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सोवियत काल के पुराने ब्लूप्रिंट से भारत की नई ताकत, अब टी-72 और टी-90 टैंकों का होगा देश में कायाकल्प

भारत अपनी सैन्य ताकत और रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठा रहा है। जबलपुर स्थित व्हीकल फैक्ट्री जबलपुर (VFJ) में सोवियत काल के पुराने तकनीकी ब्लूप्रिंट को समझकर भारतीय सेना के टी-72 और टी-90 युद्धक टैंकों की व्यापक मरम्मत और पुनर्निर्माण की क्षमता विकसित की जा रही है। इस परियोजना का उद्देश्य पुराने टैंकों की सेवा अवधि बढ़ाना और उनके रखरखाव के लिए विदेशी तकनीकी सहायता पर निर्भरता कम करना है।

इस योजना के तहत लगभग 462 करोड़ रुपये की लागत से एक आधुनिक सुविधा विकसित की जा रही है। लक्ष्य है कि अप्रैल 2028 से इस केंद्र में हर साल 80 टैंकों का ओवरहॉल किया जा सके।

 रूसी भाषा में लिखे दशकों पुराने दस्तावेज बने चुनौतीसोवियत

इस परियोजना की सबसे बड़ी चुनौती उन तकनीकी दस्तावेजों को समझना है, जो कई दशक पहले सोवियत संघ में तैयार किए गए थे। इनमें से अनेक दस्तावेज रूसी भाषा में हैं और उनमें टैंकों की संरचना, विशेष उपकरणों तथा मरम्मत की प्रक्रियाओं से जुड़ी जानकारी दी गई है।

भारतीय इंजीनियर इन पुराने ब्लूप्रिंट का अध्ययन कर रहे हैं, ताकि टैंकों को खोलने, उनके विभिन्न हिस्सों की जांच करने और दोबारा जोड़ने के लिए जरूरी तकनीकी ज्ञान विकसित किया जा सके।

रिपोर्ट के अनुसार, विशेष उपकरणों और फिक्स्चर से संबंधित लगभग 70 प्रतिशत ड्रॉइंग को समझा जा चुका है। जिन उपकरणों के मूल डिजाइन उपलब्ध नहीं हैं, उनके लिए भारतीय इंजीनियर अपने स्तर पर नए डिजाइन तैयार कर रहे हैं। यह प्रयास भारत की स्वदेशी इंजीनियरिंग क्षमता को मजबूत करने की दिशा में अहम है।

 टी-72 और टी-90 टैंक क्यों हैं महत्वपूर्ण?

भारतीय सेना के बख्तरबंद बेड़े में टी-72 अजeya और टी-90 भीष्म जैसे टैंकों की महत्वपूर्ण भूमिका है। ये टैंक सेना की युद्धक क्षमता का अहम हिस्सा हैं और विभिन्न परिस्थितियों में सैन्य अभियानों के लिए उपयोग किए जाते हैं।

हालांकि, लंबे समय तक इस्तेमाल होने वाले किसी भी सैन्य वाहन को नियमित रखरखाव के साथ-साथ समय-समय पर व्यापक मरम्मत की आवश्यकता होती है। लगातार उपयोग के कारण उसके यांत्रिक, इलेक्ट्रॉनिक और अन्य हिस्सों में घिसावट हो सकती है।

ऐसे में ओवरहॉल की प्रक्रिया टैंक को दोबारा बेहतर परिचालन स्थिति में लाने में मदद करती है। इससे पुराने टैंकों की उपयोगिता बढ़ सकती है और नए टैंकों की खरीद पर पड़ने वाला दबाव भी कुछ हद तक कम हो सकता है।

क्या होता है टैंक का ओवरहॉल?

ओवरहॉल सामान्य सर्विसिंग से कहीं अधिक व्यापक प्रक्रिया है। इसमें टैंक को बड़े स्तर पर खोला जाता है, उसके विभिन्न हिस्सों की विस्तृत जांच की जाती है और खराब या घिस चुके पुर्जों की मरम्मत अथवा जरूरत के अनुसार उन्हें बदला जाता है।

इसके बाद टैंक को दोबारा जोड़ा जाता है और आवश्यक परीक्षणों के माध्यम से उसकी कार्यक्षमता की जांच की जाती है। इस पूरी प्रक्रिया में विशेष मशीनों, प्रशिक्षित तकनीशियनों और तकनीकी विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है।

जबलपुर में प्रत्येक टैंक के ओवरहॉल में लगभग चार महीने लग सकते हैं। इसलिए इस परियोजना की सफलता केवल मशीनें लगाने पर निर्भर नहीं करेगी, बल्कि प्रशिक्षित कर्मचारियों, उपयुक्त उपकरणों और व्यवस्थित कार्यप्रणाली पर भी निर्भर करेगी।

 जबलपुर में तैयार हो रही बड़ी तकनीकी टीम

इस परियोजना में फिलहाल लगभग 80 कर्मचारी काम कर रहे हैं। शुरुआती चरण में टैंक के मुख्य ढांचे और बुर्ज से जुड़े कार्यों पर ध्यान दिया जा रहा है। अगले चरण में आंतरिक प्रणालियों से संबंधित काम शुरू करने की योजना है।

पूरी क्षमता से संचालन के लिए लगभग 650 प्रशिक्षित कर्मचारियों की जरूरत का अनुमान लगाया गया है। इसके लिए प्रशिक्षण और तकनीकी ज्ञान विकसित करने पर जोर दिया जा रहा है।

जबलपुर की टीम चेन्नई के पास अवडी स्थित हेवी व्हीकल्स फैक्ट्री (HVF) के विशेषज्ञों के साथ भी काम कर रही है। दोनों संस्थान आर्मर्ड व्हीकल्स निगम लिमिटेड (AVNL) के अंतर्गत आते हैं। अवडी में उपलब्ध अनुभव का लाभ उठाकर जबलपुर में नई मरम्मत क्षमता विकसित की जा रही है।

 रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर भारत की दिशा में बड़ा कदम

जबलपुर में विकसित हो रही यह सुविधा भारत की रक्षा उत्पादन व्यवस्था को मजबूत करने की व्यापक कोशिश का हिस्सा है। यदि निर्धारित समयसीमा के अनुसार परियोजना शुरू होती है, तो देश को टैंकों के रखरखाव के लिए एक अतिरिक्त प्रमुख केंद्र मिल जाएगा।

इससे मरम्मत की क्षमता बढ़ाने, तकनीकी विशेषज्ञता विकसित करने और पुराने सैन्य उपकरणों की सेवा अवधि बढ़ाने में मदद मिल सकती है। साथ ही, स्वदेशी उपकरणों और इंजीनियरिंग समाधानों का विकास भविष्य की रक्षा परियोजनाओं के लिए भी उपयोगी साबित हो सकता है।

हालांकि, अप्रैल 2028 का लक्ष्य अभी प्रस्तावित संचालन समयसीमा है। परियोजना की वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सुविधा, उपकरण, प्रशिक्षण और परीक्षण संबंधी तैयारियां समय पर पूरी होती हैं या नहीं।

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निष्कर्ष

सोवियत काल के पुराने ब्लूप्रिंट को समझकर टी-72 और टी-90 टैंकों के ओवरहॉल की क्षमता विकसित करना भारत के लिए केवल मरम्मत से जुड़ी परियोजना नहीं है, बल्कि तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास है। 462 करोड़ रुपये की यह योजना सफल होती है, तो जबलपुर भारतीय सेना के बख्तरबंद बेड़े के रखरखाव में अहम योगदान दे सकता है। इससे भारत को अपनी मौजूदा सैन्य ताकत को लंबे समय तक प्रभावी बनाए रखने और स्वदेशी रक्षा क्षमताओं को आगे बढ़ाने में मदद मिलने की उम्मीद है।

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PandeyAbhishek
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Abhishek Pandey is a skilled news editor with 4-5 years of experience in the field, he covers mostly political, world news, sports and etc.
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