दिल्ली हाईकोर्ट ने कामकाजी महिलाओं के अधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि मातृत्व अवकाश किसी महिला के पेशेवर जीवन में नुकसान, पदावनति या करियर की संभावनाएं खत्म करने का आधार नहीं बन सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि मातृत्व से जुड़ी कानूनी सुरक्षा केवल नौकरी बचाए रखने तक सीमित नहीं है, बल्कि महिला कर्मचारी को अवकाश के बाद उसके पहले वाले पद, दर्जे, जिम्मेदारियों और पेशेवर अवसरों के साथ वापस लौटने का अधिकार भी देती है।
यह फैसला न्यायमूर्ति सचिन दत्ता की पीठ ने 31 अगस्त 2026 को सुनाया। मामला चार्टर्ड अकाउंटेंट राखी बिष्ट की याचिका से जुड़ा था। अदालत ने नियोक्ता को उन्हें 10 लाख रुपये का मुआवजा और 1.5 लाख रुपये मुकदमे के खर्च के रूप में देने का निर्देश दिया।
मातृत्व अवकाश से लौटने पर बदली गई भूमिका
मामले की याचिकाकर्ता राखी बिष्ट एक चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं। उन्होंने करीब 14 वर्षों का पेशेवर अनुभव हासिल करने के बाद 2022 में सॉफ्टवेयर कंपनी HashiCorp में अकाउंटिंग मैनेजर के रूप में काम शुरू किया था। उस समय उनका मासिक वेतन करीब 2.6 लाख रुपये बताया गया था।
बिष्ट मातृत्व अवकाश पर गईं और जुलाई 2024 में काम पर वापस लौटीं। लेकिन लौटने के बाद उन्हें पता चला कि उनकी पहले वाली भूमिका और जिम्मेदारियां बदल दी गई हैं। उनका प्रबंधकीय काम और टीम उनके पास नहीं रही तथा उन्हें अपेक्षाकृत कम स्तर की जिम्मेदारियां दी गईं। रिपोर्टों के अनुसार, उन्हें ट्रेजरी से जुड़ा ऐसा काम सौंपा गया, जिसे उन्होंने अपनी योग्यता और पूर्व पद के मुकाबले काफी निम्न स्तर का माना।
बिष्ट ने इस बदलाव को अपने मातृत्व अवकाश के बाद हुए पेशेवर भेदभाव के रूप में चुनौती दी। उनका तर्क था कि मातृत्व अवकाश लेने के कारण उनके करियर और पद को नुकसान नहीं पहुंचाया जा सकता।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि मातृत्व संरक्षण का अर्थ केवल यह नहीं है कि महिला की नौकरी औपचारिक रूप से बनी रहे। कानून का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना भी है कि मातृत्व के कारण महिला को पेशेवर रूप से पीछे न धकेला जाए।
अदालत ने माना कि मातृत्व अवकाश से लौटने वाली महिला को सामान्य परिस्थितियों में उसी पद पर वापस आने का अधिकार है, जिस पर वह अवकाश से पहले काम कर रही थी। यदि किसी वास्तविक प्रशासनिक या संगठनात्मक कारण से वही पद उपलब्ध न हो तो उसे समकक्ष पद दिया जाना चाहिए, लेकिन उसके दर्जे, जिम्मेदारियों, वेतन या करियर की संभावनाओं में मातृत्व के कारण प्रतिकूल बदलाव नहीं किया जा सकता।
अदालत ने इस मामले में यह भी रेखांकित किया कि महिला की रिपोर्टिंग व्यवस्था, निगरानी संबंधी जिम्मेदारियां और प्रदर्शन मूल्यांकन या पदोन्नति की संभावनाएं भी उसके पेशेवर दर्जे का हिस्सा हैं।
मुआवजे का भी आदेश
अदालत ने नियोक्ता को याचिकाकर्ता को 10 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया। इसके अलावा 1.5 लाख रुपये मुकदमे के खर्च के रूप में देने को कहा गया।
यह आर्थिक राहत केवल व्यक्तिगत विवाद के समाधान के तौर पर महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि कार्यस्थलों के लिए एक स्पष्ट संदेश के रूप में भी देखी जा रही है। अदालत ने संकेत दिया है कि किसी महिला के मातृत्व अवकाश को उसके पेशेवर दर्जे या भविष्य की प्रगति के खिलाफ इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
केंद्र सरकार को छह महीने में नियम बनाने का निर्देश
फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि अदालत ने केंद्र सरकार को छह महीने के भीतर नियम या योजना तैयार करने का निर्देश दिया है, ताकि मातृत्व अवकाश के बाद महिलाओं के अधिकारों की प्रभावी सुरक्षा हो सके।
प्रस्तावित व्यवस्था में कार्यस्थल पर गर्भावस्था से जुड़ी सुविधाएं, मातृत्व के बाद भूमिका और पद की सुरक्षा, स्तनपान के लिए आवश्यक सहयोग, क्रेच जैसी सुविधाएं तथा शिकायतों के निपटारे की प्रभावी व्यवस्था जैसे पहलुओं को शामिल किए जाने की बात सामने आई है।
इससे संकेत मिलता है कि अदालत केवल किसी एक कर्मचारी के विवाद तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि मातृत्व के बाद महिलाओं के रोजगार और करियर संरक्षण के लिए व्यापक संस्थागत व्यवस्था की जरूरत पर जोर दे रही है।
संविधान और समानता का सवाल
मामला केवल रोजगार संबंधी नियमों की व्याख्या तक सीमित नहीं है। अदालत का दृष्टिकोण भारतीय संविधान में निहित समानता और गरिमा के सिद्धांतों से भी जुड़ा है। संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 समानता तथा भेदभाव से सुरक्षा की गारंटी देते हैं, जबकि अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से जुड़ा है। अनुच्छेद 42 राज्य को काम की न्यायसंगत और मानवीय परिस्थितियां तथा मातृत्व राहत सुनिश्चित करने की दिशा देता है।
अदालत के इस फैसले का मूल संदेश यही है कि महिला को मां बनने के कारण अपने पेशेवर जीवन में ऐसी कीमत नहीं चुकानी चाहिए, जो पुरुष कर्मचारियों पर लागू नहीं होती।
कामकाजी महिलाओं के लिए क्यों महत्वपूर्ण है फैसला?
भारत में बड़ी संख्या में महिलाएं निजी कंपनियों, सरकारी संस्थानों, शिक्षा, चिकित्सा, कानून, वित्त और अन्य पेशेवर क्षेत्रों में काम कर रही हैं। मातृत्व के बाद नौकरी पर लौटना उनके लिए कई बार चुनौतीपूर्ण होता है। जिम्मेदारियों में बदलाव, टीम से अलग किया जाना, पदोन्नति में देरी या महत्वपूर्ण परियोजनाओं से हटाया जाना उनके करियर पर दीर्घकालिक असर डाल सकता है।
ऐसे में हाईकोर्ट का यह फैसला इस बात को मजबूत करता है कि मातृत्व अवकाश को महिला की पेशेवर प्रतिबद्धता या क्षमता के खिलाफ नहीं देखा जाना चाहिए।
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व्यापक प्रभाव की उम्मीद
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, फैसले का प्रभाव उन संस्थानों पर पड़ सकता है जहां मातृत्व अवकाश से लौटने वाली कर्मचारियों की भूमिका बदलने या उन्हें कम महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां देने की प्रवृत्ति रही है। नियोक्ताओं के लिए अब यह जरूरी होगा कि किसी महिला की भूमिका में बदलाव करते समय यह सुनिश्चित करें कि बदलाव का वास्तविक कारण संगठनात्मक हो और वह मातृत्व या गर्भावस्था से जुड़ा भेदभाव न हो।
यह फैसला कार्यस्थल पर लैंगिक समानता और महिलाओं की दीर्घकालिक भागीदारी को बढ़ावा देने की दिशा में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
निष्कर्ष
दिल्ली हाईकोर्ट का यह फैसला कामकाजी महिलाओं के अधिकारों की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने साफ किया है कि मातृत्व अवकाश किसी महिला की नौकरी, पद, जिम्मेदारियों, पेशेवर प्रतिष्ठा या करियर की संभावनाओं को नुकसान पहुंचाने का आधार नहीं बन सकता।
राखी बिष्ट के मामले में 10 लाख रुपये मुआवजा और 1.5 लाख रुपये कानूनी खर्च का आदेश देने के साथ अदालत ने केंद्र सरकार को छह महीने में व्यापक नियम या योजना तैयार करने का निर्देश भी दिया है।
फैसले का व्यापक संदेश स्पष्ट है—मातृत्व महिला के पेशेवर जीवन में बाधा नहीं, बल्कि उसके जीवन का एक महत्वपूर्ण चरण है। इसके लिए उसे अपने करियर और पेशेवर सम्मान की कीमत नहीं चुकानी चाहिए।

