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हो..होरी ऐगे……! मन मोह लेते हैं उत्तराखंड में मनाए जाने वाले होली के ये पारंपरिक महोत्सव

UTTARAKHAND HOLI: उत्तराखंड राज्य अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान और सदियों पुरानी परंपराओं के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है। यहाँ मनाए जाने वाले त्योहारों में होली का एक विशेष स्थान है, जो रंगों के साथ-साथ संगीत, लोक नृत्य और सामुदायिक मेलजोल का अनूठा संगम पेश करता है। इस साल भी उत्तराखंड में होली का मुख्य पर्व 4 मार्च को हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा। लेकिन इससे  पूरे राज्य में इसकी धूम रहेगी। राज्य के दो प्रमुख मंडलों, कुमाऊं और गढ़वाल में इस त्योहार को मनाने की अपनी अलग-अलग पद्धतियां हैं।

UTTARAKHAND HOLI
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UTTARAKHAND HOLI: होली की ऐतिहासिक जड़ें और संगीत परंपरा

कुमाऊं मंडल में होली के उत्सव की शुरुआत बसंत पंचमी के पावन पर्व से हो जाती है। कुमाऊं की होली लगभग दो महीने तक चलने वाला एक विस्तृत संगीतमय सफर है। कुमाऊनी होली की परंपराओं का संबंध 10वीं से 18वीं शताब्दी के बीच शासन करने वाले चंद राजवंश से माना जाता है। इस क्षेत्र की होली गायन शैली पर ब्रज की होली और उत्तर भारतीय शास्त्रीय संगीत का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। उत्सव के दौरान गाए जाने वाले गीतों में मुख्य रूप से भगवान कृष्ण की लीलाओं, भक्ति रस और सामाजिक एकता का सुंदर चित्रण मिलता है।

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बैठकी, खड़ी और महिला होली के विविध रूप

कुमाऊं की होली को मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया है, जिनमें बैठकी होली, खड़ी होली और महिला होली शामिल हैं।

  • बैठकी होली का दौर बसंत पंचमी से प्रारंभ होकर महाशिवरात्रि तक चलता है। इस दौरान लोग घरों, मोहल्लों या मंदिरों के प्रांगण में एक घेरा बनाकर बैठते हैं और शास्त्रीय रागों पर आधारित होली गीतों का गायन करते हैं। इन बैठकों में राग भैरव, तोड़ी और पीलू जैसे गंभीर रागों का प्रयोग किया जाता है। गायन के साथ तबला, हारमोनियम और ट्रंपेट जैसे वाद्ययंत्रों की संगति इस अनुभव को और भी समृद्ध बनाती है। अल्मोड़ा, हल्द्वानी और पिथौरागढ़ जैसे नगरों में बैठकी होली का विशेष आकर्षण रहता है।
  • बैठकी होली के अगले चरण के रूप में खड़ी होली का आयोजन होता है, जिसका प्रभाव नैनीताल और ग्रामीण अंचलों में अधिक देखा जाता है। इसमें ग्रामीण पुरुष सफेद कुर्ता-पायजामा और टोपी पहनकर टोलियां बनाते हैं और घर-घर जाकर ढोलक व मंजीरे की थाप पर सामूहिक नृत्य और गायन करते हैं।
  • इसी प्रकार, कुमाऊं में महिला होली का भी अपना एक अलग महत्व है। महिलाएं समूहों में एकत्रित होकर पारंपरिक लोक गीतों के माध्यम से हास्य-व्यंग्य और भक्ति भाव को अभिव्यक्त करती हैं। इन आयोजनों में आलू गुटका, गुजिया और जंबू जैसे स्थानीय पहाड़ी व्यंजनों का विशेष रूप से आदान-प्रदान किया जाता है।
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सरकारी प्रयास और सांस्कृतिक संरक्षण

उत्तराखंड सरकार द्वारा राज्य की इन विलक्षण लोक परंपराओं को संरक्षित करने और नई पीढ़ी तक पहुँचाने के लिए निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं। बीते दिनों मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सांस्कृतिक विरासत को बढ़ावा देने की दिशा में चंपावत में आयोजित खड़ी होली महोत्सव का उद्घाटन वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से किया। इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि खड़ी होली राज्य की अमूल्य सांस्कृतिक विरासत होने के साथ-साथ सामाजिक समरसता और आपसी भाईचारे का एक सशक्त प्रतीक है।

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प्राकृतिक सौंदर्य और अनुष्ठानों का संगम है UTTARAKHAND HOLI

उत्तराखंड की होली की एक और विशेषता यह है कि यहाँ कृत्रिम रंगों के बजाय प्राकृतिक गुलाल और संसाधनों का सीमित उपयोग किया जाता है। पर्व का मुख्य केंद्र बिंदु पारंपरिक अनुष्ठान जैसे ‘चीर बंधन’ और ‘होली पत्र’ होते हैं। मार्च के महीने में जब पहाड़ बुरांश (रोडोडेंड्रोन) के लाल फूलों से लद जाते हैं, तब इन प्राकृतिक रंगों के बीच होली का उत्साह दोगुना हो जाता है। पहाड़ी परिवेश का प्राकृतिक सौंदर्य इन पारंपरिक गीतों और नृत्यों को एक जीवंत पृष्ठभूमि प्रदान करता है।

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Abhishek Semwal is Postgraduate in Mass Communication with over three years of experience across digital and print media. Covering a wide range of subjects, with a strong focus on local and regional issues, delivering clear, insightful and engaging content.
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