्माफ्रॉस्ट के कमजोर होने का खतरा बढ़ रहा है। इससे हिमस्खलन, ग्लेशियर झीलों के फटने और अचानक बाढ़ जैसी घटनाओं का जोखिम बढ़ सकता है।
हालांकि, किसी एक प्राकृतिक आपदा को केवल जलवायु परिवर्तन के कारण हुई घटना घोषित करना वैज्ञानिक रूप से जल्दबाजी होगी। इसके लिए लंबे समय के मौसम, तापमान, ग्लेशियर की स्थिति और भूगर्भीय आंकड़ों का विस्तृत अध्ययन जरूरी है।
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आगे भी खतरा बरकरार
आपदा के बाद विशेषज्ञों ने संभावित नए भूस्खलन और ग्लेशियर झीलों को लेकर सतर्क रहने की जरूरत बताई है। यदि मलबे से बनी कोई अस्थायी झील दोबारा टूटती है, तो नीचे की ओर बसे इलाकों में एक और तेज बाढ़ आ सकती है। नेपाल और चीन दोनों ने संवेदनशील क्षेत्रों में निगरानी बढ़ाई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि हिमालयी क्षेत्रों में अर्ली वार्निंग सिस्टम, ग्लेशियर निगरानी और वास्तविक समय में नदी के जलस्तर की सूचना को मजबूत करना बेहद जरूरी है।
निष्कर्ष
नेपाल-तिब्बत सीमा पर हुई यह त्रासदी हिमालय के तेजी से बदलते पर्यावरण और पर्वतीय आपदाओं की बढ़ती चुनौती का गंभीर उदाहरण बनकर सामने आई है। एक बड़े ग्लेशियर के टूटने, बर्फ और चट्टानों के नीचे गिरने तथा पानी के साथ मलबे के तेज बहाव ने कुछ ही समय में नदी घाटियों में भारी तबाही मचा दी।
सैकड़ों लोगों की मौत और बड़ी संख्या में लोगों के लापता होने के बीच राहत एवं बचाव अभियान जारी है। वैज्ञानिक अब यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि ग्लेशियर आखिर किस प्रक्रिया से ढहा और क्या भूकंप, तापमान वृद्धि या अन्य भूगर्भीय कारणों ने इसकी स्थिति को अस्थिर किया।
इस घटना ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है कि हिमालयी देशों के लिए ग्लेशियरों की निगरानी और आपदा की पूर्व चेतावनी अब केवल पर्यावरणीय मुद्दा नहीं, बल्कि मानवीय सुरक्षा और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन की प्राथमिकता बन चुकी है।

