DELHI GIRL LIVER FAILURE MOMOS: दिल्ली के बुराड़ी इलाके में एक डरा देने वाला मामला सामने आया है, यहां रहने वाले एक परिवार की जिंदगी उस समय अचानक संकट में घिर गई, जब उनकी 10 साल की बेटी तान्या माथुर की तबीयत इतनी बिगड़ गई कि उसका दिमाग लगभग काम करना बंद करने की स्थिति में पहुंच गया।
उसे सामान्य बातें याद नहीं रहती थीं और वह खुद से चलने-फिरने में भी असमर्थ हो गई थी। जांच में सामने आया कि उसका लिवर पूरी तरह फेल हो चुका है और शरीर में फैले विषैले तत्वों के कारण दिमाग में सूजन आ गई है। हालत गंभीर होने पर उसे तुरंत ICU में भर्ती करना पड़ा। इस गंभीर स्थिति के पीछे मुख्य वजह थी रोजाना बाहर का मोमोज और जंक फूड खाना।
DELHI GIRL LIVER FAILURE MOMOS: दादा से पैसे लेकर रोज खाती थी बाहर का खाना
तान्या के माता-पिता दोनों नौकरी करते हैं। उसके पिता किशोर माथुर मोबाइल रिपेयरिंग का काम करते हैं, जबकि मां सावित्री माथुर मुखर्जी नगर में केयरटेकर हैं। दिनभर घर में अकेली रहने वाली तान्या स्कूल से लौटने के बाद अपने दादा से पैसे लेकर बाहर से मोमोज, चिप्स और अन्य फास्ट फूड खरीदकर खाती थी। घर का खाना उपलब्ध होने के बावजूद उसे बाहर के चटपटे खाने की आदत लग गई, जो धीरे-धीरे उसकी सेहत के लिए खतरनाक साबित हुई।
धीरे-धीरे बिगड़ती गई हालत
शुरुआत में तान्या को छोटी-छोटी बातें भूलने की समस्या होने लगी और वह लगातार थकी हुई महसूस करती थी। परिवार ने इसे सामान्य कमजोरी समझकर नजरअंदाज कर दिया, लेकिन समय के साथ उसकी हालत तेजी से बिगड़ने लगी। एक दिन वह ठीक से खड़ी तक नहीं हो पाई।

जब उसे नजदीकी अस्पताल ले जाया गया, तो जांच में पता चला कि उसे गंभीर पीलिया हो गया है। स्थिति इतनी खराब थी कि परिवार को उसकी जान का डर सताने लगा। इसके बाद उसे यथार्थ हॉस्पिटल, मॉडल टाउन में भर्ती कराया गया। (DELHI GIRL LIVER FAILURE MOMOS)
DELHI GIRL LIVER FAILURE MOMOS: लिवर ट्रांसप्लांट की नौबत
अस्पताल में शुरुआती जांच के बाद डॉक्टरों ने लिवर ट्रांसप्लांट की जरूरत तक जताई थी। हालांकि, बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. शैलेश शर्मा की देखरेख में प्लाज्माफेरेसिस नामक प्रक्रिया अपनाई गई। इस प्रक्रिया के तहत शरीर से विषैले तत्वों को निकालकर शुद्ध प्लाज्मा चढ़ाया जाता है, जिससे लिवर को राहत मिलती है और उसकी कार्यक्षमता सुधरती है। तान्या को दो यूनिट प्लाज्मा दिया गया, जिससे उसकी हालत में सुधार हुआ और लिवर ट्रांसप्लांट की जरूरत टल गई।
बच्चों में फैटी लिवर का खतरा तेजी से बढ़ रहा
आज के समय में बच्चों की जीवनशैली और खान-पान में आए बदलावों के कारण उनमें नॉन-अल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज (NAFLD) का खतरा तेजी से बढ़ रहा है। पहले यह बीमारी केवल वयस्कों या शराब का सेवन करने वालों में देखी जाती थी, लेकिन अब 5 से 10 साल तक के बच्चे भी इसकी चपेट में आ रहे हैं। यह एक गंभीर स्थिति है क्योंकि लिवर शरीर का सबसे महत्वपूर्ण अंग है जो पाचन और टॉक्सिन्स को बाहर निकालने का काम करता है।
प्लाज्माफेरेसिस क्या है?
प्लाज्माफेरेसिस को सरल शब्दों में ‘रक्त का शुद्धिकरण’ या ‘प्लाज्मा विनिमय’ कहा जा सकता है। इस प्रक्रिया में शरीर से खून बाहर निकालकर उसमें से हानिकारक तत्वों वाले प्लाज्मा को अलग कर दिया जाता है और फिर साफ खून को वापस शरीर में डाल दिया जाता है। प्लाज्माफेरेसिस की तकनीक काफी हद तक डायलिसिस के समान होती है।

इसकी प्रक्रिया में एक सुई के जरिए मरीज के शरीर से खून निकाला जाता है और उसे एक मशीन (सेल सेपरेटर) में भेजा जाता है। मशीन खून के ठोस कणों (जैसे रेड और व्हाइट ब्लड सेल्स) को तरल हिस्से यानी प्लाज्मा से अलग कर देती है। शरीर में मौजूद बीमारियां अक्सर प्लाज्मा में मौजूद एंटीबॉडीज या टॉक्सिन्स के कारण होती हैं। (DELHI GIRL LIVER FAILURE MOMOS)
मशीन इस खराब प्लाज्मा को बाहर निकाल देती है। हटाए गए प्लाज्मा की जगह मरीज को नया प्लाज्मा (दाता से लिया गया) या एल्ब्यूमिन जैसा कृत्रिम घोल मिलाया जाता है। इसके बाद साफ रक्त कणों और नए घोल के मिश्रण को वापस मरीज के शरीर में चढ़ा दिया जाता है। (DELHI GIRL LIVER FAILURE MOMOS)
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