DURGA POOJA: हर साल जब आश्विन का महीना आता है, तो भारत के पूर्वी हिस्सों में एक खास रौनक शुरू हो जाती है, जिसे दुर्गा पूजा के नाम से जाना जाता है। यह हिंदू धर्म का अत्यधिक महत्वपूर्ण त्योहार है, जो देवी दुर्गा की महिषासुर नामक राक्षस पर विजय का जश्न मनाने के लिए 10 दिनों तक भव्यता से मनाया जाता है। इन दिनों में शहरों और गाँवों में पंडालों की सजावट देखने लायक होती है। ये दुर्गा पूजा को और भी खास बनाती है। हर गली, हर मोहल्ले में पंडालों की सजावट अलग-अलग थीम और रंगों से होती है, जो पर्यटकों और भक्तों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करती है।

DURGA POOJA की शुरुआत महालया से
दुर्गा पूजा की शुरुआत महालया से होती है, जो देवी दुर्गा के धरती पर आगमन का संकेत देता है। इस दिन लोग अपने घरों और मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना का आयोजन करते हैं। असली उत्सव शष्ठी यानी छठे दिन से आरंभ होता है, जब देवी दुर्गा के साथ-साथ लक्ष्मी, सरस्वती, गणेश और कार्तिकेय की मूर्तियों की पूजा की जाती है। पंडालों में देवी की भव्य मूर्तियाँ स्थापित की जाती हैं, जिनमें वह शेर पर सवार होकर महिषासुर से लड़ने के लिए तैयार दिखाई जाती हैं।

अष्टमी और नवमी के दिन विशेष पूजा
अष्टमी और नवमी के दिन विशेष पूजा और अर्चनाएं होती हैं। अष्टमी के दिन विशेष रूप से कुमारी पूजन का आयोजन किया जाता है, जहां छोटी लड़कियों को देवी के रूप में पूजा जाता है। नवमी के दिन महाआरती और पुष्पांजलि की जाती है, जो उत्सव का मुख्य आकर्षण होता है।
विजयदशमी के दिन मूर्ति विसर्जन
विजयदशमी के दिन देवी की मूर्तियों को पारंपरिक तरीके से नदी या समुद्र में विसर्जित किया जाता है। यह विसर्जन एक भावुक पल होता है, जब लोग देवी से अगले साल फिर लौटने की प्रार्थना करते हैं। विसर्जन के दौरान पूरे शहर में एक उत्साही माहौल होता है, जहां भक्त झूमते, नाचते और जयकारे लगाते हुए देवी की विदाई करते हैं। इस दौरान पंडालों के आसपास दुकानों और बाजारों में रौनक होती है। यह त्योहार कला, संगीत और नाट्य प्रस्तुतियों का भी एक अवसर है, जहां कलाकार अपने हुनर को प्रदर्शित करते हैं।

दुर्गा पूजा का पौराणिक महत्व
पौराणिक कथाओं में दुर्गा पूजा का उल्लेख महिषासुर वध की कहानी के साथ जुड़ा हुआ है। देवी दुर्गा ने महिषासुर को मारने के लिए नौ दिनों तक युद्ध किया और दसवें दिन उसकी पराजय कर दी, जिसे हम विजयदशमी के रूप में मनाते हैं। यह कथा हमें बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश देती है। रामायण की कथा से जुड़ी एक और महत्वपूर्ण कहानी है जिसमें भगवान राम ने देवी दुर्गा का आह्वान किया था, जिसे “अकालबोधन” के नाम से जाना जाता है। जब रावण से युद्ध के दौरान राम ने सीता को बचाने के लिए देवी से आशीर्वाद मांगा था। इसी कारण से शारदीय नवरात्रि और दुर्गा पूजा का महत्व और भी बढ़ जाता है।

वर्तमान समय में दुर्गा पूजा का स्वरूप
समय के साथ दुर्गा पूजा ने अपनी पारंपरिक सीमाओं को पार कर एक आधुनिक स्वरूप धारण कर लिया है।
- बड़े-बड़े पंडाल और मूर्तियाँ पर्यटकों का भी मुख्य आकर्षण बन गए हैं। स्थानीय कलाकारों और शिल्पकारों के लिए यह त्योहार एक बड़ा मंच है, जहां वे अपनी कला और शिल्प का प्रदर्शन करते हैं।
- हाल के वर्षों में, पर्यावरणीय जागरूकता के कारण मिट्टी की मूर्तियों के निर्माण और उनके विसर्जन पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। रासायनिक रंगों और प्लास्टर ऑफ पेरिस के उपयोग से होने वाले प्रदूषण को रोकने के लिए कई स्थानों पर इको-फ्रेंडली मूर्तियों का निर्माण किया जा रहा है।
- सिंदूर खेला, जो पहले केवल विवाहित महिलाओं के लिए था, अब हर महिला के लिए खुला हो गया है। यह बदलाव समाज में महिलाओं की समानता और भागीदारी को बढ़ावा देता है।
- दुर्गा पूजा केवल एक धार्मिक त्योहार नहीं है, बल्कि यह एक सांस्कृतिक, सामाजिक और भावनात्मक यात्रा है, जो हर साल हजारों लोगों को एक साथ लाती है। (DURGA POOJA)
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