INR vs US DOLLAR: भारतीय मुद्रा के इतिहास में बुधवार का दिन एक बड़ी गिरावट के रूप में दर्ज किया गया है। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया अपने अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया और पहली बार 90 का मनोवैज्ञानिक स्तर पार कर गया। बाजार खुलते ही रुपये में भारी कमजोरी देखने को मिली। यह डॉलर के मुकाबले 9 पैसे गिरकर 90.05 के स्तर पर खुला और दिन के कारोबार के दौरान 90.16 के रिकॉर्ड निचले स्तर तक लुढ़क गया। साल 2025 में भारतीय करेंसी में अब तक लगभग 4.4 से 5.16 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की जा चुकी है, जो अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का विषय है।

INR vs US DOLLAR: डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ और विदेशी निवेशकों की बिकवाली बनी वजह
गिरावट के पीछे सबसे प्रमुख वजह अमेरिका और भारत के बीच व्यापार समझौते को लेकर बनी अनिश्चितता है। भारतीय आयात पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाने के फैसले ने बाजार की भावनाओं को बुरी तरह प्रभावित किया है। इस टैरिफ से भारत की जीडीपी ग्रोथ में गिरावट आ सकती है और राजकोषीय घाटा बढ़ सकता है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) द्वारा लगातार की जा रही बिकवाली ने रुपये की कमर तोड़ दी है। आंकड़ों के मुताबिक, साल 2025 में अब तक विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से 1.48 लाख करोड़ रुपये की निकासी की है।

आम आदमी और छात्रों पर पड़ेगा सीधा असर
गिरावट का सीधा असर आम आदमी की जेब पर पड़ता है। रुपये में गिरावट का अर्थ है कि भारत के लिए विदेशों से सामान आयात करना महंगा हो जाएगा। इससे पेट्रोल-डीजल से लेकर इलेक्ट्रॉनिक सामान तक महंगे हो सकते हैं, जिसका असर महंगाई पर पड़ेगा। इसका सबसे ज्यादा खामियाजा विदेश में पढ़ने वाले भारतीय छात्रों को भुगतना पड़ेगा। जब डॉलर का भाव कम था तो छात्रों को कम रुपये खर्च करने पड़ते थे, लेकिन अब एक डॉलर खरीदने के लिए उन्हें 90 रुपये से ज्यादा चुकाने होंगे। इससे उनकी कॉलेज फीस, रहने और खाने का खर्च काफी बढ़ जाएगा। इसके अलावा विदेशों में घूमना-फिरना भी अब भारतीय पर्यटकों के लिए महंगा साबित होगा।

हेजिंग की लागत बढ़ी, कंपनियां कर रही हैं डॉलर का स्टॉक
रुपये के 90 के पार जाने से कॉरपोरेट जगत में हलचल तेज हो गई है। रुपये के 88.80 के स्तर को तोड़ने के बाद अब आरबीआई द्वारा और अधिक गिरावट की अनुमति देने की आशंका बढ़ गई है। इस डर से तेल और सोने का आयात करने वाली कंपनियों ने डॉलर की खरीदारी तेज कर दी है ताकि वे भविष्य के नुकसान से बच सकें। इसे हेजिंग कहा जाता है और इसकी लागत अब काफी बढ़ गई है। आयातक टैरिफ अनिश्चितता के कारण पहले से ही डॉलर का स्टॉक कर रहे हैं, जिससे डॉलर की मांग बढ़ गई है और रुपया कमजोर होता जा रहा है।

INR vs US DOLLAR: आगे क्या होगा रुपये का हाल?
आने वाले दिनों में भी रुपये पर दबाव बने रहने की आशंका है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि अमेरिका और भारत के बीच व्यापार समझौते पर कोई सकारात्मक प्रगति होती है, तो रुपये में सुधार देखने को मिल सकता है। बाजार की नजरें 5 दिसंबर को आरबीआई की घोषणा पर टिकी हैं। कुछ बाजार जानकारों के बीच रुपये के 91 तक गिरने की चर्चा भी हो रही है, हालांकि अर्थशास्त्रियों को उम्मीद है कि पॉलिसी के बाद इसमें सुधार होगा और यह वापस 88-89 के स्तर पर आ सकता है। फिलहाल अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है और हर कोई आरबीआई के अगले कदम का इंतजार कर रहा है।

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