ऑपरेशन मेघदूत में लापता अल्मोड़ा के लांसनायक चंद्रशेखर का शव 38 साल बाद मिला

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देहरादून/हल्द्वानी, ब्यूरो। आजादी के अमृत महोत्सव से 2 दिन पहले देवभूमि उत्तराखंड के अल्मोड़ा निवासी लांसनायक चंद्रशेखर हर्बोला का पार्थिव शरीर सीमांत और दुनिया की सबसे ऊंची सियाचिन बॉर्डर से मिला है। 38 साल पहले भारत-पाकिस्तान के लिए सियाचिन बाॅर्डर को लेकर हुए संग्राम के ऑपरेशन मेघदूत में लांसनायक चंद्रशेखर के साथ ही करीब 18 जवान लापता हो गए थे। इसके बाद सेना ने उन्हें शहीद घोषित कर दिया था, लेकिन उनके पार्थिव शरीर का कोई पता नहीं चल पाया था।

इंतजार करते-करते पथरा गई थीं पत्नी और बच्चों की आंखें

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दो दिन पहले शनिवार देर सायं उनकी पत्नी शांति देवी को सेना की ओर से सूचना मिली कि उनके पति का पार्थिव शरीर सियाचिन बॉर्डर पर मिला है। सियाचिन बॉर्डर पर तापमान -40 से -50 तक रहता है और यहां पर बिना संसाधनों के कोई आम व्यक्ति पलभर के लिए भी जीवित नहीं रह सकता। उनकी पत्नी के अनुसार सेना से उन्हें जानकारी मिली कि शहीद चंद्रशेखर का पार्थिव शरीर अभी भी सुरक्षित है और सेना के लोहे के ब्रेसलेट से उनकी पहचान हुई है। दरअसल, सेना के इस ब्रेसलेट में उनका बैच नंबर भी था जिससे उनकी पहचान की गई।

इंतजार करते-करते पथरा गई थीं आंखें, 38 साल बाद मिला लांसनायक का शव

शांति देवी और उनके बच्चों की पथराई आंखें हर बार यही इंतजार करते थे कि आज नहीं तो कल उनसे संबंधित कोई खबर आएगी। उनकी बड़ी बेटी भी अब 34 साल की हो गई है। जब पिता अंतिम बार उनसे मिले थे तो वह 4 साल की थी। कल मंगलवार को उनके पार्थिव शरीर के उत्तराखंड पहुंचने की उम्मीद लगाई जा रही है। उनकी पत्नी और बेटी के अनुसार कितने साल इंतजार करने के बाद अब पिता तो नहीं पर लेकिन उनके पार्थिव शरीर को हिंदू रीति रिवाज से अंतिम संस्कार करेंगे। इससे उनकी आत्मा को शांति मिलेगी। एसडीएम हल्द्वानी मनीष कुमार और तहसीलदार संजय कुमार के अनुसार 1 दिन बाद शहीद चंद्रशेखर का पार्थिव शरीर हल्द्वानी पहुंचने की उम्मीद है। सैनिक सम्मान के साथ शहीद चंद्रशेखर का अंतिम संस्कार किया जाएगा।

बता दें कि 1975 में अल्मोड़ा की हाथी गुर बिंता द्वाराहाट अल्मोड़ा निवासी चंद्रशेखर हर्बोला कुमाऊं रेजिमेंट में भर्ती हुए थे। इसके बाद 1984 में भारत और पाकिस्तान के बीच सियाचिन बॉर्डर के लिए हुए संग्राम के ऑपरेशन मेघदूत में चंद्रशेखर हर्बोला भी शामिल थे। मई 1984 में सियाचिन बॉर्डर पर पेट्रोलिंग के दौरान 20 सैनिक ग्लेशियर की चपेट में आ गए थे। इनमें से 15 जवानों की ही सब मिल पाए थे। लापता सैनिकों में चंद्रशेखर हर्बोला भी शामिल थे।