भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार इस समय देश की चुनाव व्यवस्था से जुड़े एक बड़े विवाद के केंद्र में हैं। पिछले करीब एक साल से मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision (SIR) को लेकर राजनीतिक बहस चल रही है। अब इस विवाद ने चुनाव आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया को लेकर उठे सवालों के बाद नया रूप ले लिया है।
एक रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार कुछ फैसलों और निर्देशों पर आपत्ति जताई। रिपोर्ट में दावा किया गया कि इन फैसलों के बारे में दोनों आयुक्तों को पहले से जानकारी नहीं थी। हालांकि, चुनाव आयोग ने गंभीर आंतरिक विभाजन की बात से इनकार किया है और कहा है कि आयोग के पूर्ण निर्णयों में पिछले एक साल के दौरान एकमत रहा है।
ज्ञानेश कुमार के लिए SIR बना विवाद का केंद्र
ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल में मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण सबसे प्रमुख मुद्दा बनकर सामने आया है। यह प्रक्रिया पहले बिहार में शुरू हुई और बाद में देश के अधिकांश हिस्सों तक विस्तारित की गई। बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में ड्राफ्ट मतदाता सूचियों से 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए गए हैं।
चुनाव आयोग का कहना है कि SIR का उद्देश्य मतदाता सूची से डुप्लीकेट और अपात्र नाम हटाना तथा पात्र मतदाताओं को सूची में शामिल करना है। दूसरी ओर, विपक्षी दलों और कुछ कार्यकर्ताओं ने आशंका जताई है कि इस प्रक्रिया से वैध मतदाताओं के नाम भी हट सकते हैं। चुनाव आयोग और ज्ञानेश कुमार ने इन आरोपों को खारिज किया है कि प्रक्रिया का इस्तेमाल राजनीतिक उद्देश्यों के लिए किया जा रहा है।
आयोग के भीतर फैसलों को लेकर सवाल
विवाद तब और बढ़ गया जब एक जांच रिपोर्ट में आयोग के दो अन्य सदस्यों की आपत्तियों का जिक्र किया गया। रिपोर्ट के मुताबिक, मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने की प्रक्रिया, मतदाता पंजीकरण के नियमों और बड़े चुनावी डेटाबेस तक पहुंच जैसे मुद्दों पर मतभेद सामने आए।
तीन सदस्यीय चुनाव आयोग में फैसले बहुमत से लिए जा सकते हैं। ऐसे में यदि आयोग के सदस्यों के बीच निर्णय प्रक्रिया को लेकर मतभेद सार्वजनिक होते हैं, तो इससे संस्था की कार्यप्रणाली और पारदर्शिता पर चर्चा होना स्वाभाविक है। हालांकि, आयोग ने स्पष्ट किया कि अलग-अलग मुद्दों पर विचारों में अंतर होना सामान्य विचार-विमर्श का हिस्सा है और इससे संस्थागत टूट का निष्कर्ष नहीं निकाला जाना चाहिए।
तीनों चुनाव आयुक्तों की बैठक के बाद क्या कहा गया?
विवाद के बीच ज्ञानेश कुमार, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने बैठक की और संयुक्त रूप से उठाए गए सवालों पर प्रतिक्रिया दी। आयोग ने कहा कि पिछले एक साल में पूर्ण आयोग द्वारा लिए गए निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए।
साथ ही, कामकाज की प्रक्रिया को और स्पष्ट करने के लिए कुछ बदलावों की घोषणा की गई। इनमें बैठकों का एजेंडा पहले साझा करना, बैठक की कार्यवाही का रिकॉर्ड तैयार करना और आयुक्तों की ओर से अधिकारियों को दिए गए निर्देशों के पालन से जुड़ी प्रक्रियाएं शामिल हैं।
ज्ञानेश कुमार का प्रशासनिक करियर भी चर्चा में
ज्ञानेश कुमार ने 1988 में भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) ज्वाइन की थी। केरल में शुरुआती प्रशासनिक जिम्मेदारियों से लेकर केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय तक उन्होंने कई महत्वपूर्ण पदों पर काम किया।
वह जम्मू-कश्मीर से जुड़े केंद्र सरकार के कामकाज और 2019 के जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन से जुड़ी प्रक्रिया में भी शामिल रहे। अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद उसके क्रियान्वयन से संबंधित प्रशासनिक जिम्मेदारियों में भी उनकी भूमिका रही। जनवरी 2024 में सेवानिवृत्त होने के बाद उन्हें मार्च 2024 में चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया और फरवरी 2025 में उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संभाला।
ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति प्रक्रिया पर भी उठे थे सवाल
ज्ञानेश कुमार ऐसे पहले मुख्य चुनाव आयुक्त हैं जिनकी नियुक्ति 2023 में बनाए गए नए कानून के तहत हुई। इस कानून में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति वाली समिति की संरचना बदली गई और भारत के मुख्य न्यायाधीश की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री को शामिल किया गया।
विपक्षी दलों ने इस बदलाव पर सवाल उठाए हैं और उनका तर्क है कि इससे चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को लेकर चिंता पैदा होती है। इस कानून की संवैधानिक वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। सितंबर 2026 में दो जजों की पीठ के मतभेद के बाद मामला बड़ी पीठ के सामने रखे जाने की संभावना पर विचार के लिए भेजा गया।
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आगे की चुनौती: चुनाव आयोग पर भरोसा
विवाद के बीच विपक्षी दलों की ओर से ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग को लेकर संसद में प्रस्ताव लाने की चर्चा भी सामने आई है। वहीं, सत्तारूढ़ गठबंधन के सहयोगी दलों के कुछ नेताओं ने चुनाव आयोग की सफाई का समर्थन करते हुए संस्था की विश्वसनीयता बनाए रखने की जरूरत पर जोर दिया है।
फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि मौजूदा विवाद का ज्ञानेश कुमार या चुनाव आयोग पर दीर्घकालिक प्रभाव क्या होगा। लेकिन SIR, मतदाता सूची में बदलाव और आयोग के भीतर निर्णय प्रक्रिया को लेकर उठे सवालों ने भारत की चुनावी संस्था पर सार्वजनिक निगरानी और बहस को जरूर तेज कर दिया है। आने वाले समय में आयोग की प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और राजनीतिक दलों के साथ संवाद इस विवाद के महत्वपूर्ण पहलू रहेंगे।

