Procurement Process वह पूरी प्रक्रिया है, जिसके जरिए कोई कंपनी अपने काम के लिए जरूरी सामान, कच्चा माल या सेवाएं सही कीमत, सही गुणवत्ता और सही समय पर खरीदती है। किसी फैक्ट्री में कच्चा माल एक दिन देर से पहुंचे, तो पूरी प्रोडक्शन लाइन रुक सकती है।
वहीं जरूरत से महंगा सामान खरीदने पर मुनाफा धीरे धीरे खत्म होने लगता है। यही वजह है कि बड़ी कंपनियां खरीदारी को सिर्फ बिल चुकाने का काम नहीं मानतीं, बल्कि इसके लिए अलग टीम और सिस्टम रखती हैं। आइए समझते हैं कि यह प्रक्रिया कैसे काम करती है।
Procurement Process क्या है?
आसान भाषा में, Procurement Process का मतलब है जरूरत पहचानने से लेकर सप्लायर को भुगतान करने तक की पूरी खरीद व्यवस्था। इसमें सिर्फ ऑर्डर देना नहीं, बल्कि सही वेंडर चुनना, मोलभाव करना और रिकॉर्ड रखना भी शामिल है। कई लोग इसे सामान्य खरीदारी यानी परचेजिंग समझ लेते हैं। लेकिन परचेजिंग इस बड़ी प्रक्रिया का सिर्फ एक हिस्सा है, जिसमें ऑर्डर देकर भुगतान किया जाता है।
Procurement Process के मुख्य प्रकार
डायरेक्ट प्रोक्योरमेंट में वे चीजें आती हैं, जो सीधे प्रोडक्ट बनाने में इस्तेमाल होती हैं। जैसे कपड़ा कंपनी के लिए धागा या कार कंपनी के लिए स्टील। इनडायरेक्ट प्रोक्योरमेंट में ऑफिस का सामान, सॉफ्टवेयर, बिजली या साफ सफाई जैसी सेवाएं आती हैं, जो कारोबार चलाने में मदद करती हैं। इसके अलावा सर्विस प्रोक्योरमेंट भी होता है, जिसमें कंपनियां कंसल्टेंट, ऑडिटर या मार्केटिंग एजेंसी जैसी बाहरी सेवाएं लेती हैं।
कंपनियों में खरीद की प्रक्रिया कैसे चलती है?
सबसे पहले कोई विभाग अपनी जरूरत बताता है और एक परचेज रिक्वीजिशन यानी खरीद की मांग भेजता है। मैनेजर और फाइनेंस टीम बजट देखकर इसे मंजूरी देते हैं। इसके बाद प्रोक्योरमेंट टीम अलग अलग सप्लायर से कोटेशन मांगती है। बड़े ऑर्डर के लिए टेंडर या RFQ भी निकाला जाता है, ताकि सबसे अच्छा ऑफर मिल सके। कीमत, गुणवत्ता, डिलीवरी समय और सप्लायर के पिछले रिकॉर्ड की तुलना करके वेंडर चुना जाता है।
फिर उसके साथ शर्तें तय करके परचेज ऑर्डर जारी किया जाता है। सामान पहुंचने पर उसकी जांच होती है और गुड्स रिसीप्ट नोट बनाया जाता है। आखिर में परचेज ऑर्डर, रिसीप्ट और इनवॉइस का मिलान करके भुगतान किया जाता है, जिसे थ्री वे मैचिंग कहते हैं।
कंपनियां इसे कैसे मैनेज करती हैं?
आज ज्यादातर कंपनियां ERP सॉफ्टवेयर या ई प्रोक्योरमेंट प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करती हैं। इससे हर खरीद का डिजिटल रिकॉर्ड रहता है और मंजूरी भी ऑनलाइन मिल जाती है। कई कंपनियां भरोसेमंद सप्लायर के साथ लंबी अवधि का कॉन्ट्रैक्ट करती हैं, ताकि कीमतें स्थिर रहें और सप्लाई में रुकावट न आए।
सरकारी विभागों में खरीदारी के लिए GeM यानी गवर्नमेंट ई मार्केटप्लेस पोर्टल का इस्तेमाल होता है, जिससे पारदर्शिता बढ़ी है और छोटे कारोबारियों को भी सरकारी ऑर्डर पाने का मौका मिला है। इसके अलावा कंपनियां नियमित वेंडर ऑडिट करती हैं और खरीद से जुड़े खर्च का विश्लेषण करती हैं, ताकि पता चल सके कि कहां पैसा बचाया जा सकता है। अच्छे
प्रोक्योरमेंट के फायदे
एक मजबूत Procurement Process से कंपनी की लागत घटती है, क्योंकि मोलभाव और तुलना से बेहतर कीमत मिलती है। साथ ही गुणवत्ता पर भी नियंत्रण बना रहता है। इससे धोखाधड़ी और गलत भुगतान का खतरा कम होता है, क्योंकि हर कदम पर मंजूरी और रिकॉर्ड होता है। सप्लायर के साथ अच्छे रिश्ते भी कारोबार को लंबे समय तक मजबूत रखते हैं। हालांकि इसमें कुछ चुनौतियां भी आती हैं।
कच्चे माल की कीमतों में अचानक बदलाव, किसी एक सप्लायर पर ज्यादा निर्भरता और मंजूरी में देरी से काम धीमा पड़ सकता है। इसलिए समझदार कंपनियां हर जरूरी सामान के लिए कम से कम एक बैकअप सप्लायर तैयार रखती हैं और मंजूरी के नियम सरल बनाती हैं।
छोटे कारोबारियों के लिए जरूरी सलाह
छोटे कारोबार भी कम से कम दो या तीन सप्लायर से कोटेशन लेने की आदत डालें। हर खरीद का बिल और ऑर्डर संभालकर रखें, ताकि GST और हिसाब किताब में परेशानी न हो। शुरुआत में एक साधारण स्प्रेडशीट या सस्ता अकाउंटिंग सॉफ्टवेयर भी काफी है। कारोबार बढ़ने पर धीरे धीरे पूरा Procurement Process डिजिटल किया जा सकता है।

बिजनेस से जुड़ी और उपयोगी जानकारी सरकारी खरीद में हिस्सा लेने के लिए हमारी ई टेंडर प्रक्रिया वाली गाइड पढ़ें। खरीद के बाद बिलिंग समझने के लिए इनवॉइस पर लिखा लेख भी देखें। सही सॉफ्टवेयर चुनने के लिए ERP और CRM का अंतर भी जरूर समझें।
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
1. Procurement Process और परचेजिंग में क्या अंतर है?
परचेजिंग सिर्फ ऑर्डर देकर भुगतान करने का काम है, जबकि प्रोक्योरमेंट में जरूरत पहचानना, वेंडर चुनना, मोलभाव और रिकॉर्ड रखना भी शामिल है।
2. Procurement Process में थ्री वे मैचिंग क्या होती है?
भुगतान से पहले परचेज ऑर्डर, गुड्स रिसीप्ट नोट और सप्लायर के इनवॉइस का मिलान करना थ्री वे मैचिंग कहलाता है।
3. Procurement Process में RFQ का क्या मतलब है?
RFQ यानी रिक्वेस्ट फॉर कोटेशन, जिसमें कंपनी कई सप्लायर से किसी सामान या सेवा की कीमत का प्रस्ताव मांगती है।
4. क्या छोटे कारोबार को भी Procurement Process सिस्टम चाहिए?
हां, आसान रूप में ही सही। कोटेशन की तुलना और बिलों का रिकॉर्ड रखने से छोटे कारोबार भी अच्छी बचत कर सकते हैं।
5. सरकारी खरीद का पोर्टल कौन सा है?
केंद्र सरकार की खरीद के लिए आधिकारिक GeM पोर्टल का इस्तेमाल किया जाता है, जहां कारोबारी विक्रेता के रूप में रजिस्टर कर सकते हैं।
उपरोक्त जानकारी गूगल और विभिन्न वेबसाइट/समाचार माध्यमों से ली गई है। सटीकता की गारंटी नहीं है।

