विशेष गहन पुनरीक्षण Special Intensive Revision (SIR) को लेकर चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों की रिपोर्ट सामने आने के बाद आयोग ने बुधवार को स्थिति स्पष्ट की। चुनाव आयोग ने आंतरिक असहमति या किसी तरह के संस्थागत टकराव की धारणा को खारिज करते हुए कहा कि किसी भी बहु-सदस्यीय संस्था में अलग-अलग राय, टिप्पणियां और तकनीकी सुझाव देना सामान्य निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा है। आयोग के मुताबिक अंतिम फैसले निर्धारित संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया के तहत लिए जाते हैं।
SIR को लेकर क्या है पूरा विवाद?
यह मामला उस रिपोर्ट के बाद सामने आया जिसमें दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों के दौरान चुनाव आयोग के कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं पर कई बार लिखित आपत्तियां या सुझाव दर्ज किए थे। रिपोर्ट में इन टिप्पणियों को विशेष रूप से मतदाता सूची, नए मतदाताओं के पंजीकरण, नाम हटाने और चुनाव आयोग की तकनीकी प्रणालियों से जुड़े मुद्दों से जोड़ा गया।
रिपोर्ट के अनुसार, कुछ मामलों में दोनों चुनाव आयुक्तों ने प्रक्रियाओं और निर्णय लेने के तरीके पर सवाल उठाए थे। इसके बाद यह चर्चा तेज हो गई कि क्या SIR और उससे जुड़ी व्यवस्थाओं को लेकर आयोग के भीतर मतभेद हैं।
हालांकि, चुनाव आयोग ने इन घटनाक्रमों की अलग व्याख्या पेश की है।
EC ने कहा- ड्राफ्ट स्तर की टिप्पणियां सामान्य प्रक्रिया
चुनाव आयोग ने अपने आधिकारिक बयान में कहा कि वह संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत काम करने वाली बहु-सदस्यीय संवैधानिक संस्था है। आयोग के मुताबिक लिखित नोट, टिप्पणियां, तकनीकी सुझाव और आंतरिक जांच-पड़ताल उसके कामकाज में सामान्य और नियमित प्रक्रियाएं हैं।
आयोग ने कहा कि सदस्यों की ओर से ड्राफ्ट तैयार होने के दौरान उठाए गए सवालों या सुझावों को अंतिम फैसले के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उसके मुताबिक ऐसी टिप्पणियों का उद्देश्य चुनावी प्रक्रिया को और बेहतर बनाना तथा मतदाताओं के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
EC ने साफ कहा कि “अलग-अलग विचार और टिप्पणियां किसी भी संस्था में विचार-विमर्श का सामान्य हिस्सा हैं।” आयोग के अनुसार अंतिम निर्णय से पहले अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आना निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा है।
आयोग ने सभी अंतिम फैसलों को बताया सर्वसम्मत
चुनाव आयोग ने यह भी कहा कि उसके आधिकारिक आदेश, निर्णय और प्रशासनिक निर्देश संबंधित कानूनों और निर्धारित प्रक्रियाओं के तहत जारी किए जाते हैं। आयोग के सूत्रों ने विशेष रूप से कहा कि SIR सहित आयोग के फैसलों को सभी तीनों सदस्यों की मंजूरी प्राप्त रही है।
इस तरह आयोग ने आंतरिक टिप्पणियों और अंतिम निर्णय के बीच अंतर स्पष्ट करने की कोशिश की है। उसके मुताबिक किसी प्रस्ताव या ड्राफ्ट पर सवाल उठाना अपने आप में अंतिम निर्णय का विरोध नहीं माना जा सकता।
SIR और मतदाता सूची पर क्यों है इतनी नजर?
SIR का उद्देश्य मतदाता सूची की समीक्षा और उसे अपडेट करना है। इस प्रक्रिया के तहत मतदाता रिकॉर्ड की जांच, नामों का सत्यापन और पात्रता से जुड़े पहलुओं की समीक्षा की जाती है। इसी वजह से SIR का सीधा संबंध मतदाता सूची की शुद्धता और चुनावी प्रक्रिया से जुड़ा है।
भारतीय निर्वाचन व्यवस्था में मतदाता सूची एक महत्वपूर्ण आधार है। इसलिए इसमें नाम जोड़ने, हटाने या किसी रिकॉर्ड को संशोधित करने से संबंधित प्रक्रियाओं को लेकर उठने वाले सवालों का राजनीतिक और सार्वजनिक महत्व बढ़ जाता है।
इसी संदर्भ में चुनाव आयोग ने अपने बयान में पारदर्शिता, कानूनी अनुपालन और प्रशासनिक प्रक्रिया की मजबूती पर जोर दिया है।
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आंतरिक टिप्पणियों को लेकर आगे भी चर्चा संभव
चुनाव आयोग की सफाई के बावजूद SIR से जुड़े आंतरिक नोट और चुनाव आयुक्तों की टिप्पणियां सार्वजनिक बहस का विषय बनी हुई हैं। एक ओर आयोग का कहना है कि अलग-अलग राय किसी भी संस्थागत विचार-विमर्श की स्वाभाविक प्रक्रिया है, वहीं सामने आई रिपोर्टों ने आयोग के भीतर उठाए गए सवालों और उनके स्वरूप पर ध्यान केंद्रित किया है।
फिलहाल आयोग का आधिकारिक रुख यह है कि उसके कामकाज में लिखित टिप्पणियां और तकनीकी सुझाव नियमित प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं तथा अंतिम निर्णय कानून और आयोग की निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार लिए जाते हैं।
SIR को लेकर आगे की प्रक्रिया में मतदाता सूची से जुड़े फैसलों, तकनीकी व्यवस्थाओं और शिकायत निवारण की प्रक्रिया पर नजर बनी रहेगी। चुनाव आयोग के सामने चुनौती यह भी होगी कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया में पारदर्शिता और कानूनी प्रक्रियाओं को लेकर उठने वाले सवालों का स्पष्ट तरीके से जवाब दिया जाए।

