जल संस्थान में जांच हुई तो अयोग्य साबित हुए ये अधीक्षण अभियंता

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देहरादून (संवाददाता- अरुण कश्यप): उत्तराखंड जल संस्थान प्रदेश के सबसे ज्यादा मलाईदार महकमों में से एक है, फिर भी बड़े अफसोस की बात है कि यहां कई पदो पर अयोग्य अधिकारी जमे हुए हैं, जिन्हें विभागीय कार्यप्रणाली और व्यवस्था का ज्ञान तक नहीं, ऐसे अधिकारी विभाग को चला रहे हैं।

मज़े की बात है कि ऐसे दर्जनों अधिकारी यहां अपनी सेवाएं दे रहे हैं जो विभाग में काम करने लायक ही नहीं, ऐसे ही एक अयोग्य अधिकारी की पोल आरटीआई में प्राप्त सूचनाओं से हई। आपको बता दें कि विभाग के मंत्री बिशन सिंह चुफाल ने 8 अगस्त 2021 को विभाग के मुख्य महाप्रबंधक को पत्र जारी कर राजपुर जोन के अंतर्गत गलोगी स्रोत पर प्री सेटलिंग टैंक कार्य में हुई भारी अनियमितताओं के संबंध में जांच करने के सख्त निर्देश जारी किए गए , जिसके बाद मयंक भारद्वाज नाम के एक सामाजिक कार्यकर्ता ने भी इस संबंध में शिकायती पत्र विभाग को दिया, और बाद में उनके द्वारा आरटीआई भी डाली गई।

सूचनाओं में पता चला कि विभाग के मुख्य महाप्रबंधक एस.के शर्मा द्वारा इसकी जांच के लिए विभाग के महाप्रबंधक आर.के रोहेल्ला को जांच अधिकारी नामित किया गया, क्योंकि इस कार्य में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार और अनियमितता हुई थी। यदि सही जांच होती तो विभाग के कई आला अधिकारी भी इसके दायरे में आ सकते थे।

इसलिए जांच अधिकारी आर.के. रोहेला ने गोलमोल जांच करते हुए इस मामले को ठंडे बस्ते में डालने का काम किया। लेकिन खुद का दामन बचाते हुए उन्होंने तत्कालीन अधिशासी अभियंता यशवीर मल्ल को ही नासमझ दोषी साबित कर दिया, जांच रिपोर्ट में आर.के. रोहेला ने बताया कि इंजीनियर यशवीर मल्ल को विभागीय कार्यप्रणाली और पत्रावली का ज्ञान ही नहीं है। बात केवल यहीं नहीं रुकी बल्कि विभाग के महाप्रबंधक एस.के. शर्मा ने पेयजल एवं स्वच्छता विभाग के संयुक्त सचिव को दिए गए पत्र में यह तक कह दिया कि यशवीर मल को वित्तीय अधिकारों  तथा वित्तीय हस्त पुस्तिका का समुचित ज्ञान ही नहीं है इसलिए उन्होंने ठेकेदार को बेवजह की समय अवधि भी बिना उच्च अधिकारियो की संस्तुति के प्रदान की।

आपको बता दें कि उत्तराखंड जल संस्थान की देहरादून उत्तर डिवीजन के तहत 2019 में एक निर्माण कार्य गलोगी स्रोत पर प्रोसेटलिंग कार्य के नाम से कराया गया था। इस कार्य में बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितताओं की बात भी सामने आई थी।  लाखों रुपए की कीमत से कराया गया यह कार्य उस वक्त यानी 3 वर्ष पहले किसी कांट्रेक्टर को दिया गया था, जिसके पूरे करने की अवधि मात्र 2 महीने थी लेकिन तत्कालीन अधिशासी अभियंता यशवीर मल्ल द्वारा बिना अपने उच्च अधिकारियों की अनुमति लिए बगैर कई बार समय अवधि बढ़ाई। आश्चर्य की बात है कि वह कार्य अब तक यानी 3 वर्ष बाद भी पूरा नहीं हो पाया है, जिसका संज्ञान विभाग के मंत्री ने लिया और इस संबंध में जांच के आदेश भी पारित किए। हालांकि इस भारी अनियमतता में विभाग के कई आला अधिकारी भी सलिप्त है, लेकिन जांच अधिकारी ने सारा ठीकरा तत्कालीन अधिशासी अभियंता यशवीर मल्ल और ठेकेदार के सिर पर फोड़ दिया। अब देखना है कि विभाग के मंत्री इस मामले को गंभीरता से लेते हैं या फिर अन्य सभी मामलों की तरह इसे भी फाइलों में बंद कर दिया जाएगा।

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