Working Capital वह पैसा है, जिससे कोई बिजनेस अपना रोजमर्रा का काम चलाता है, जैसे माल खरीदना, सैलरी देना, किराया और बिजली का बिल भरना। आसान भाषा में इसे बिजनेस की “चालू पूंजी” कहा जाता है।
कई दुकानदार और कारोबारी साल के आखिर में मुनाफा दिखाते हैं, फिर भी महीने के बीच में उनके पास सप्लायर को देने के लिए पैसा नहीं होता। ग्राहकों के पास उधारी फंसी रहती है और गोदाम में माल भरा पड़ा रहता है।
यही वह स्थिति है, जहां Working Capital की सही समझ काम आती है। आइए जानते हैं कि इसे कैसे निकालें और सही तरीके से कैसे संभालें।
चालू संपत्ति और चालू देनदारी क्या होती है?
चालू संपत्ति यानी करंट एसेट्स वे चीजें हैं, जो एक साल के अंदर नकद पैसे में बदल सकती हैं। इसमें हाथ का कैश, बैंक बैलेंस, गोदाम का स्टॉक और ग्राहकों से आने वाली उधारी शामिल होती है।
चालू देनदारी यानी करंट लायबिलिटीज वे भुगतान हैं, जो एक साल के अंदर करने हैं। जैसे सप्लायर का बकाया, छोटी अवधि का लोन, बकाया सैलरी और जमा करना बाकी टैक्स।
इन्हीं दोनों के अंतर से किसी कारोबार की Working Capital तय होती है।
Working Capital कैसे निकालें?
इसका फॉर्मूला बहुत सीधा है: चालू संपत्ति में से चालू देनदारी घटा दीजिए। जो रकम बचती है, वही आपकी चालू पूंजी है।
मान लीजिए एक कपड़ा व्यापारी के पास 5 लाख का स्टॉक, ग्राहकों पर 3 लाख की उधारी और 2 लाख रुपये नकद हैं। यानी उसकी कुल चालू संपत्ति 10 लाख रुपये है।
वहीं उसे सप्लायर्स को 4 लाख और बैंक की छोटी किस्तों के 2 लाख चुकाने हैं, यानी कुल देनदारी 6 लाख है। इस हिसाब से उसकी चालू पूंजी 4 लाख रुपये हुई।
करंट रेशियो से समझें बिजनेस की सेहत
चालू संपत्ति को चालू देनदारी से भाग देने पर करंट रेशियो मिलता है। ऊपर वाले उदाहरण में यह 10 को 6 से भाग देने पर करीब 1.67 आता है।
आमतौर पर 1.2 से 2 के बीच का अनुपात ठीक माना जाता है, हालांकि यह हर इंडस्ट्री में अलग हो सकता है। 1 से कम अनुपात का मतलब है कि बिजनेस अपने छोटे भुगतान भी आसानी से नहीं कर पाएगा।
यानी करंट रेशियो बताता है कि आपकी Working Capital कितनी सुरक्षित है। हालांकि बहुत ज्यादा अनुपात भी हमेशा अच्छा नहीं होता। इसका मतलब हो सकता है कि बहुत सारा पैसा बेकार पड़े स्टॉक या फंसी उधारी में अटका है।
वर्किंग कैपिटल साइकिल क्या है?
माल खरीदने से लेकर उसे बेचकर ग्राहक से पैसा वसूलने तक जितने दिन लगते हैं, उसे वर्किंग कैपिटल साइकिल कहते हैं।
यह चक्र जितना छोटा होगा, उतनी कम Working Capital में बिजनेस चल जाएगा। यही वजह है कि नकद बिक्री वाले किराना स्टोर कम पूंजी में चल जाते हैं, जबकि लंबी उधारी वाले मैन्युफैक्चरिंग बिजनेस को ज्यादा पैसे की जरूरत पड़ती है।
चालू पूंजी को बेहतर कैसे बनाएं?
सबसे पहले ग्राहकों से उधारी की वसूली तेज करें और समय पर भुगतान करने वालों को छोटी छूट देने पर विचार करें। बड़े ग्राहकों के बिल के बदले इनवॉइस डिस्काउंटिंग से भी जल्दी पैसा मिल सकता है।
स्टॉक उतना ही रखें, जितना जल्दी बिक सके। सप्लायर्स से बात करके भुगतान की अवधि थोड़ी बढ़वाना भी Working Capital को मजबूत करने का अच्छा तरीका है।
जरूरत पड़ने पर बैंक से कैश क्रेडिट या ओवरड्राफ्ट जैसी वर्किंग कैपिटल लोन सुविधा ली जा सकती है। लेकिन इसे रोज के खर्च के लिए नहीं, बल्कि कमी के समय सहारे की तरह इस्तेमाल करें।
छोटे कारोबारी अक्सर कौन सी गलतियां करते हैं?
सबसे आम गलती है बिजनेस और घर का पैसा एक ही खाते में रखना। इससे पता ही नहीं चलता कि दुकान के पास असल में कितनी नकदी है।
दूसरी बड़ी गलती है चालू पूंजी से नई मशीन, गाड़ी या दुकान का फर्नीचर खरीद लेना। ऐसे लंबे समय के खर्च के लिए अलग से टर्म लोन या बचत का इस्तेमाल करना चाहिए।
कई लोग बिक्री बढ़ाने के चक्कर में हर ग्राहक को लंबी उधारी दे देते हैं। बिक्री तो बढ़ती है, लेकिन पैसा बाजार में फंस जाता है और सप्लायर का भुगतान अटकने लगता है।
त्योहारों से पहले जरूरत से ज्यादा स्टॉक भर लेना भी नुकसान करता है। इसलिए हर महीने एक बार अपनी Working Capital का हिसाब जरूर देखें, ताकि परेशानी आने से पहले ही संभल सकें।
बिजनेस फाइनेंस से जुड़ी और जानकारी
बिजनेस में असली मुनाफा कब शुरू होगा, यह जानने के लिए Break-Even Point की पूरी गाइड पढ़ें। बिजनेस की प्रगति मापने के जरूरी आंकड़ों के लिए Business KPI क्या है देखें। नया ग्राहक लाने के खर्च को समझने के लिए Customer Acquisition Cost की जानकारी भी जरूर पढ़ें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
1. क्या Working Capital नेगेटिव भी हो सकता है?
हां, जब चालू देनदारी चालू संपत्ति से ज्यादा हो जाए। ज्यादातर बिजनेस के लिए यह खतरे का संकेत है, हालांकि कुछ नकद बिक्री वाले बड़े रिटेल बिजनेस सोच समझकर ऐसे चलते हैं।
2. मुनाफा होने के बाद भी पैसे की कमी क्यों होती है?
क्योंकि मुनाफा कागज पर दिखता है, जबकि पैसा उधारी और स्टॉक में फंसा रह सकता है। इसलिए मुनाफे के साथ Working Capital का हिसाब भी देखना जरूरी है।
3. वर्किंग कैपिटल लोन किसे मिलता है?
चालू बिजनेस, दुकानदार और MSME इसके लिए बैंक या एनबीएफसी में आवेदन कर सकते हैं। लोन की रकम आमतौर पर बिजनेस के टर्नओवर, स्टॉक और उधारी के आधार पर तय होती है।
4. इस विषय पर विस्तार से कहां पढ़ें?
चालू पूंजी और इसके हिसाब के बारे में विस्तृत जानकारी यहां पढ़ सकते हैं।
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