WORLD HEART DAY: आज, 29 सितंबर को पूरी दुनिया विश्व हृदय दिवस मना रही है। यह दिन हृदय रोगों के प्रति जागरूकता बढ़ाने और लोगों को स्वस्थ जीवनशैली अपनाने के लिए प्रेरित करने का एक वैश्विक अभियान है। विश्व हृदय महासंघ (WHF) द्वारा स्थापित यह दिवस हर साल इसी तारीख को मनाया जाता है, ताकि लोगों को याद दिलाया जा सके कि हृदय रोग अब भी दुनिया में मौत का सबसे बड़ा कारण बने हुए हैं। इस वर्ष 2025 में WORLD HEART DAY अपनी 25वीं वर्षगांठ मना रहा है। इस मौके पर रखी गई थीम है “Don’t Miss a Beat” (एक धड़कन भी न चूके)।
WORLD HEART DAY: बदलती जीवनशैली, गलत खानपान और बढ़ते तनाव ने हर उम्र के लोगों को इसके खतरे में डाल दिया है
WORLD HEART DAY की थीम का उद्देश्य है लोगों को समय पर हृदय स्वास्थ्य की जांच, नियमित व्यायाम, संतुलित आहार और तनाव-मुक्त जीवनशैली अपनाने के लिए प्रेरित करना। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर समय रहते जांच और इलाज किया जाए तो हृदय रोगों से होने वाली मौतों को काफी हद तक कम किया जा सकता है। देखा जाये तो बदलती जीवनशैली, गलत खानपान और बढ़ते तनाव ने हर उम्र के लोगों को इसके खतरे में डाल दिया है। ऐसे हालात में समय पर जागरूक होना और सही जानकारी हासिल करना बेहद ज़रूरी है। जानिए इस चीज को लेकर दून हॉस्पिटल के वरिष्ठ कार्डियोलॉजिस्ट डॉक्टर अमर उपाध्याय का क्या कहना है।

सवाल: आजकल युवाओं में दिल के दौरे के मामले तेज़ी से क्यों बढ़ रहे हैं? इसके पीछे जीवनशैली के अलावा और क्या कारण हैं?
जवाब: देखिए, युवाओं को हमारे देश में दिल के दौरे पहले भी पड़ते थे और आज भी पड़ रहे हैं। दरअसल, अगर तुलना करें तो हमारे देश में हार्ट अटैक की औसत उम्र बाकी देशों की तुलना में कम है। यही कारण है कि भारत में युवाओं को दिल के दौरे ज़्यादा आते हैं। वास्तव में, भारत में लगभग 40% हार्ट अटैक के मरीज ऐसे होते हैं जिनकी उम्र 40 साल से कम होती है। तो यह बिल्कुल साफ है कि हार्ट अटैक सिर्फ बुजुर्गों की बीमारी नहीं है, बल्कि युवाओं में भी बड़ी संख्या में देखने को मिलती है। ज़्यादातर कम उम्र में वही लोग प्रभावित होते हैं जिनमें कोई-न-कोई जोखिम कारक पहले से मौजूद हो।

सवाल: आपने भारत की बात की। तो हार्ट प्रॉब्लेम्स के मामले में भारत बाकी देशों से किस तरह अलग है? क्या इसका कोई जेनेटिकल कारण है या कुछ और वजहें हैं?
जवाब: भारत की स्थिति कई मायनों में अलग है। दरअसल, अगर आप देखें तो हमारे पूर्वजों का जीवन खेती-किसानी पर आधारित रहा है। खेती पर निर्भरता का मतलब यह था कि भोजन की उपलब्धता हमेशा एक-सी नहीं रहती थी। अगर अकाल पड़ गया तो खाने की कमी हो जाती थी। ऐसे में हमारे शरीर का विकास इस तरह हुआ कि वह कम ऊर्जा में भी काम चला सके। इसके अलावा भारतीय समाज का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है शारीरिक मेहनत लेकिन आजकल यही चीज कम हो गयी है। हमारे शरीर की सदियों से चली आ रही मेहनती संरचना आज कल के केएम मेहनत वाले समय में हमारे लिए जोखिम पैदा कर रही है।
भारतीय शरीर में फैट ज़्यादा और मसल्स अपेक्षाकृत कम होते हैं। यह प्रवृत्ति हमें हृदय रोगों के प्रति संवेदनशील बनाती है। और जब वर्तमान हालात ऐसे हो गए हैं कि लोगों की फ़िज़िकल एक्टिविटी कम हो गयी है जिस कारण शरीर में भोजन और कैलोरी की भरमार हो जाती है समस्या और बढ़ जाती है। हमारा शरीर जो कम कैलोरी में टिके रहने के लिए बना था, वह अब ज़्यादा कैलोरी झेल रहा है। नतीजा यह हुआ कि हमें ब्लड प्रेशर, डायबिटीज़ और हार्ट अटैक जैसी बीमारियाँ पहले से कहीं ज़्यादा और कम उम्र में होने लगी हैं।(WORLD HEART DAY)

सवाल: आज कल लोगों की ज़िंदगी में तनाव काफी बढ़ गया है, इसका हार्ट की सेहत से कैसा संबंध है? और किस तरह से हम तनाव को मैनेज करके दिल की समस्याओं से बच सकते हैं?
जवाब: आपने बिल्कुल सही मुद्दा उठाया। तनाव या स्ट्रेस हार्ट डिज़ीज़ का एक बहुत अहम रिस्क फैक्टर है। दरअसल, तनाव तब पैदा होता है जब इंसान जितने संसाधन उसके पास हैं, उनसे ज़्यादा करने की कोशिश करता है। या फिर जितनी क्षमता है, उससे ज़्यादा काम का बोझ ले लेता है। यह जीवन के हर पहलू में देखने को मिलता है। तनाव से निपटने का सबसे अच्छा तरीका है कि हम अपने सोशल लाइफ को मजबूत रखें। लोगों से बातचीत करें, अपने रिश्तों और दोस्तों से जुड़े रहें। इसके अलावा, अपनी हॉबीज़ (शौक) विकसित करना, खेलकूद में हिस्सा लेना, परिवार के साथ समय बिताना ये सब चीज़ें तनाव को काफी कम करती हैं।

सवाल: सर, हार्ट प्रॉब्लम से जुड़े शुरुआती लक्षण क्या होते हैं जिन्हें नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए?
जवाब: हार्ट की बीमारियों के चार प्रमुख लक्षण होते हैं। पहला छाती में दर्द होना, दूसरा सांस फूलना, तीसरा धड़कन का तेज़ होना या घटना और चौथा चक्कर आना। मैं दोहराता हूं छाती में दर्द, चलने-फिरने पर सांस फूलना, धड़कन महसूस होना और चक्कर आना। अगर इनमें से कोई भी लक्षण हों तो तुरंत हृदय रोग विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए ताकि शुरुआती स्टेज में ही जांच और इलाज किया जा सके।(WORLD HEART DAY)

सवाल: डाइट का हार्ट पर क्या असर पड़ता है और अगर पड़ता है तो कौन सी डाइट नुकसान पहुंचाती है?
जवाब: हमारी पारंपरिक डाइट ही कई बार नुकसानदायक साबित होती है। इसमें कार्बोहाइड्रेट बहुत ज़्यादा और प्रोटीन बहुत कम होता है। ज़्यादा कार्बोहाइड्रेट और कम प्रोटीन लेने से उम्र के साथ मसल्स कमज़ोर होते जाते हैं और शरीर में चर्बी बढ़ती जाती है। नतीजा होता है वज़न बढ़ना, डायबिटीज़ और ब्लड प्रेशर जैसी समस्याएं, जो आगे हार्ट डिज़ीज़ को बढ़ाती हैं। हरी सब्जियां और फल भी हम कम खाते हैं। इसलिए ज़रूरी है कि कार्बोहाइड्रेट की जगह प्रोटीन को बढ़ाएं, हरी सब्जियां और मौसमी फल रोज़ खाएं। इसी तरह आप अपने खाने को हेल्दी बना सकते हैं और हार्ट डिज़ीज़ से बच सकते हैं।

सवाल: कोलेस्ट्रॉल को लेकर लोगों में कई तरह की गलतफहमियां हैं। असलियत क्या है?
जवाब: सबसे अहम बात यह है कि कोलेस्ट्रॉल बढ़ने पर कोई लक्षण दिखाई नहीं देते। यानी व्यक्ति को पता ही नहीं चलता। कई बार युवाओं में हार्ट अटैक का कारण यही बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल होता है और यह कई बार अनुवांशिक भी होता है। माता-पिता से बच्चों में यह समस्या जा सकती है। गाइडलाइंस कहती हैं कि 20 साल की उम्र के बाद हर किसी को कम से कम एक बार कोलेस्ट्रॉल की जांच कर लेनी चाहिए। खासकर एलडीएल कोलेस्ट्रॉल चेक करना ज़रूरी है। शुगर और ब्लड प्रेशर को जीवनशैली से नियंत्रित किया जा सकता है लेकिन कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल करने के लिए दवाइयों की ज़रूरत पड़ती है।

सवाल: दवाइयों से बचने और हार्ट को हेल्दी रखने के लिए क्या करना चाहिए?
जवाब: हार्ट डिज़ीज़ उन्हीं को होती है जिनमें रिस्क फैक्टर्स मौजूद हों। ये चार प्रमुख रिस्क फैक्टर हैं स्मोकिंग, बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल, हाई ब्लड प्रेशर और शुगर। अगर ये चारों नहीं हैं तो हार्ट डिज़ीज़ का खतरा बहुत कम है। इनसे बचने के लिए हेल्दी डाइट, फिजिकल एक्टिविटी, वज़न नियंत्रित रखना और रोज़ाना कम से कम 8 से 10 हज़ार कदम चलना चाहिए। अगर किसी को शुगर, ब्लड प्रेशर या कोलेस्ट्रॉल है तो दवाइयों के साथ-साथ जीवनशैली में बदलाव ज़रूरी है। तभी हार्ट डिज़ीज़ से बचाव संभव है।

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