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Smartphone में PWM Dimming क्या है और Display में इसका क्या काम है?

PWM Dimming स्मार्टफोन की स्क्रीन की ब्राइटनेस कम करने की एक तकनीक है, जिसका असर सीधे आपकी आंखों पर पड़ सकता है। नया फोन खरीदते समय आपने इसके बारे में स्पेसिफिकेशन लिस्ट में जरूर पढ़ा होगा, लेकिन कम लोग जानते हैं कि यह असल में करती क्या है। अगर रात में फोन चलाते समय आपकी आंखें जल्दी थक जाती हैं या सिर भारी लगने लगता है, तो इसकी एक वजह यही तकनीक हो सकती है।

PWM का मतलब क्या है?

PWM का पूरा नाम पल्स विड्थ मॉड्यूलेशन है। इसमें स्क्रीन की रोशनी को लगातार कम करने के बजाय उसे बहुत तेजी से चालू और बंद किया जाता है। यह चालू बंद होने की प्रक्रिया एक सेकंड में सैकड़ों या हजारों बार होती है। हमारी आंखें इतनी तेज झपक को अलग से नहीं पकड़ पातीं, इसलिए हमें स्क्रीन बस थोड़ी धुंधली या कम चमकदार दिखती है।

Display में PWM Dimming का क्या काम है?

OLED और AMOLED स्क्रीन में हर पिक्सेल खुद रोशनी देता है। बहुत कम ब्राइटनेस पर इन पिक्सेल को धीमी बिजली देने से रंग बिगड़ने लगते हैं और स्क्रीन पर धब्बे जैसे दिख सकते हैं। इस समस्या से बचने के लिए कंपनियां पिक्सेल को पूरी ताकत पर जलाती हैं, लेकिन उन्हें बीच बीच में बंद कर देती हैं। स्क्रीन जितनी देर बंद रहती है, ब्राइटनेस उतनी ही कम महसूस होती है और रंग भी सही बने रहते हैं।

हर्ट्ज में मापी जाती है इसकी रफ्तार एक सेकंड में स्क्रीन कितनी बार चालू और बंद होती है, उसे PWM फ्रीक्वेंसी कहते हैं और इसे हर्ट्ज में मापा जाता है। पुराने कई फोन में यह 240 हर्ट्ज के आसपास होती थी। अब कई नए फोन 1920 हर्ट्ज, 2160 हर्ट्ज या इससे भी ज्यादा फ्रीक्वेंसी के साथ आ रहे हैं। आमतौर पर फ्रीक्वेंसी जितनी ज्यादा होती है, फ्लिकर उतना कम महसूस होता है और आंखों पर दबाव भी घटता है।

आंखों पर कैसे पड़ता है PWM Dimming का असर?

ज्यादातर लोगों को PWM से कोई परेशानी नहीं होती। लेकिन कुछ लोग इस झपक के प्रति ज्यादा संवेदनशील होते हैं, खासकर कम ब्राइटनेस पर देर तक फोन चलाने पर। ऐसे लोगों को आंखों में थकान, जलन, सिरदर्द या चक्कर जैसा महसूस हो सकता है। अंधेरे कमरे में ब्राइटनेस बहुत कम करके फोन चलाने पर यह असर अक्सर ज्यादा दिखता है।

DC Dimming क्या है और यह कैसे अलग है?

DC डिमिंग में स्क्रीन को चालू बंद करने के बजाय सीधे बिजली का प्रवाह कम किया जाता है। इससे झपक लगभग खत्म हो जाती है और संवेदनशील आंखों को आराम मिलता है। इसकी कमी यह है कि बहुत कम ब्राइटनेस पर रंग थोड़े फीके या असमान दिख सकते हैं। इसलिए कई कंपनियां दोनों तकनीकों को मिलाकर इस्तेमाल करती हैं और सेटिंग्स में एंटी फ्लिकर का विकल्प देती हैं।

अपने फोन में फ्लिकर कैसे जांचें?

किसी दूसरे फोन का कैमरा खोलें और स्लो मोशन वीडियो मोड चालू करें। अब अपने फोन की ब्राइटनेस कम करके उसकी स्क्रीन को रिकॉर्ड करें। अगर वीडियो में स्क्रीन पर काली पट्टियां ऊपर नीचे चलती दिखें, तो आपकी स्क्रीन कम फ्रीक्वेंसी वाली PWM पर चल रही है।

PWM Dimming
PWM Dimming

आंखों को आराम देने के आसान उपाय

अपने फोन की डिस्प्ले सेटिंग्स में एंटी फ्लिकर, आई कम्फर्ट या DC डिमिंग जैसा विकल्प हो तो उसे चालू करें। रात में ब्राइटनेस को बहुत ज्यादा कम करने के बजाय कमरे की हल्की रोशनी जलाकर फोन चलाएं। नया फोन खरीदते समय स्पेसिफिकेशन में PWM फ्रीक्वेंसी जरूर देखें। अगर आपकी आंखें संवेदनशील हैं, तो PWM Dimming की ज्यादा फ्रीक्वेंसी वाला फोन चुनना समझदारी होगी। लंबे समय तक आंखों में तकलीफ रहे तो किसी नेत्र विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

1. क्या PWM Dimming आंखों के लिए नुकसानदायक है?

ज्यादातर लोगों के लिए यह नुकसानदायक नहीं है। लेकिन फ्लिकर के प्रति संवेदनशील लोगों को कम फ्रीक्वेंसी वाली स्क्रीन से आंखों में थकान और सिरदर्द हो सकता है।

2. कितनी PWM फ्रीक्वेंसी अच्छी मानी जाती है?

आम तौर पर 1000 हर्ट्ज से ज्यादा फ्रीक्वेंसी को बेहतर माना जाता है। 2000 हर्ट्ज या उससे ऊपर की फ्रीक्वेंसी में फ्लिकर बहुत कम महसूस होता है।

3. क्या LCD स्क्रीन में भी PWM Dimming होता है?

ज्यादातर LCD स्क्रीन बैकलाइट की बिजली घटाकर ब्राइटनेस कम करती हैं, इसलिए उनमें फ्लिकर कम होता है। हालांकि कुछ सस्ती LCD स्क्रीन में भी PWM का इस्तेमाल किया जाता है।

4. PWM Dimming तकनीक के बारे में और कहां पढ़ें?

यह तकनीक सिर्फ डिस्प्ले में ही नहीं, बल्कि LED लाइट और मोटर कंट्रोल में भी इस्तेमाल होती है। इसकी तकनीकी जानकारी आप यहां विस्तार से पढ़ सकते हैं।

उपरोक्त PWM Dimming की जानकारी गूगल और विभिन्न वेबसाइट/समाचार माध्यमों से ली गई है। सटीकता की गारंटी नहीं है।

आगे और समाचार पढ़े:

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