चीन के तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र में गुरुवार को 5.1 तीव्रता का भूकंप आया। यह भूकंपीय झटका ऐसे समय आया है जब तिब्बत और नेपाल की सीमा से लगे हिमालयी इलाकों में कुछ दिन पहले आई विनाशकारी बाढ़ के बाद बड़े पैमाने पर राहत और बचाव अभियान चल रहा है। जर्मन रिसर्च सेंटर फॉर जियोसाइंसेज (GFZ) के मुताबिक भूकंप की तीव्रता 5.1 थी और इसका केंद्र जमीन के करीब 10 किलोमीटर की गहराई में था।
भूकंप के कारण पहले से आपदा से जूझ रहे इलाके में सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई है। बाढ़ के कारण सड़कें, पुल और दूसरी बुनियादी सुविधाएं क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं। कई इलाकों में मलबा और अस्थिर पहाड़ी ढलान राहत कार्यों को पहले ही मुश्किल बना रहे हैं। ऐसे में भूकंप के झटके बचाव दलों के लिए अतिरिक्त जोखिम पैदा कर सकते हैं।
तिब्बत में बाढ़ के जख्म अभी ताजा
तिब्बत में आया यह भूकंप उस विनाशकारी बाढ़ के कुछ ही दिनों बाद आया है, जिसने चीन-नेपाल सीमा के आसपास बड़े पैमाने पर तबाही मचाई। 26 अगस्त को हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर या बर्फ-मलबे के ढहने से अचानक पानी और मलबे का जबरदस्त प्रवाह पैदा हुआ था। इसका सबसे गंभीर असर नेपाल के कई हिस्सों और चीन के तिब्बत क्षेत्र में देखने को मिला।
चीन की ओर से उपलब्ध ताजा आंकड़ों के मुताबिक तिब्बत में बाढ़ से 21 लोगों की मौत हुई है, जबकि 541 लोग अब भी लापता हैं। लापता लोगों में विदेशी नागरिक और तीर्थयात्री भी शामिल बताए गए हैं। नेपाल की तरफ तबाही का पैमाना इससे कहीं बड़ा है और वहां मृतकों तथा लापता लोगों की संख्या लगातार बढ़ती रही है।
इस आपदा के कारण सीमावर्ती इलाकों में संपर्क व्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई। कई सड़कें और पुल क्षतिग्रस्त होने से राहत सामग्री पहुंचाना और प्रभावित लोगों तक बचाव दलों का पहुंचना चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।
भूकंप ने बढ़ाई राहत अभियान की मुश्किलें
बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में बचाव अभियान पहले ही कठिन परिस्थितियों में चल रहा है। लगातार बारिश, ऊंचे पहाड़ी इलाके, मलबे से भरे रास्ते और अस्थिर ढलानों के कारण बचावकर्मियों को काफी सावधानी बरतनी पड़ रही है। अब भूकंप के झटकों ने इन चुनौतियों को और बढ़ा दिया है।
विशेषज्ञों के अनुसार, भूकंप के बाद पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन और चट्टानों के खिसकने का जोखिम बढ़ सकता है। खासकर वे ढलान जो पहले ही भारी बारिश और बाढ़ के कारण कमजोर हो चुके हैं, वहां अतिरिक्त कंपन खतरनाक साबित हो सकता है।
हालांकि, उपलब्ध शुरुआती रिपोर्टों में इस 5.1 तीव्रता के भूकंप से बड़े पैमाने पर नए नुकसान या जनहानि की पुष्टि नहीं हुई है। अधिकारियों और आपदा प्रबंधन एजेंसियों की ओर से स्थिति पर नजर रखी जा रही है।
भूकंप का केंद्र भारत और नेपाल के करीब
GFZ के अनुसार भूकंप करीब 10 किलोमीटर की गहराई में आया। इसका स्थान तिब्बत के उस हिमालयी क्षेत्र में बताया गया है जो नेपाल और भारत की सीमाओं के अपेक्षाकृत करीब है। हिमालय दुनिया के सबसे सक्रिय भूकंपीय क्षेत्रों में शामिल है, क्योंकि यहां भारतीय और यूरेशियाई टेक्टोनिक प्लेटों के बीच लगातार भूगर्भीय गतिविधियां होती रहती हैं।
इसी कारण हिमालयी क्षेत्र में भूकंप और भूस्खलन का खतरा हमेशा बना रहता है। जब किसी इलाके में पहले से भारी बारिश, बाढ़ या ग्लेशियर से जुड़ी आपदा हो चुकी हो, तब भूकंपीय गतिविधि राहत एवं पुनर्निर्माण कार्यों को और जटिल बना सकती है।
नेपाल में भी जारी है बड़ा राहत अभियान
तिब्बत में भूकंप की खबर ऐसे वक्त आई है जब पड़ोसी नेपाल में विनाशकारी बाढ़ से निपटने के लिए बड़े स्तर पर अभियान जारी है। नेपाल में हजारों लोग मारे गए हैं और हजारों अन्य लापता हैं। कई लोगों के हाइड्रोपावर परियोजनाओं की सुरंगों और भूमिगत सुविधाओं में फंसे होने की आशंका जताई गई है।
नेपाल में भारतीय, चीनी और अमेरिकी दलों सहित कई अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां राहत एवं बचाव में सहायता कर रही हैं। प्रभावित क्षेत्रों में संचार और सड़क व्यवस्था बहाल करना भी प्राथमिकता बनी हुई है।
नेपाल और तिब्बत दोनों तरफ राहत दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि आपदा से प्रभावित पहाड़ी क्षेत्रों में पहुंचना बेहद कठिन है। कई जगहों पर सड़कें पूरी तरह बह गई हैं और नदियों का जलस्तर अभी भी चिंता का विषय बना हुआ है।
ग्लेशियर और जलवायु परिवर्तन पर भी सवाल
इस आपदा ने हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों और बदलते मौसम को लेकर वैज्ञानिक चिंता को भी सामने ला दिया है। हालिया बाढ़ के पीछे ग्लेशियर या बर्फ-मलबे के अचानक ढहने को प्रमुख कारणों में माना जा रहा है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि बढ़ते तापमान से हिमालयी ग्लेशियरों और बर्फीली संरचनाओं की स्थिरता प्रभावित हो सकती है।
हालांकि किसी एक आपदा को सीधे तौर पर जलवायु परिवर्तन का परिणाम घोषित करना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा। लेकिन हिमालय में तेजी से बदलती जलवायु, ग्लेशियरों के पीछे हटने और चरम मौसम की घटनाओं को लेकर वैज्ञानिकों की चिंता लगातार बढ़ रही है।
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राहत कार्यों पर टिकी निगाहें
तिब्बत में आए भूकंप के बाद फिलहाल सबसे जरूरी काम प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा का आकलन करना है। बचाव दलों को उन इलाकों में अतिरिक्त सावधानी बरतनी होगी जहां बाढ़ के कारण जमीन और पहाड़ी ढलान कमजोर हो चुके हैं।
साथ ही, प्रशासन के सामने लापता लोगों की तलाश जारी रखने, प्रभावित परिवारों तक सहायता पहुंचाने और क्षतिग्रस्त संपर्क मार्गों को बहाल करने की चुनौती बनी हुई है।
निष्कर्ष
तिब्बत में आया 5.1 तीव्रता का भूकंप हिमालयी क्षेत्र में चल रहे राहत अभियान के बीच एक नई चुनौती बनकर सामने आया है।
कुछ ही दिन पहले आई विनाशकारी बाढ़ ने चीन के तिब्बत क्षेत्र में 21 लोगों की जान ली और 541 लोगों को लापता कर दिया था। नेपाल में इस आपदा का असर और भी व्यापक रहा है, जहां मृतकों और लापता लोगों की संख्या हजारों में पहुंच चुकी है।
भूकंप से फिलहाल बड़े नए नुकसान की पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन पहले से कमजोर हो चुके पहाड़ी इलाकों में भूस्खलन और मलबा गिरने का खतरा चिंता का विषय बना हुआ है। ऐसे में तिब्बत और नेपाल दोनों में राहत एवं बचाव दलों के लिए अगले कुछ दिन बेहद महत्वपूर्ण होंगे। साथ ही, यह आपदा हिमालयी क्षेत्र में आपदा पूर्व चेतावनी प्रणाली, सीमापार सहयोग और बदलती जलवायु के बीच बढ़ते प्राकृतिक जोखिमों पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत को भी रेखांकित करती है।

