/ Mar 19, 2026
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UTTARAKHAND DISASTER MANAGEMENT: उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (USDMA) के दिशा-निर्देशन में आयोजित दो दिवसीय राज्य स्तरीय मॉक ड्रिल का दूसरा और अंतिम चरण आज सफलतापूर्वक संपन्न हो गया। अभियान के दूसरे दिन प्रदेश के शेष आठ जनपदों हरिद्वार, देहरादून, ऊधमसिंह नगर, चमोली, चम्पावत, टिहरी, पिथौरागढ़ और अल्मोड़ा में बहु-स्थलीय अभ्यास आयोजित किए गए। इस व्यापक अभ्यास का मुख्य उद्देश्य राज्य के आपदा प्रबंधन तंत्र की त्वरित प्रतिक्रिया, विभागीय समन्वय और संसाधनों के कुशल उपयोग का परीक्षण करना था।
देहरादून स्थित राज्य आपातकालीन परिचालन केंद्र (SEOC) से मॉक ड्रिल के सभी चरणों की निरंतर निगरानी की गई। इस दौरान बाढ़, भूस्खलन, भूकंप, औद्योगिक दुर्घटना, वनाग्नि, सड़क दुर्घटना, मानव-वन्यजीव संघर्ष और भगदड़ जैसे विभिन्न संभावित आपदा परिदृश्यों को कृत्रिम रूप से तैयार किया गया। सचिव आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास ने बताया कि इन अभ्यासों के माध्यम से जमीनी स्तर पर कार्य करने की क्षमता संतोषजनक पाई गई है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इस दौरान जो भी कमियां सामने आई हैं, उनका विस्तृत विश्लेषण कर भविष्य के लिए आपदा तंत्र को और अधिक मजबूत बनाया जाएगा।

हरिद्वार: धर्मनगरी में हर की पैड़ी, मनसा देवी मार्ग और रुड़की जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में अभ्यास किया गया। यहाँ मुख्य रूप से गंगा के जलस्तर में अचानक वृद्धि, तटबंध टूटने और श्रद्धालुओं के बीच भगदड़ मचने जैसे परिदृश्यों पर राहत कार्य किए गए। टीमों ने त्वरित रेस्क्यू और भीड़ नियंत्रण का प्रभावी प्रदर्शन किया।(UTTARAKHAND DISASTER MANAGEMENT)
देहरादून: राजधानी के ऋषिकेश, मसूरी और कालसी क्षेत्रों में चारधाम यात्रा ट्रांजिट कैंप में विस्फोट, भारी वर्षा और मसूरी मार्ग पर भूस्खलन जैसी घटनाओं पर मॉक ड्रिल की गई। पुलिस, एसडीआरएफ और एनडीआरएफ ने संयुक्त रूप से घायलों को प्राथमिक उपचार देने और सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाने का अभ्यास किया।
चमोली: सीमांत जनपद में टनल धंसाव, एवलांच (हिमस्खलन) और भूकंप से भवन क्षति जैसे गंभीर परिदृश्यों पर ड्रिल की गई। मलबे में फंसे लोगों को निकालने और प्रभावित क्षेत्रों में त्वरित चिकित्सा सहायता पहुँचाने की प्रक्रिया को परखा गया।(UTTARAKHAND DISASTER MANAGEMENT)
पिथौरागढ़: यहाँ भूकंप और भूस्खलन के साथ-साथ ‘केमिकल गैस रिसाव’ जैसी औद्योगिक आपदा पर भी अभ्यास किया गया। धारचूला में राष्ट्रीय राजमार्ग अवरुद्ध होने की स्थिति में मार्ग खोलने और यातायात बहाली की कार्यवाही का सफल प्रदर्शन हुआ।
ऊधमसिंह नगर में औद्योगिक इकाइयों में दुर्घटना और मानव-वन्यजीव संघर्ष पर ध्यान केंद्रित किया गया, जबकि अल्मोड़ा के रानीखेत और भिकियासैंण में बस दुर्घटना और वनाग्नि पर त्वरित कार्रवाई की गई। चम्पावत के पूर्णागिरि और लोहाघाट क्षेत्रों में जलभराव और रोड ब्लॉक की स्थिति में राहत कार्यों का प्रभावी प्रदर्शन किया गया। समग्र रूप से, इस दो दिवसीय अभ्यास ने यह सुनिश्चित किया है कि आगामी मानसून और यात्रा सीजन के दौरान उत्तराखंड का आपदा प्रबंधन तंत्र किसी भी अनहोनी से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार और सजग है।

उत्तराखंड अपनी प्राकृतिक बनावट के कारण यह राज्य आपदाओं के प्रति अत्यंत संवेदनशील है। हिमालय की युवा पर्वत श्रृंखला, अस्थिर भूगर्भीय संरचना, तीव्र ढाल और बदलती जलवायु परिस्थितियाँ यहां बार-बार प्राकृतिक आपदाओं को जन्म देती हैं। यहां बाढ़, बादल फटना, भूस्खलन, भूकंप, हिमस्खलन और ग्लेशियर से जुड़ी घटनाएं आम हैं। मानसून के दौरान भारी वर्षा के कारण नदियों का जलस्तर अचानक बढ़ जाता है, जिससे बाढ़ की स्थिति बन जाती है।
इसके अलावा, उत्तराखंड भूकंप के दृष्टिकोण से भी अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र में आता है। यह राज्य भूकंपीय जोन-4 और जोन-5 में स्थित है, जो उच्च जोखिम वाले क्षेत्र माने जाते हैं। यदि यहां कोई बड़ा भूकंप आता है, तो पहाड़ी क्षेत्रों में बसे शहरों और गांवों को भारी नुकसान हो सकता है। यही कारण है कि वैज्ञानिक और विशेषज्ञ लगातार यहां भूकंपरोधी निर्माण की आवश्यकता पर जोर देते हैं। गर्मी के मौसम में जंगलों में लगने वाली आग भी एक गंभीर समस्या बनती जा रही है।(UTTARAKHAND DISASTER MANAGEMENT)
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