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Phone में Virtual RAM क्या होती है? क्या इससे Performance सच में बढ़ती है?

Virtual RAM आजकल लगभग हर नए एंड्रॉयड फोन के विज्ञापन में दिखती है, जहां 8 जीबी के साथ “+8 जीबी” लिखकर फोन को 16 जीबी रैम वाला बताया जाता है। लेकिन क्या सच में आपके फोन की रैम दोगुनी हो जाती है? कई लोग इसी नंबर को देखकर फोन खरीद लेते हैं।

Virtual RAM क्या होती है?

Virtual RAM फोन की स्टोरेज का एक हिस्सा है, जिसे सॉफ्टवेयर की मदद से अस्थायी रैम की तरह इस्तेमाल किया जाता है। जब असली रैम भर जाती है, तो कम इस्तेमाल होने वाले ऐप्स का डेटा स्टोरेज के इस हिस्से में भेज दिया जाता है। अलग-अलग कंपनियां इसे अलग नाम देती हैं। सैमसंग इसे रैम प्लस, शाओमी मेमोरी एक्सटेंशन और रियलमी डायनेमिक रैम कहती है, लेकिन सबका काम लगभग एक जैसा है।

यह काम कैसे करती है?

मान लीजिए आपने एक साथ व्हाट्सऐप, यूट्यूब, कैमरा और कोई गेम खोल रखा है। रैम भरने पर सिस्टम पीछे पड़े ऐप्स को बंद करने की जगह उनका डेटा स्टोरेज वाले हिस्से में शिफ्ट कर देता है। जब आप दोबारा उस ऐप पर लौटते हैं, तो वह शुरू से लोड होने की बजाय वहीं से खुल जाता है जहां आपने छोड़ा था।

यानी Virtual RAM का असली काम ज्यादा ऐप्स को बैकग्राउंड में जिंदा रखना है। ध्यान देने वाली बात यह है कि गूगल की मूल एंड्रॉयड व्यवस्था पहले से जेडरैम नाम की तकनीक इस्तेमाल करती है, जो रैम के अंदर ही डेटा को दबाकर जगह बनाती है। कंपनियों का यह फीचर उसके ऊपर स्टोरेज का अतिरिक्त सहारा जोड़ता है।

असली रैम और वर्चुअल रैम में फर्क

सबसे बड़ा फर्क स्पीड का है। असली रैम स्टोरेज से कई गुना तेज होती है, इसलिए स्टोरेज से बनी Virtual RAM कभी भी उसकी बराबरी नहीं कर सकती। नए फोन की यूएफएस 4.0 स्टोरेज भी असली रैम से काफी धीमी रहती है, और सस्ते फोन की ईएमएमसी स्टोरेज में यह फर्क और बड़ा हो जाता है।

क्या इससे परफॉर्मेंस सच में बढ़ती है?

सीधा जवाब है, थोड़ी बहुत और वह भी सिर्फ मल्टीटास्किंग में। अगर आपके फोन में 4 जीबी या 6 जीबी रैम है और आप बार-बार ऐप्स बदलते हैं, तो ऐप्स के दोबारा लोड होने की शिकायत कुछ कम हो सकती है। लेकिन गेमिंग, वीडियो एडिटिंग या भारी ऐप्स की स्पीड इससे नहीं बढ़ती। उल्टा, जब सिस्टम बार-बार स्टोरेज से डेटा उठाता है तो कभी-कभी हल्का लैग भी महसूस हो सकता है।

इसके नुकसान क्या हैं?

पहला नुकसान यह है कि यह आपकी स्टोरेज की जगह घेर लेती है। अगर फोन में 128 जीबी स्टोरेज है और आपने 8 जीबी एक्सटेंशन चालू रखा है, तो उतनी जगह फोटो और ऐप्स के लिए कम हो जाती है। दूसरा, स्टोरेज पर बार-बार डेटा लिखने से लंबे समय में उसकी उम्र पर हल्का असर पड़ सकता है। इसी वजह से गूगल की मूल व्यवस्था में स्टोरेज को स्वैप के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाता।

Virtual RAM
Virtual RAM

किसे चालू रखनी चाहिए और किसे नहीं?

अगर आपका फोन 4 जीबी या 6 जीबी रैम वाला है और ऐप्स बार-बार रीलोड होते हैं, तो इसे 2 जीबी से 4 जीबी पर चालू रखकर देखें। कुछ दिन इस्तेमाल करने के बाद ही तय करें कि फर्क पड़ा या नहीं। अगर फोन में 8 जीबी या 12 जीबी रैम है, स्टोरेज कम बची है या गेम खेलते समय लैग आता है, तो इसे बंद करना बेहतर रहेगा।

Virtual RAM विकल्प आमतौर पर सेटिंग्स में मेमोरी या रैम वाले सेक्शन में मिलता है और बदलाव के बाद फोन रीस्टार्ट करना पड़ता है। नया फोन खरीदते समय Virtual RAM वाले बड़े नंबर पर नहीं, बल्कि असली रैम और स्टोरेज टाइप पर ध्यान दें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

1. क्या Virtual RAM से फोन की असली रैम बढ़ जाती है?

नहीं, असली रैम उतनी ही रहती है। यह सिर्फ स्टोरेज का एक हिस्सा उधार लेकर अतिरिक्त जगह देती है।

2. क्या Virtual RAM से गेमिंग बेहतर होती है?

आमतौर पर नहीं। गेम को तेज रैम चाहिए, इसलिए कई बार इसे बंद करने पर गेमिंग ज्यादा स्मूथ लगती है।

3. क्या Virtual RAM से बैटरी पर असर पड़ता है?

इसका असर बहुत मामूली होता है। ज्यादा ऐप्स बैकग्राउंड में रहने से बैटरी थोड़ी ज्यादा खर्च हो सकती है।

4. एंड्रॉयड फोन में मेमोरी का प्रबंधन कैसे होता है?

एंड्रॉयड असली रैम, जेडरैम और स्टोरेज को अलग-अलग तरीके से इस्तेमाल करता है। इसकी पूरी तकनीकी जानकारी गूगल के आधिकारिक डेवलपर पेज पर मौजूद है।

5. क्या आईफोन में भी यह फीचर होता है?

नहीं, आईफोन में उपयोगकर्ता के लिए ऐसा कोई अलग विकल्प नहीं दिया जाता। वहां मेमोरी का प्रबंधन सिस्टम खुद करता है।

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उपरोक्त जानकारी गूगल और विभिन्न वेबसाइट/समाचार माध्यमों से ली गई है। सटीकता की गारंटी नहीं है।

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