भारतीय शेयर बाजार में गिरावट का सिलसिला मंगलवार, 29 सितंबर को भी जारी रहा। पिछले कारोबारी सत्र में सेंसेक्स में 1,100 से ज्यादा अंकों की गिरावट के बाद मंगलवार को भी शुरुआती कारोबार में BSE Sensex और Nifty50 करीब 0.8 फीसदी तक नीचे चले गए। निफ्टी 22,600 के स्तर से नीचे फिसला, जबकि सेंसेक्स छह महीने के निचले स्तर के आसपास कारोबार करता नजर आया। बढ़ते कच्चे तेल के दाम, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेजी, रुपये की कमजोरी और भू-राजनीतिक तनाव ने निवेशकों की चिंता बढ़ाई है।
सोमवार को सेंसेक्स 1,124 अंक टूटा था
बाजार में मंगलवार की कमजोरी को समझने के लिए सोमवार का प्रदर्शन महत्वपूर्ण है। 28 सितंबर को सेंसेक्स 1,124.02 अंक यानी 1.52 फीसदी गिरकर 72,771.72 पर बंद हुआ था। यह 30 मार्च 2026 के बाद सेंसेक्स का सबसे निचला क्लोजिंग स्तर था। इसी तरह निफ्टी 50 करीब 360 अंक टूटकर 22,780.25 पर बंद हुआ, जो लगभग छह महीने का निचला स्तर था।
सोमवार की बिकवाली से BSE पर सूचीबद्ध कंपनियों का कुल बाजार पूंजीकरण करीब 7.5 लाख करोड़ रुपये घट गया। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने शेयर बाजार में लगभग 5,353 करोड़ रुपये की शुद्ध बिकवाली की, जबकि घरेलू संस्थागत निवेशकों की खरीद करीब 5,189 करोड़ रुपये रही।
कच्चा तेल बना सबसे बड़ी चिंता
बाजार में गिरावट का एक प्रमुख कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और अमेरिका-ईरान बातचीत को लेकर अनिश्चितता के बीच Brent crude करीब 107 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए तेल महंगा होने से देश का आयात बिल और महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है।
निवेशकों की चिंता इसलिए भी बढ़ी है क्योंकि लंबे समय तक ऊंची तेल कीमतें कंपनियों की लागत, उपभोक्ता मांग और सरकार की वित्तीय स्थिति पर असर डाल सकती हैं।
रुपया 96 प्रति डॉलर के पार
डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये की कमजोरी ने भी बाजार पर दबाव बढ़ाया है। मंगलवार को रुपया 96.14 प्रति डॉलर के आसपास पहुंचकर दो महीने के निचले स्तर पर चला गया। तेल की बढ़ती कीमतें और विदेशी पूंजी की निकासी रुपये पर दबाव के प्रमुख कारणों में शामिल हैं।
कमजोर रुपया विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय शेयरों की लागत और मुद्रा जोखिम दोनों को प्रभावित करता है। इसके अलावा आयात पर निर्भर कंपनियों की लागत भी बढ़ सकती है।
अमेरिकी बॉन्ड यील्ड बढ़ने से क्यों घबराए निवेशक?
अमेरिका में बॉन्ड यील्ड में तेज बढ़ोतरी भी भारतीय शेयर बाजार के लिए नकारात्मक संकेत बन रही है। अमेरिकी 10-वर्षीय ट्रेजरी यील्ड 5 फीसदी से ऊपर बनी हुई है और मंगलवार को यह 5.27 फीसदी से भी ऊपर पहुंची। ऊंची अमेरिकी यील्ड से निवेशकों को डॉलर आधारित सुरक्षित परिसंपत्तियों में अपेक्षाकृत ज्यादा रिटर्न मिलने की संभावना रहती है। इससे उभरते बाजारों से पूंजी निकलने का दबाव बढ़ सकता है।
इसी वजह से बाजार में विदेशी निवेशकों की बिकवाली को लेकर चिंता बनी हुई है। Reuters के मुताबिक सितंबर में अब तक विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजार से करीब 3.7 अरब डॉलर निकाले हैं। 2026 में कुल निकासी लगभग 19.6 अरब डॉलर तक पहुंच गई है।
किन सेक्टरों पर ज्यादा दबाव?
मंगलवार के कारोबार में गिरावट व्यापक रही। बैंकिंग, वित्तीय सेवाएं, आईटी, FMCG और ऑटो जैसे प्रमुख सेक्टर दबाव में रहे। सोमवार को भी बैंकिंग और वित्तीय शेयरों में तेज बिकवाली देखी गई थी।
बाजार में गिरावट केवल कुछ चुनिंदा शेयरों तक सीमित नहीं रही, बल्कि कई सेक्टरों में बिकवाली दिखाई दी। इससे संकेत मिलता है कि मौजूदा दबाव को निवेशक व्यापक मैक्रोइकोनॉमिक और वैश्विक जोखिमों से जोड़कर देख रहे हैं।
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क्या बाजार में और उतार-चढ़ाव संभव है?
फिलहाल बाजार की दिशा पर कई बाहरी कारकों का प्रभाव है। कच्चे तेल की कीमत, अमेरिका-ईरान तनाव, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड, रुपये की चाल और विदेशी निवेशकों की गतिविधियां आने वाले सत्रों में महत्वपूर्ण रहेंगी।
मंगलवार की गिरावट ऐसे समय में आई है जब भारतीय शेयर बाजार पहले से ही लंबे समय से दबाव में है। हालिया रिपोर्टों के मुताबिक सेंसेक्स और निफ्टी दोनों अपने पिछले ऊंचे स्तरों से काफी नीचे हैं। हालांकि, बाजार की अगली दिशा किसी एक दिन की गिरावट से तय नहीं होती और वैश्विक तथा घरेलू आर्थिक आंकड़ों पर भी निर्

