
Term Sheet एक छोटा दस्तावेज होता है, जिसमें निवेशक और स्टार्टअप के फाउंडर्स के बीच निवेश की मुख्य शर्तें लिखी जाती हैं। इसमें तय होता है कि निवेशक कितना पैसा देगा, बदले में कंपनी की कितनी हिस्सेदारी लेगा और उसे कौन से अधिकार मिलेंगे।
किसी भी फाउंडर के लिए निवेशक से “हां” सुनना बहुत खुशी का पल होता है। लेकिन जोश में कई फाउंडर्स बिना पढ़े ऐसी शर्तों पर सहमति दे देते हैं, जो बाद में उनकी अपनी कंपनी पर उनका कंट्रोल कम कर देती हैं।
इसलिए पैसा आने से पहले Term Sheet की हर लाइन समझना जरूरी है। आइए आसान भाषा में जानते हैं कि इसमें क्या होता है और किन बातों पर सबसे ज्यादा ध्यान देना चाहिए।
क्या यह कानूनी रूप से बाध्य होता है?
ज्यादातर मामलों में यह दस्तावेज कानूनी रूप से पूरी तरह बाध्य नहीं होता। इसे एक तरह का समझौते का खाका माना जाता है, जिसके आधार पर बाद में असली कानूनी एग्रीमेंट बनते हैं।
हालांकि Term Sheet की कुछ शर्तें बाध्य होती हैं, जैसे गोपनीयता और एक्सक्लूसिविटी। एक्सक्लूसिविटी का मतलब है कि तय समय तक फाउंडर किसी दूसरे निवेशक से बातचीत नहीं कर सकता।
Term Sheet में कौन सी मुख्य शर्तें होती हैं?
सबसे पहली और अहम शर्त है वैल्यूएशन, यानी निवेश से पहले कंपनी की कीमत कितनी मानी गई। इसे प्री मनी वैल्यूएशन कहा जाता है।
मान लीजिए कंपनी की प्री मनी वैल्यूएशन 8 करोड़ रुपये है और निवेशक 2 करोड़ लगाता है। तब पोस्ट मनी वैल्यूएशन 10 करोड़ होगी और निवेशक को कंपनी की 20 प्रतिशत हिस्सेदारी मिलेगी।
भारत में निवेशक अक्सर सीधे शेयर की जगह कंपल्सरी कन्वर्टिबल प्रेफरेंस शेयर यानी CCPS लेते हैं। ये बाद में तय शर्तों के हिसाब से सामान्य शेयर में बदल जाते हैं।
लिक्विडेशन प्रेफरेंस: सबसे ज्यादा अनदेखी शर्त
यह शर्त तय करती है कि कंपनी बिकने या बंद होने पर पैसा पहले किसे मिलेगा। आमतौर पर निवेशक को पहले अपना लगाया पैसा वापस मिलता है, उसके बाद बची रकम बाकी शेयरधारकों में बंटती है।
1x नॉन पार्टिसिपेटिंग प्रेफरेंस को फाउंडर्स के लिए सबसे संतुलित माना जाता है। अगर Term Sheet में 2x या पार्टिसिपेटिंग प्रेफरेंस लिखा है, तो कम कीमत पर कंपनी बिकने की स्थिति में फाउंडर्स के हाथ बहुत कम पैसा आ सकता है।
कंट्रोल से जुड़ी शर्तें भी समझें
निवेशक अक्सर बोर्ड में एक या ज्यादा सीट मांगते हैं। इसके साथ कुछ बड़े फैसलों पर वीटो का अधिकार भी मांगा जाता है, जैसे नया फंड जुटाना, कंपनी बेचना या बड़ा कर्ज लेना।
एंटी डाइल्यूशन शर्त निवेशक को तब बचाती है, जब अगला फंडिंग राउंड कम वैल्यूएशन पर हो। “फुल रैचेट” वाली शर्त फाउंडर्स के लिए काफी सख्त होती है, जबकि “वेटेड एवरेज” ज्यादा संतुलित मानी जाती है।
फाउंडर्स के शेयरों पर वेस्टिंग भी लगाई जा सकती है, यानी पूरी हिस्सेदारी कुछ सालों में धीरे धीरे पक्की होती है। इसका मकसद यह पक्का करना है कि फाउंडर लंबे समय तक कंपनी के साथ बने रहें।
ESOP पूल और एग्जिट की शर्तें
कई निवेशक कर्मचारियों के लिए ESOP पूल को निवेश से पहले ही बनाने की शर्त Term Sheet में रखते हैं। इससे फाउंडर्स की हिस्सेदारी निवेशक की तुलना में ज्यादा घटती है, इसलिए इस पर बातचीत जरूर करें।
टैग अलॉन्ग शर्त छोटे शेयरधारकों को बड़े शेयरधारक के साथ अपने शेयर बेचने का हक देती है। वहीं ड्रैग अलॉन्ग शर्त में बहुमत वाले शेयरधारक बाकी लोगों को भी बिक्री में शामिल होने के लिए कह सकते हैं।
साइन करने से पहले क्या करें?
किसी अनुभवी स्टार्टअप वकील से Term Sheet की हर शर्त जरूर पढ़वाएं। वकील की फीस छोटी लगती है, लेकिन एक गलत शर्त आगे चलकर करोड़ों का नुकसान करा सकती है।
सिर्फ ज्यादा वैल्यूएशन देखकर फैसला न करें। कई बार थोड़ी कम वैल्यूएशन के साथ आसान शर्तें, ज्यादा वैल्यूएशन और सख्त शर्तों से बेहतर सौदा साबित होती हैं।
Term Sheet साइन होने के बाद निवेशक कंपनी की ड्यू डिलिजेंस करता है, यानी कागजात, अकाउंट और कानूनी स्थिति की जांच। इसके बाद ही शेयरहोल्डर्स एग्रीमेंट जैसे अंतिम दस्तावेज बनते हैं और पैसा कंपनी के खाते में आता है।
स्टार्टअप और बिजनेस फाइनेंस से जुड़ी और जानकारी
बिना निवेशक के कंपनी आगे बढ़ाने के बारे में जानने के लिए Bootstrapping की पूरी जानकारी पढ़ें। निवेशकों के सामने अपना बिजनेस आइडिया साफ रखने के लिए Business Model Canvas देखें। फंडिंग से पहले ग्राहक लाने के खर्च को समझने के लिए Customer Acquisition Cost की जानकारी भी जरूर पढ़ें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
1. Term Sheet मिलने का मतलब क्या पक्का निवेश है?
नहीं, यह सिर्फ निवेश की दिशा में एक बड़ा कदम है। ड्यू डिलिजेंस में कोई बड़ी कमी मिलने पर निवेशक पीछे भी हट सकता है।
2. क्या इसकी शर्तों पर मोलभाव किया जा सकता है?
हां, लगभग हर शर्त पर बातचीत की जा सकती है। अच्छे निवेशक भी उम्मीद करते हैं कि फाउंडर शर्तों को समझकर सवाल पूछे।
3. पूरी प्रक्रिया में कितना समय लगता है?
साइन होने के बाद ड्यू डिलिजेंस और अंतिम एग्रीमेंट में आमतौर पर कुछ हफ्तों से लेकर दो से तीन महीने तक लग सकते हैं।
4. इस विषय पर विस्तार से कहां पढ़ें?
निवेश दस्तावेजों और उनकी शर्तों के बारे में विस्तृत जानकारी यहां पढ़ सकते हैं।
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