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SABARIMALA CASE में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई, मंदिर में महिलाओं की एंट्री विवाद पर हो रही बहस

सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संवैधानिक पीठ SABARIMALA CASE में आज सातवें दिन की सुनवाई कर रही है। सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश और उससे जुड़े धार्मिक भेदभाव के मुद्दे पर सुनवाई 7 अप्रैल 2026 से शुरू हुई थी।

बीते मंगलवार को अदालत ने स्पष्ट किया था कि यदि राज्य सामाजिक सुधार या जनहित के नाम पर किसी धार्मिक परंपरा या प्रथा में हस्तक्षेप करता है या उस पर प्रतिबंध लगाता है, तो उसकी वैधता की जांच न्यायालय कर सकता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि न्यायिक समीक्षा की अपनी सीमाएं जरूर हैं, लेकिन यह कहना गलत होगा कि अदालत के पास इस तरह के मामलों में कोई अधिकार ही नहीं है।

चीफ जस्टिस सूर्या कांत की अध्यक्षता वाली इस पीठ में जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, जस्टिस एम.एम. सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टाइन जॉर्ज मसीह, जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले, जस्टिस आर. महादेवन और जस्टिस जोयमलया बागची शामिल हैं।

क्या है SABARIMALA CASE?

केरल के पठानमथिट्टा जिले में स्थित सबरीमाला मंदिर भगवान अय्यप्पा को समर्पित देश का प्रसिद्ध तीर्थस्थल है। इस मंदिर में भगवान अय्यप्पा की नैष्ठिक ब्रह्मचारी के रूप में पूजा होती है। मंदिर में सदियों से चली आ रही परंपरा के अनुसार 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं को इस मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं। यह मुद्दा धीरे-धीरे लैंगिक समानता, धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक नैतिकता के बीच टकराव का केंद्र बन गया।

SABARIMALA CASE
SABARIMALA CASE

SABARIMALA CASE की जड़ें कई दशक पुरानी हैं। 1990-91 में एस. महेंद्रन ने केरल हाईकोर्ट में याचिका दायर की, जिसमें महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाने की मांग की गई थी। 5 अप्रैल 1991 को केरल हाईकोर्ट ने 10 से 50 वर्ष की महिलाओं पर प्रतिबंध को बरकरार रखा और इसे आवश्यक धार्मिक प्रथा माना। हाईकोर्ट ने केरल हिंदू प्लेसेस ऑफ पब्लिक वर्शिप (ऑथराइजेशन ऑफ एंट्री) रूल्स, 1965 के रूल 3(b) का हवाला दिया, जो परंपरा के आधार पर महिलाओं को बाहर रखने की अनुमति देता था।

SABARIMALA CASE की 2006 से 2018 तक की कानूनी यात्रा

साल 2006 में इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की, जिसमें 10 से 50 वर्ष की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश देने की मांग की गई। 2016-17 में कोर्ट ने SABARIMALA CASE को संवैधानिक पीठ को रेफर किया। 28 सितंबर 2018 को 5 जजों की बेंच ने 4:1 बहुमत से ऐतिहासिक फैसला सुनाया।

बहुमत ने रूल 3(b) को असंवैधानिक घोषित कर दिया और कहा कि यह प्रथा आर्टिकल 14 (समानता का अधिकार), आर्टिकल 15 (भेदभाव का निषेध) और आर्टिकल 25(1) (धार्मिक स्वतंत्रता) का उल्लंघन करती है। बेंच ने यह भी कहा कि अय्यप्पा भक्तों को एक अलग धार्मिक संप्रदाय नहीं माना जा सकता। उस बेंच में जस्टिस इंदु मल्होत्रा एकमात्र असहमत जज थीं, जिन्होंने धार्मिक प्रथाओं में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा पर जोर दिया।

2018 के फैसले के बाद क्या हुआ?

SABARIMALA CASE में 2018 के फैसले के बाद देश के विभिन्न हिस्सों में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए। कुछ महिलाएं मंदिर पहुंचीं, लेकिन बड़े पैमाने पर प्रवेश नहीं हो सका। केरल में राजनीतिक रूप से यह मुद्दा काफी संवेदनशील बना रहा और एलडीएफ तथा यूडीएफ दोनों के रुख समय-समय पर बदलते रहे। मंदिर प्रबंधन और भक्तों की ओर से विरोध जारी रहा।

2019 में समीक्षा याचिकाओं पर सुनवाई हुई और 14 नवंबर 2019 को 5 जजों की बेंच ने 3:2 के बहुमत से समीक्षा याचिकाओं को लंबित रखा। साथ ही कुछ बड़े संवैधानिक सवालों को 7 या उससे बड़ी पीठ को रेफर कर दिया गया।

SABARIMALA CASE LATEST UPDATES 

फरवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने SABARIMALA CASE में 9 जजों की संवैधानिक पीठ गठित की। सुनवाई का शेड्यूल इस प्रकार निर्धारित किया गया 7 से 9 अप्रैल तक समीक्षा याचिकाकर्ताओं यानी परंपरा के समर्थकों की दलीलें सुनी गईं। 14 से 16 अप्रैल तक विरोधी पक्ष यानी महिलाओं के प्रवेश के समर्थकों की दलीलें सुनी गईं। 21 अप्रैल को रीजॉइंडर हुआ और 22 अप्रैल को अमिकस क्यूरी की अंतिम दलीलें प्रस्तुत की गईं।

सात प्रमुख संवैधानिक सवाल जिन पर पीठ कर रही है विचार

SABARIMALA CASE में यह पीठ सात महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्नों पर विचार कर रही है।

  • पहला आर्टिकल 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता का दायरा क्या है।
  • दूसरा आर्टिकल 25 और 26 (धार्मिक संप्रदायों के अधिकार) के बीच क्या संबंध है।
  • तीसरा क्या आर्टिकल 26 के अधिकार अन्य मौलिक अधिकारों के अधीन हैं।
  • चौथा आर्टिकल 25-26 में ‘morality’ का अर्थ और क्या इसमें संवैधानिक नैतिकता शामिल है।
  • पांचवां धार्मिक प्रथाओं पर न्यायिक समीक्षा का दायरा क्या होना चाहिए।
  • छठा आर्टिकल 25(2)(b) में “Sections of Hindus” का क्या अर्थ है।
  • सातवां क्या कोई गैर-भक्त PIL दायर कर किसी धार्मिक प्रथा को चुनौती दे सकता है।

केंद्र सरकार और ट्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड की दलीलें

SABARIMALA CASE में केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि 2018 का फैसला गलत था और उस पर पुनर्विचार जरूरी है। उन्होंने कहा कि सबरीमाला की प्रथा धार्मिक आस्था का विषय है और यह न्यायिक समीक्षा से परे है। उन्होंने कुछ मंदिरों में पुरुषों पर भी प्रतिबंध के उदाहरण दिए। केंद्र का तर्क था कि देवता की विशेष पहचान यानी नैष्ठिक ब्रह्मचारी स्वरूप को बनाए रखना आवश्यक है।

SABARIMALA CASE
SABARIMALA CASE

ट्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड की ओर से सीनियर एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी ने 15 अप्रैल को दलील दी कि 10 से 50 वर्ष की महिलाओं का प्रवेश देवता की पहचान के विरुद्ध है। उन्होंने कहा कि भारत में करीब एक हजार अय्यप्पा मंदिर हैं, लेकिन केवल सबरीमाला में देवता का यह विशेष स्वरूप है और अन्य मंदिरों में महिलाएं जा सकती हैं। इस दौरान जस्टिस वराले ने कुछ तर्कों को कठोर बताया।

महिला प्रवेश के समर्थन में दलीलें और न्यायाधीशों की टिप्पणियां

पीठ की एकमात्र महिला जज जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने सुनवाई के दौरान कहा कि महिलाओं को महीने में तीन दिन अछूत नहीं माना जा सकता। कोर्ट की ओर से यह भी कहा गया कि आर्टिकल 17 यानी अस्पृश्यता निषेध को चुनिंदा तरीके से लागू नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कोई धर्म दूसरे से श्रेष्ठ नहीं है। PIL में गैर-भक्तों द्वारा धार्मिक प्रथा को चुनौती देने के अधिकार पर भी बहस हुई।

सीनियर एडवोकेट जे. साई दीपक और गोपाल शंकरनारायणन सहित अन्य वकीलों ने न्यायिक समीक्षा की सीमाओं, essential religious practices टेस्ट और denomination की परिभाषा पर विस्तार से बहस की। कोर्ट ने कहा कि धर्म को सुधार के नाम पर खोखला नहीं किया जा सकता, लेकिन साथ ही न्यायिक समीक्षा की शक्ति पर अत्यधिक अंकुश भी उचित नहीं है।

SABARIMALA CASE में सामाजिक और धार्मिक संदर्भ

सबरीमाला की परंपरा भगवान अय्यप्पा की ब्रह्मचर्य की कथा से जुड़ी है। भक्त 41 दिन का व्रत रखकर और माला धारण कर पहाड़ी चढ़ाई करते हैं। जहां परंपरा के आलोचक इसे मासिक धर्म से जुड़ी अशुद्धता की अवधारणा मानते हैं, वहीं समर्थक इसे देवता की इच्छा और उनकी अनोखी पहचान से जोड़ते हैं। सुनवाई के दौरान कोर्ट में यह भी चर्चा हुई कि इस तरह का बहिष्कार हिंदू धर्म की समावेशी भावना को प्रभावित कर सकता है।

इस फैसले का व्यापक प्रभाव

यह मामला केवल सबरीमाला तक सीमित नहीं है। 9 जजों की पीठ का जो भी फैसला आएगा, वह मुस्लिम महिलाओं के मस्जिद प्रवेश, पारसी समुदाय से जुड़े दावों और दाऊदी बोहरा समुदाय में महिला खतना जैसे अन्य धार्मिक मामलों पर भी सीधा प्रभाव डालेगा। यह फैसला न्यायिक समीक्षा की सीमाओं और धार्मिक स्वतंत्रता बनाम संवैधानिक समानता के प्रश्नों पर एक महत्वपूर्ण दिशा तय करेगा। फिलहाल सुनवाई पूरी होने के बाद भी फैसला अभी लंबित है।

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Abhishek Semwal is Postgraduate in Mass Communication with over three years of experience across digital and print media. Covering a wide range of subjects, with a strong focus on local and regional issues, delivering clear, insightful and engaging content.
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