Certificate of Origin एक्सपोर्ट का वह ज़रूरी दस्तावेज़ है जो साबित करता है कि भेजा जा रहा सामान असल में किस देश में बना है। बहुत से नए एक्सपोर्टर्स को इसकी जानकारी नहीं होती और आखिरी समय पर शिपमेंट अटक जाता है। क्या हर एक्सपोर्ट में यह सर्टिफिकेट लगता है? इसे कौन देता है और 2026 में इसका तरीका कितना बदल गया है? इस आसान गाइड में आपको हर सवाल का जवाब मिलेगा।
कंट्री ऑफ ओरिजिन सर्टिफिकेट क्या होता है?
सरल भाषा में कहें तो यह सामान का “जन्म प्रमाण पत्र” है। इसमें लिखा होता है कि माल कहां बना, किसने भेजा, किसे भेजा और उसकी मात्रा कितनी है। विदेश का कस्टम विभाग इसी दस्तावेज़ को देखकर तय करता है कि उस सामान पर कितनी इंपोर्ट ड्यूटी लगेगी। सामान की पहचान और ट्रेड नियमों के पालन के लिए भी इसे देखा जाता है।
Certificate of Origin के कितने प्रकार होते हैं?
भारत में यह दो तरह का होता है: प्रेफरेंशियल और नॉन प्रेफरेंशियल। दोनों का काम अलग है, इसलिए सही प्रकार चुनना बहुत ज़रूरी है।
- प्रेफरेंशियल CoO: यह उन देशों में एक्सपोर्ट के लिए लिया जाता है जिनके साथ भारत का फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) या प्रेफरेंशियल ट्रेड एग्रीमेंट है। इसके दम पर खरीदार को वहां कम या शून्य इंपोर्ट ड्यूटी देनी पड़ती है। UAE, ऑस्ट्रेलिया, ASEAN देश और SAFTA के सदस्य देश इसके अच्छे उदाहरण हैं। इसमें सामान को समझौते के “रूल्स ऑफ ओरिजिन” पूरे करने होते हैं।
- नॉन प्रेफरेंशियल CoO: यह सिर्फ इतना बताता है कि सामान भारत में बना है। इससे कोई ड्यूटी छूट नहीं मिलती, लेकिन कई देश और खरीदार इसे अनिवार्य रूप से मांगते हैं।
एक्सपोर्ट में कब जरूरी होता है Certificate of Origin?
सबसे पहली स्थिति तब आती है जब आप किसी FTA वाले देश को माल भेज रहे हों और खरीदार ड्यूटी में छूट चाहता हो। इसके बिना उसे पूरी ड्यूटी चुकानी पड़ेगी। दूसरी स्थिति तब बनती है जब इंपोर्ट करने वाले देश का कस्टम कानून इसे ज़रूरी बनाता है। खाड़ी देशों समेत कई बाज़ारों में यह आम बात है।
तीसरी स्थिति लेटर ऑफ क्रेडिट (LC) से जुड़ी है। अगर बैंक के LC में यह दस्तावेज़ मांगा गया है, तो इसके बिना आपका पेमेंट अटक सकता है। इसके अलावा एंटी डंपिंग जांच, सरकारी टेंडर या खरीदार की अपनी शर्तों के कारण भी इसकी ज़रूरत पड़ती है। इसलिए ऑर्डर कन्फर्म करते समय ही खरीदार से यह बात साफ कर लें।
यह सर्टिफिकेट कौन जारी करता है?
प्रेफरेंशियल CoO आमतौर पर एक्सपोर्ट इंस्पेक्शन काउंसिल (EIC) और सरकार द्वारा अधिकृत एजेंसियां जारी करती हैं, क्योंकि इसमें ओरिजिन की सख्त जांच होती है। नॉन प्रेफरेंशियल CoO देश भर के अधिकृत चैंबर ऑफ कॉमर्स जारी करते हैं। ये सभी एजेंसियां अब DGFT के एक ही डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़ी हैं। 2026 में ऑनलाइन आवेदन की प्रक्रिया 1 जनवरी 2025 से नॉन प्रेफरेंशियल CoO का इलेक्ट्रॉनिक आवेदन अनिवार्य है।
यह DGFT के eCoO 2.0 सिस्टम से trade.gov.in पोर्टल पर होता है। अप्रैल 2026 में DGFT ने नियम और सख्त कर दिए। अब सभी अधिकृत एजेंसियां केवल तय इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफॉर्म से ही आवेदन लेंगी और सर्टिफिकेट जारी करेंगी, मैनुअल सर्टिफिकेट की अनुमति नहीं है।
सितंबर 2026 में ओपन API सुविधा भी शुरू हुई। इससे बड़े एक्सपोर्टर अपने ERP या अकाउंटिंग सॉफ्टवेयर से सीधे आवेदन भेज सकते हैं और बार बार डेटा भरने की झंझट खत्म होती है। नए सिस्टम में एक IEC पर कई यूज़र जोड़ने, आधार ई साइन करने और गलती सुधारने के लिए “इन लू” सर्टिफिकेट मांगने की सुविधा भी है। री एक्सपोर्ट या ट्रांसशिपमेंट वाले माल के लिए बैक टू बैक CoO भी ऑनलाइन मिलता है।

आवेदन के लिए ज़रूरी दस्तावेज़
आवेदन के लिए वैध IEC नंबर सबसे पहली शर्त है। इसके साथ कमर्शियल इनवॉइस और पैकिंग लिस्ट की ज़रूरत होती है। शिपिंग बिल या बिल ऑफ लैडिंग की जानकारी भी देनी होती है। प्रेफरेंशियल सर्टिफिकेट के लिए कॉस्ट शीट या मैन्युफैक्चरिंग प्रूफ जैसे दस्तावेज़ भी मांगे जा सकते हैं, ताकि ओरिजिन के नियम साबित हो सकें।
ध्यान रखें कि इनवॉइस, पैकिंग लिस्ट और सर्टिफिकेट में सामान का विवरण, HS कोड और मात्रा बिल्कुल एक जैसी हो। छोटी सी गड़बड़ी पर भी विदेशी कस्टम Certificate of Origin खारिज कर सकता है।
एक्सपोर्ट से जुड़ी और उपयोगी जानकारी
अगर आप एक्सपोर्ट बिज़नेस शुरू कर रहे हैं, तो शिपमेंट रिजेक्ट होने से बचाने वाले पैकेजिंग नियम ज़रूर पढ़ें। छोटे कारोबारियों के लिए Foreign Trade Policy में MSME को मिलने वाले लाभ भी काम की जानकारी है। साथ ही SEZ में मिलने वाली टैक्स छूट के बारे में भी जान लें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
1. Certificate of Origin क्यों जरूरी होता है?
यह साबित करता है कि सामान किस देश में बना है। इसी के आधार पर विदेशी कस्टम ड्यूटी तय करता है और FTA का लाभ देता है।
2. क्या हर एक्सपोर्ट शिपमेंट के लिए Certificate of Origin लेना पड़ता है?
नहीं, हर शिपमेंट में यह अनिवार्य नहीं है। यह तब लेना होता है जब खरीदार, LC या इंपोर्ट करने वाले देश के नियम इसे मांगें, या ड्यूटी छूट चाहिए हो।
3. प्रेफरेंशियल और नॉन प्रेफरेंशियल Certificate of Origin में क्या अंतर है?
प्रेफरेंशियल CoO से ट्रेड एग्रीमेंट वाले देशों में ड्यूटी छूट मिलती है। नॉन प्रेफरेंशियल केवल ओरिजिन बताता है, इससे कोई टैक्स लाभ नहीं मिलता।
4. क्या अब मैनुअल Certificate of Origin मिल सकता है?
नहीं, अप्रैल 2026 के DGFT नोटिफिकेशन के बाद सभी एजेंसियां केवल इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफॉर्म से ही सर्टिफिकेट जारी करती हैं।
5. Certificate of Origin का ऑनलाइन आवेदन कहां करें?
आवेदन DGFT के ट्रेड कनेक्ट प्लेटफॉर्म पर होता है। पूरी प्रक्रिया और ताज़ा नियम आप आधिकारिक पोर्टल पर देख सकते हैं।
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उपरोक्त Certificate of Origin की जानकारी गूगल और विभिन्न वेबसाइट/समाचार माध्यमों से ली गई है। सटीकता की गारंटी नहीं है।

