Liquidation Preference टर्म शीट की वह शर्त है, जो तय करती है कि कंपनी बिकने, किसी दूसरी कंपनी में मर्ज होने या बंद होने पर सबसे पहले पैसा किसे और कितना मिलेगा। ज्यादातर फाउंडर्स फंडिंग के समय वैल्यूएशन के बड़े आंकड़े पर ध्यान देते हैं, लेकिन यह छोटी सी लाइन ही असली कमाई तय करती है। कई बार कंपनी करोड़ों में बिकती है, फिर भी फाउंडर्स और कर्मचारियों के हाथ बहुत कम पैसा आता है।
निवेशक यह शर्त क्यों रखते हैं?
स्टार्टअप में पैसा लगाना बहुत जोखिम भरा होता है, क्योंकि ज्यादातर स्टार्टअप उम्मीद के मुताबिक बड़े नहीं बन पाते। इसलिए निवेशक चाहते हैं कि अगर कंपनी कम कीमत पर बिके, तो कम से कम उनका लगाया पैसा पहले वापस मिल जाए। भारत में निवेशक आमतौर पर CCPS यानी कंपल्सरी कन्वर्टिबल प्रेफरेंस शेयर्स लेते हैं। प्रेफरेंस शेयर्स होने की वजह से ही उन्हें भुगतान में आम शेयरधारकों से पहले का अधिकार मिलता है।
Liquidation Preference कैसे काम करता है?
मान लीजिए किसी निवेशक ने 10 करोड़ रुपये लगाकर कंपनी की 20 प्रतिशत हिस्सेदारी ली और शर्त 1x की है। इसका मतलब है कि बिक्री के समय उसे पहले अपने 10 करोड़ रुपये वापस लेने का हक है। अगर कंपनी 30 करोड़ रुपये में बिकती है, तो 20 प्रतिशत के हिसाब से निवेशक को सिर्फ 6 करोड़ मिलते।
लेकिन इस शर्त की वजह से वह पूरे 10 करोड़ लेगा और बाकी 20 करोड़ फाउंडर्स और दूसरे शेयरधारकों में बंटेंगे। वहीं अगर कंपनी 100 करोड़ रुपये में बिके, तो निवेशक अपने शेयर्स को सामान्य शेयर्स में बदलकर 20 प्रतिशत यानी 20 करोड़ रुपये लेना पसंद करेगा, क्योंकि यह रकम ज्यादा है।
मल्टीपल का क्या मतलब है?
Liquidation Preference में 1x सबसे आम और फाउंडर्स के लिए सबसे संतुलित शर्त मानी जाती है। लेकिन कुछ निवेशक 2x या 3x की मांग भी करते हैं, यानी लगाए गए पैसे का दो या तीन गुना पहले वापस। ऊपर के उदाहरण में 2x शर्त होने पर 30 करोड़ की बिक्री में निवेशक 20 करोड़ ले जाएगा और बाकी सभी के लिए सिर्फ 10 करोड़ बचेंगे। इसलिए ऊंचा मल्टीपल फाउंडर्स के लिए बड़ा खतरे का संकेत है।
पार्टिसिपेटिंग और नॉन पार्टिसिपेटिंग में फर्क
नॉन पार्टिसिपेटिंग शर्त में निवेशक को दो में से एक विकल्प चुनना होता है: या तो अपना तय पैसा वापस ले या शेयर्स बदलकर हिस्सेदारी के हिसाब से रकम ले। यह फाउंडर्स के लिए ज्यादा अच्छा माना जाता है। पार्टिसिपेटिंग Liquidation Preference में निवेशक पहले अपना पैसा वापस लेता है और फिर बची रकम में भी अपनी हिस्सेदारी के हिसाब से हिस्सा लेता है।
30 करोड़ वाले उदाहरण में उसे 10 करोड़ के साथ बचे 20 करोड़ का 20 प्रतिशत भी मिलेगा, यानी कुल 14 करोड़। कई बार इस पर एक सीमा यानी कैप भी लगाई जाती है, ताकि निवेशक की कुल कमाई एक तय मल्टीपल से ज्यादा न हो।

कई फंडिंग राउंड होने पर क्या होता है?
जब कंपनी कई राउंड में पैसा जुटाती है, तो यह तय करना जरूरी हो जाता है कि किस राउंड के निवेशक को पहले भुगतान मिलेगा। स्टैक्ड यानी सीनियर ढांचे में सबसे नए राउंड के निवेशक को पहले पैसा मिलता है। पैरी पासु ढांचे में सभी निवेशक बराबर प्राथमिकता के साथ अपने निवेश के अनुपात में पैसा लेते हैं। फाउंडर्स के लिए यह समझना जरूरी है कि हर नया राउंड उनके हिस्से से पहले कितनी रकम की लाइन लगा रहा है।
स्टार्टअप फंडिंग से जुड़ी ये जानकारियां भी आपके काम आएंगी: Term Sheet क्या है और इसकी जरूरी शर्तें, ESOP क्या है और Cash Flow Statement कैसे पढ़ें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1. फाउंडर्स के लिए सबसे अच्छी Liquidation Preference कौन सी है?
1x नॉन पार्टिसिपेटिंग शर्त को आमतौर पर सबसे संतुलित और फाउंडर फ्रेंडली माना जाता है।
2. क्या Liquidation Preference शर्त सिर्फ कंपनी बंद होने पर लागू होती है?
नहीं, नाम के बावजूद यह कंपनी बिकने, मर्जर या कंट्रोल बदलने जैसी स्थितियों में भी लागू होती है। IPO के समय आमतौर पर प्रेफरेंस शेयर्स सामान्य शेयर्स में बदल जाते हैं।
3. क्या कर्मचारियों के ESOP पर Liquidation Preference का असर पड़ता है?
हां, कर्मचारियों के ESOP सामान्य शेयर्स में बदलते हैं, इसलिए निवेशकों को पहले भुगतान होने के बाद ही उन्हें हिस्सा मिलता है।
4. Liquidation Preference शर्त के उदाहरण और विस्तार से कहां पढ़ें?
इसके और उदाहरण Investopedia पर आसान अंग्रेजी में मिल जाते हैं।
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उपरोक्त जानकारी गूगल और विभिन्न वेबसाइट/समाचार माध्यमों से ली गई है। सटीकता की गारंटी नहीं है।

