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क्या 60Hz से 120Hz पर जाने से सच में बदल जाता है फोन का अनुभव या यह सिर्फ मार्केटिंग का खेल है?

120Hz Display वाले फोन आजकल 15 हजार रुपये के बजट में भी आसानी से मिल जाते हैं, और कंपनियां इसे सबसे बड़े फीचर की तरह बेचती हैं। लेकिन क्या 60Hz से 120Hz पर जाने से सच में मोबाइल चलाने का अनुभव बदल जाता है, या यह सिर्फ मार्केटिंग का एक नंबर है? इस लेख में आसान भाषा में समझिए कि रिफ्रेश रेट क्या होता है, इसका फायदा कहां मिलता है और कहां नहीं।

रिफ्रेश रेट क्या होता है?

रिफ्रेश रेट का मतलब है कि फोन की स्क्रीन एक सेकंड में कितनी बार नई तस्वीर बनाती है। इसे हर्ट्ज (Hz) में मापा जाता है। 60Hz स्क्रीन एक सेकंड में 60 बार और 120Hz स्क्रीन 120 बार तस्वीर बदलती है।

यानी 60Hz पर हर फ्रेम करीब 16.7 मिलीसेकंड तक दिखता है, जबकि 120Hz पर सिर्फ 8.3 मिलीसेकंड तक। जितनी जल्दी नया फ्रेम आता है, स्क्रीन पर चलती चीजें उतनी ही स्मूद और साफ दिखती हैं।

120Hz Display से कहां महसूस होता है असली फर्क?

सबसे बड़ा फर्क स्क्रॉलिंग में दिखता है। सोशल मीडिया फीड, वेब पेज या कॉन्टैक्ट लिस्ट स्क्रॉल करते समय टेक्स्ट और फोटो धुंधले होने के बजाय ज्यादा साफ और मक्खन जैसे स्मूद चलते हैं। ऐप खोलने, बंद करने और एक स्क्रीन से दूसरी स्क्रीन पर जाने वाले एनिमेशन भी तेज और फुर्तीले लगते हैं, जिससे फोन खुद तेज महसूस होता है।

गेमिंग में भी फायदा मिलता है, बशर्ते गेम 90 या 120 फ्रेम प्रति सेकंड सपोर्ट करता हो। तेज रफ्तार वाले गेम में मूवमेंट ज्यादा साफ दिखता है और रिस्पॉन्स बेहतर लगता है। दिलचस्प बात यह है कि 120Hz Display की आदत लगने के बाद जब लोग वापस 60Hz फोन चलाते हैं, तो उन्हें स्क्रीन अटकती हुई लगती है।

कहां नहीं मिलता कोई फायदा?

वीडियो देखने में ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। ज्यादातर फिल्में 24 फ्रेम और YouTube वीडियो 30 या 60 फ्रेम प्रति सेकंड पर बनते हैं, इसलिए 120Hz Display स्क्रीन उन्हें और स्मूद नहीं बना सकती। बहुत से गेम भी 60 फ्रेम प्रति सेकंड पर ही लॉक होते हैं।

ई-बुक पढ़ने, फोटो देखने या कॉल करने जैसे कामों में भी रिफ्रेश रेट से कोई खास बदलाव नहीं आता। अगर फोन का प्रोसेसर कमजोर है, तो 120Hz स्क्रीन होने के बावजूद ऐप्स बीच बीच में अटक सकते हैं, क्योंकि प्रोसेसर उतने फ्रेम बना ही नहीं पाता।

बैटरी पर कितना पड़ता है असर?

स्क्रीन को दोगुनी बार रिफ्रेश करने में ज्यादा बिजली लगती है, इसलिए फिक्स्ड 120Hz Display पर बैटरी कुछ जल्दी खत्म हो सकती है। इसी समस्या से निपटने के लिए अब कई फोन में एडैप्टिव रिफ्रेश रेट या LTPO तकनीक आती है।

इसमें स्क्रॉल करते समय स्क्रीन 120Hz पर चलती है और स्थिर पेज पढ़ते समय अपने आप 60Hz, 30Hz या उससे भी नीचे आ जाती है। ऐसे फोन में बैटरी पर असर काफी कम हो जाता है, इसलिए खरीदते समय सिर्फ Hz नहीं, बल्कि एडैप्टिव फीचर भी देखें।

120Hz Display
120Hz Display

टच सैंपलिंग रेट से कन्फ्यूज न हों

कई कंपनियां 240Hz या 480Hz टच सैंपलिंग रेट का भी दावा करती हैं। यह स्क्रीन के रिफ्रेश रेट से अलग चीज है। टच सैंपलिंग रेट बताता है कि स्क्रीन एक सेकंड में कितनी बार आपकी उंगली के छूने को पढ़ती है। गेमिंग में इससे टच रिस्पॉन्स थोड़ा तेज होता है, लेकिन स्मूदनेस रिफ्रेश रेट से ही आती है।

क्या अपग्रेड करना चाहिए?

अगर आप दिनभर सोशल मीडिया स्क्रॉल करते हैं, गेम खेलते हैं या ब्राउजिंग ज्यादा करते हैं, तो 60Hz से 120Hz Display पर जाना सच में फायदेमंद लगेगा। आज के समय में नया फोन 60Hz स्क्रीन वाला लेना समझदारी नहीं है।

फोन में अगर यह फीचर है, तो Settings में Display के अंदर Refresh Rate या Smoothness विकल्प से इसे चालू या बंद कर सकते हैं। बैटरी बचानी हो तो एडैप्टिव मोड चुनें। डिस्प्ले से जुड़ी ये जानकारी भी पढ़ें: LTPO Display कैसे काम करता है?, Smartphone में PWM Dimming क्या है? और फोन में HDR10+ Display क्या होता है?

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

1. क्या 120Hz Display से फोन की बैटरी जल्दी खत्म होती है?

फिक्स्ड 120Hz पर बैटरी थोड़ी ज्यादा खर्च होती है, लेकिन एडैप्टिव या LTPO स्क्रीन वाले फोन में यह असर काफी कम होता है।

2. क्या 120Hz Display से वीडियो बेहतर दिखते हैं?

नहीं, ज्यादातर वीडियो 24 से 60 फ्रेम प्रति सेकंड पर बने होते हैं, इसलिए उनमें खास फर्क नहीं दिखता। फायदा स्क्रॉलिंग, एनिमेशन और गेमिंग में मिलता है।

3. 90Hz और 120Hz Display में ज्यादा अंतर है?

60Hz से 90Hz पर जाना सबसे ज्यादा महसूस होता है। 90Hz से 120Hz का फर्क भी दिखता है, लेकिन हर किसी को उतना साफ महसूस नहीं होता।

4. रिफ्रेश रेट की तकनीकी जानकारी कहां मिलेगी?

स्क्रीन रिफ्रेश रेट कैसे काम करता है, इसकी विस्तृत तकनीकी जानकारी Wikipedia पर पढ़ी जा सकती है।

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उपरोक्त जानकारी गूगल और विभिन्न वेबसाइट/समाचार माध्यमों से ली गई है। सटीकता की गारंटी नहीं है।

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