असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कांग्रेस और राहुल गांधी पर तीखा हमला बोलते हुए चुनाव प्रक्रिया को लेकर नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है। उन्होंने कहा है कि यदि कांग्रेस बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग करती है, तो उसे पहले केरल, कर्नाटक और तेलंगाना की सरकारों से इस्तीफा दिलवाना चाहिए। सरमा ने दावा किया कि इन राज्यों में भी सरकारें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल में कथित ‘वोट चोरी’ के जरिए बनी हैं। हालांकि, यह आरोप उनके राजनीतिक बयान का हिस्सा है और इसे साबित हुआ तथ्य नहीं माना जा सकता।
हिमंत ने बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग पर घेरा
हिमंत बिस्वा सरमा का यह बयान ऐसे समय आया है, जब कांग्रेस और विपक्षी दल मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर (SIR) तथा चुनावों में कथित अनियमितताओं को लेकर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग पर सवाल उठा रहे हैं। विपक्ष का कहना है कि चुनाव प्रक्रिया और मतदाता सूची से जुड़े मुद्दों पर पारदर्शिता सुनिश्चित की जानी चाहिए।
इसी राजनीतिक विवाद के बीच सरमा ने राहुल गांधी को चुनौती देते हुए कहा कि यदि कांग्रेस इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) के बजाय बैलेट पेपर से चुनाव चाहती है, तो उसे पहले उन राज्यों की सरकारों के इस्तीफे की मांग करनी चाहिए, जहां कांग्रेस सत्ता में है। उन्होंने अपने बयान के जरिए कांग्रेस की चुनावी मांगों पर सवाल उठाने की कोशिश की।
हिमंत ने राहुल गांधी पर भी साधा निशाना
असम के मुख्यमंत्री ने राहुल गांधी से यह सवाल भी किया कि यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चुनाव को लेकर ‘वोट चोरी’ के आरोप लगाए जा रहे हैं, तो क्या राहुल गांधी का लोकसभा चुनाव जीतना और नेता प्रतिपक्ष बनना भी उसी प्रक्रिया पर सवाल खड़े नहीं करता?
सरमा का तर्क था कि यदि कांग्रेस मौजूदा चुनाव व्यवस्था पर अविश्वास जताती है, तो उसे अपने राजनीतिक रुख में भी समानता दिखानी चाहिए। उन्होंने कांग्रेस से यह स्पष्ट करने को कहा कि क्या वह ईवीएम के माध्यम से होने वाले आगामी चुनावों में हिस्सा लेगी या उनका बहिष्कार करेगी।
हालांकि, किसी चुनाव प्रक्रिया पर राजनीतिक आरोप लगाना और उन आरोपों का प्रमाणित होना दो अलग-अलग बातें हैं। चुनावी निष्पक्षता से जुड़े सवालों का समाधान तथ्यों, पारदर्शी जांच और संवैधानिक संस्थाओं की प्रक्रिया के आधार पर किया जाना जरूरी है।
हिमंत ने एसआईआर को बताया जरूरी
हिमंत बिस्वा सरमा ने मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण का समर्थन करते हुए कहा कि देश में एसआईआर की प्रक्रिया आवश्यक है। उनके मुताबिक, मतदाता सूची को नियमित रूप से अपडेट करने से उसमें मौजूद गलतियों और अपात्र प्रविष्टियों की पहचान करने में मदद मिल सकती है।
उन्होंने असम, पश्चिम बंगाल और झारखंड में जनसांख्यिकीय बदलावों का उल्लेख करते हुए अवैध प्रवासन को लेकर भी चिंता जताई। सरमा ने कहा कि मतदाता सूची की जांच नियमित अंतराल पर होनी चाहिए और उन्होंने हर पांच साल में एसआईआर कराने की मांग रखी।
वहीं, मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर विपक्ष की मुख्य चिंताओं में पात्र मतदाताओं के नाम सुरक्षित रखना, सूची में संशोधन की प्रक्रिया पारदर्शी बनाना और किसी भी योग्य नागरिक को मतदान के अधिकार से वंचित होने से बचाना शामिल है। इसलिए एसआईआर को लेकर होने वाली बहस में प्रशासनिक दक्षता के साथ नागरिकों के मताधिकार की सुरक्षा भी महत्वपूर्ण है।
चुनाव आयोग और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर बहस तेज
सरमा ने कांग्रेस पर संवैधानिक संस्थाओं पर दबाव बनाने और चुनावी प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने का आरोप भी लगाया। उन्होंने विपक्ष के विरोध-प्रदर्शनों की आलोचना करते हुए कहा कि चुनाव आयोग जैसे संस्थानों पर सवाल उठाने के बजाय राजनीतिक दलों को चुनावी प्रक्रिया में अपनी भागीदारी और जवाबदेही स्पष्ट करनी चाहिए।
दूसरी ओर, विपक्षी दल चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची में बदलाव से जुड़े मुद्दों पर जवाब मांग रहे हैं। ऐसे में चुनाव आयोग की स्वतंत्रता, जवाबदेही और जनता के विश्वास को लेकर राजनीतिक टकराव बढ़ता दिखाई दे रहा है।
आगे क्या होगा?
हिमंत बिस्वा सरमा के बयान से स्पष्ट है कि ईवीएम, बैलेट पेपर, एसआईआर और कथित वोट चोरी को लेकर भाजपा तथा कांग्रेस के बीच राजनीतिक संघर्ष और तेज हो सकता है। यह विवाद केवल चुनाव कराने की तकनीक तक सीमित नहीं है, बल्कि चुनावी पारदर्शिता, मतदाता सूची की विश्वसनीयता और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता के भरोसे से भी जुड़ा हुआ है।
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि कांग्रेस इस चुनौती पर क्या प्रतिक्रिया देती है और चुनावी प्रक्रिया को लेकर उठाए जा रहे सवालों का समाधान किस तरह आगे बढ़ता है। लोकतंत्र में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की जिम्मेदारी है कि वे गंभीर आरोपों को प्रमाणों के आधार पर उठाएं तथा मतदाताओं के विश्वास को मजबूत करने के लिए संवैधानिक प्रक्रियाओं का सम्मान करें।
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निष्कर्ष:
हिमंत बिस्वा सरमा की चुनौती ने चुनावी सुधारों और कथित वोट चोरी को लेकर जारी राजनीतिक बहस को नया मोड़ दिया है। इस विवाद का वास्तविक समाधान आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर पारदर्शिता, निष्पक्ष जांच और मतदाताओं के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में ही निहित है।

