DIABETES जिसे सामान्यत: मधुमेह के नाम से जाना जाता है, एक ऐसी स्वास्थ्य समस्या है जो आज विश्वभर में लाखों लोगों के जीवन को प्रभावित कर रही है। विशेष रूप से भारत में, यह बीमारी इतनी तेजी से बढ़ी है कि देश को “डायबिटीज की राजधानी” तक कहा जाने लगा है। मधुमेह का प्रभाव केवल एक शारीरिक समस्या तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक गंभीर सामाजिक और आर्थिक चुनौती बन गया है। इसका मुख्य कारण भारत में तेज़ी से बदलती जीवनशैली, असंतुलित आहार, शारीरिक गतिविधियों की कमी और आनुवांशिक प्रवृत्ति है।

DIABETES और भारतीयों की जीवनशैली
पिछले कुछ दशकों में भारत के लोगों की जीवनशैली में सुधार तो हुआ है लेकिन स्वास्थ्य समस्याओं में भी वृद्धि हुई है। जीवनशैली में आए बदलावों में सबसे महत्वपूर्ण हैं आहार का वैश्वीकरण, अधिक प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों का उपयोग और शारीरिक गतिविधियों में कमी। इन बदलावों ने डायबिटीज और हृदय रोग जैसी बीमारियों को तेजी से बढ़ावा दिया है। विभिन्न आकड़ों के अनुसार 2023 तक देश में मधुमेह के 10.1 करोड़ मरीज हैं, जो देश की वयस्क आबादी का लगभग 11.4% हैं। यह आंकड़ा चौंकाने वाला है, क्योंकि 2021 तक यह संख्या केवल 7 करोड़ थी। दो वर्षों में लगभग 36% की वृद्धि के कारण इस बीमारी को लेकर चिंता और बढ़ गई है।

DIABETES के अधिकतर मामले आनुवंशिक और मोटापे के कारण
मधुमेह के मरीजों की बढ़ती संख्या के पीछे कई कारण हैं। सबसे पहले, आनुवांशिक प्रवृत्ति का इसमें बड़ा योगदान है। डायबिटीज के लगभग 75% मरीजों में मधुमेह का पारिवारिक इतिहास पाया गया है। दूसरा कारण है, मोटापा और अस्वस्थ जीवनशैली। डायबिटीज के 90% मरीज या तो सामान्य से अधिक वजन के हैं या मोटापे का शिकार हैं। इसके अलावा, भारतीय समाज में व्यायाम का अभाव और अत्यधिक कैलोरी वाले भोजन का सेवन इस बीमारी को और बढ़ावा देता है।

डायबिटीज शरीर के कई अंगों को प्रभावित करता है
डायबिटीज का प्रभाव केवल रक्त शर्करा तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह शरीर के कई अंगों को प्रभावित करता है। मधुमेह नैफ्रोपैथी, यानी किडनी खराब होने की समस्या, डायबिटीज के गंभीर परिणामों में से एक है। लगभग 20-30% डायबिटिक मरीजों को किडनी प्रत्यारोपण या डायलिसिस की आवश्यकता पड़ती है। भारत में किडनी फेल होने के सबसे आम कारणों में डायबिटीज और उच्च रक्तचाप शामिल हैं। इसके अलावा, यह बीमारी आंखों, दिल, तंत्रिका तंत्र और अन्य अंगों पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालती है।

डायबिटीज के लक्षण
मधुमेह के लक्षण शुरुआत में अक्सर स्पष्ट नहीं होते। टाइप 1 डायबिटीज के मरीजों में लक्षण अचानक और गंभीर रूप से प्रकट होते हैं। इन लक्षणों में अत्यधिक प्यास लगना और मुँह का सूखना, बार-बार पेशाब आना, बिना किसी कारण के वजन में तेजी से गिरावट, अधिक भूख लगना, धुंधला दिखाई देना, पेट में दर्द और उल्टी, चक्कर आना, भ्रम महसूस करना और अचेत होना शामिल हैं। टाइप 2 डायबिटीज के 50% मरीजों में कोई लक्षण नहीं दिखाई देते, और यह केवल नियमित रक्त परीक्षण के माध्यम से पता चलता है। जिन मामलों में लक्षण प्रकट होते हैं, उनमें थकान, घावों का धीमा भरना, पैरों में सुन्नपन और संक्रमण जैसे संकेत प्रमुख हैं।

जीवनशैली में सुधार है बहुत जरूरी
मधुमेह से बचाव के लिए सबसे प्रभावी उपाय जीवनशैली में सुधार है। नियमित व्यायाम, संतुलित आहार, और वजन को नियंत्रण में रखना इसके प्रभाव को कम करने में मदद कर सकते हैं। जिन परिवारों में मधुमेह का इतिहास है, उन्हें विशेष रूप से भोजन और व्यायाम पर ध्यान देना चाहिए। आहार में रेशेदार खाद्य पदार्थ, नट्स, सही तेल, और दालचीनी जैसे तत्व शामिल करना ब्लड शुगर को नियंत्रित करने में सहायक हो सकता है।

इलाज और मेडिकेशन
डायबिटीज के इलाज में हर मरीज की व्यक्तिगत स्थिति को ध्यान में रखकर उपचार योजना बनाई जाती है। यह मरीज की उम्र, शारीरिक गतिविधि की क्षमता, भोजन की आदतों और स्वास्थ्य स्थितियों पर निर्भर करता है। मधुमेह का प्रबंधन केवल दवाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें नियमित फॉलोअप, सही देखभाल, और ब्लड शुगर का सतत नियंत्रण भी शामिल है। गंभीर मामलों में, जैसे अत्यधिक मोटापे के शिकार मरीजों के लिए, बेरियाट्रिक सर्जरी एक प्रभावी उपाय हो सकता है।

डायबिटीज व्यक्तिगत नहीं बल्कि सामाजिक समस्या है
डायबिटीज के बढ़ते प्रसार ने न केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य पर बल्कि देश की स्वास्थ्य प्रणाली पर भी भारी दबाव डाला है। इसका समाधान सामूहिक प्रयास, जागरूकता, और स्वास्थ्य सेवाओं की बेहतर पहुंच में निहित है। यदि समय रहते सही कदम उठाए जाएं, तो इस बीमारी के बढ़ते प्रभाव को रोका जा सकता है। डायबिटीज का प्रबंधन केवल एक चिकित्सा प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह एक सामूहिक जिम्मेदारी भी है, जिसमें व्यक्ति, समाज और सरकार सभी को मिलकर योगदान देना होगा।

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