Special Intensive Revision यानी SIR चुनाव आयोग की वह प्रक्रिया है, जिसमें मतदाता सूची को लगभग नए सिरे से घर-घर जाकर जांचा और तैयार किया जाता है, ताकि सूची में सिर्फ योग्य मतदाताओं के नाम रहें। पिछले एक साल से SIR देश की राजनीति का सबसे बड़ा मुद्दा बना हुआ है।
बिहार से शुरू हुई यह प्रक्रिया अब कई राज्यों तक पहुंच चुकी है। एक तरफ चुनाव आयोग इसे साफ और सही वोटर लिस्ट के लिए जरूरी बता रहा है, तो दूसरी तरफ विपक्ष इस पर सवाल उठा रहा है। आइए आसान भाषा में समझते हैं कि SIR क्या है, इसके कानून और नियम क्या हैं और इतनी चर्चा क्यों हो रही है।
Special Intensive Revision क्या है?
हर साल वोटर लिस्ट का सामान्य संशोधन होता है, जिसमें नए नाम जुड़ते हैं और कुछ नाम हटते हैं। इसमें पुरानी सूची को ही आधार माना जाता है। SIR इससे अलग और ज्यादा गहन प्रक्रिया है। इसमें बूथ लेवल अधिकारी यानी BLO हर घर जाकर हर मतदाता से गणना फॉर्म भरवाते हैं और जरूरत पड़ने पर दस्तावेज भी मांगे जाते हैं।
इसका मकसद सूची से मृत लोगों, दो जगह दर्ज नामों, स्थायी रूप से दूसरी जगह जा चुके लोगों और अयोग्य व्यक्तियों के नाम हटाना और छूटे हुए योग्य लोगों को जोड़ना है। चुनाव आयोग के अनुसार ऐसी गहन समीक्षा कई सालों बाद हो रही है। बिहार में पिछली बार यह 2003 में हुई थी। इस बीच शहरीकरण और पलायन से सूची में काफी गड़बड़ियां जमा हो गई थीं।
अब तक कहां और कैसे हुआ SIR?
चुनाव आयोग ने 24 जून 2025 को SIR का आदेश जारी किया और शुरुआत बिहार से हुई। बिहार में करीब 7.89 करोड़ मतदाताओं से शुरू होकर 30 सितंबर 2025 को आई अंतिम सूची में लगभग 7.42 करोड़ नाम रहे। इसके बाद अगले चरण में उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात समेत 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में यह प्रक्रिया चली। 2026 में दिल्ली, महाराष्ट्र और कई दूसरे राज्यों में भी SIR का काम चल रहा है। दिल्ली की अंतिम मतदाता सूची 7 अक्टूबर 2026 को जारी होनी थी।
SIR से जुड़े कानून और नियम
संविधान का अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग को मतदाता सूची तैयार करने और चुनाव कराने की पूरी जिम्मेदारी देता है। अनुच्छेद 326 कहता है कि 18 साल या उससे ज्यादा उम्र का हर भारतीय नागरिक मतदाता बनने का हकदार है, अगर वह किसी कानून के तहत अयोग्य न हो। जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21 आयोग को मतदाता सूची के सामान्य संशोधन के साथ किसी भी समय विशेष संशोधन करने का अधिकार देती है।
पूरी प्रक्रिया मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 के तहत होती है। किसी नाम को हटाने से पहले सूचना देने और सुनवाई का मौका देने का प्रावधान है। नाम कटने से असहमत व्यक्ति पहले जिला मजिस्ट्रेट के पास और फिर राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के पास अपील कर सकता है।
SIR की प्रक्रिया कैसे चलती है?
पहले BLO घर-घर जाकर हर मतदाता को गणना फॉर्म की दो प्रतियां देते हैं। मतदाता फॉर्म भरकर एक प्रति लौटाता है, कई जगह यह फॉर्म ऑनलाइन भी भरा जा सकता है। इसके बाद ड्राफ्ट मतदाता सूची जारी होती है। लोग इसमें अपना नाम जांचकर दावा या आपत्ति दर्ज कर सकते हैं।
जिनके नाम पर संदेह होता है, उनसे पहचान और पात्रता के दस्तावेज मांगे जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर आधार को भी पहचान दस्तावेज के रूप में स्वीकार किया गया, हालांकि यह नागरिकता का सबूत नहीं माना जाता। सुनवाई और जांच पूरी होने के बाद अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित की जाती है।

इतनी चर्चा और विवाद क्यों?
विपक्षी दलों का आरोप है कि बड़ी संख्या में असली मतदाताओं के नाम कट सकते हैं, खासकर गरीब, प्रवासी मजदूर और बिना पक्के दस्तावेज वाले लोगों के। उन्होंने कम समय सीमा, दस्तावेजों के बोझ और Form 6 के साथ जोड़े गए अतिरिक्त घोषणा पत्र पर भी सवाल उठाए हैं। इन्हीं मुद्दों पर दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रदर्शन भी हो रहे हैं। चुनाव आयोग का कहना है कि यह पूरी तरह कानूनी और पारदर्शी प्रक्रिया है।
आयोग के मुताबिक राजनीतिक दलों के बूथ लेवल एजेंट भी इसमें शामिल रहते हैं और हर व्यक्ति को सुनवाई का मौका मिलता है। 27 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने बिहार SIR को चुनौती देने वाली याचिकाएं खारिज करते हुए इसे वैध ठहराया। कोर्ट ने कहा कि साफ मतदाता सूची स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए जरूरी है।
SIR की जरूरत क्यों बताई जा रही है?
सही मतदाता सूची लोकतंत्र की बुनियाद है। फर्जी, दोहरे या मृत लोगों के नाम चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल खड़े करते हैं। वहीं किसी एक योग्य नागरिक का नाम भी गलत तरीके से कटना उसके वोट के अधिकार का नुकसान है।
इसलिए Special Intensive Revision की असली कसौटी यही है कि सूची साफ भी हो और कोई सही मतदाता छूटे भी नहीं। अगर आपके इलाके में यह प्रक्रिया चल रही है, तो BLO को समय पर फॉर्म जमा करें और ड्राफ्ट सूची में अपना नाम जरूर जांचें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
1. Special Intensive Revision और सामान्य संशोधन में क्या फर्क है?
सामान्य संशोधन में पुरानी सूची को आधार मानकर बदलाव होते हैं, जबकि SIR में घर-घर जाकर हर मतदाता का नए सिरे से सत्यापन किया जाता है।
2. क्या सुप्रीम कोर्ट ने SIR को सही माना है?
हां, 27 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने बिहार SIR को वैध ठहराया और कहा कि आयोग को कानून के तहत यह अधिकार है।
3. अगर मेरा नाम ड्राफ्ट सूची में न हो तो क्या करें?
तय समय के अंदर दावा दर्ज करें और जरूरी दस्तावेज दें। नाम फिर भी न जुड़े तो जिला मजिस्ट्रेट के पास अपील कर सकते हैं।
4. क्या आधार कार्ड SIR में मान्य है?
आधार पहचान के दस्तावेज के रूप में स्वीकार किया जाता है, लेकिन इसे नागरिकता का प्रमाण नहीं माना जाता।
5. मतदाता सूची में अपना नाम ऑनलाइन कैसे जांचें?
चुनाव आयोग के आधिकारिक वोटर सर्विस पोर्टल पर EPIC नंबर या नाम से अपनी जानकारी जांच सकते हैं।
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