नेपाल में आई विनाशकारी फ्लैश फ्लड ने देश के कई हिस्सों में भारी तबाही मचा दी है। हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर और चट्टानों के बड़े हिस्से के टूटने के बाद नदियों में अचानक जलस्तर बढ़ा और तेज पानी, कीचड़ तथा मलबे ने रास्ते में आने वाले गांवों, पुलों, सड़कों और बुनियादी ढांचे को तबाह कर दिया। आपदा के छठे दिन भी बड़े पैमाने पर खोज और बचाव अभियान जारी है। ताजा रिपोर्टों के मुताबिक नेपाल और तिब्बत में इस आपदा से 900 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 4,700 से ज्यादा लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं।
नेपाल की आपदा प्रबंधन एजेंसियां, सेना, पुलिस और अन्य सुरक्षा बल प्रभावित इलाकों में लगातार राहत एवं बचाव अभियान चला रहे हैं। कई दुर्गम क्षेत्रों में सड़क और पुल टूट जाने के कारण राहत दलों को हेलीकॉप्टर और वैकल्पिक रास्तों का सहारा लेना पड़ रहा है।
नेपाल में कैसे आई इतनी बड़ी तबाही?
प्रारंभिक भूगर्भीय आकलनों के अनुसार इस आपदा की शुरुआत हिमालयी क्षेत्र में एक बड़े ग्लेशियर और चट्टान के टूटने से हुई। इस घटना के बाद भारी मात्रा में बर्फ, पानी और चट्टानी मलबा नीचे की ओर आया और नदी तंत्र में अचानक भारी उफान पैदा हो गया।
इस तेज बहाव ने कुछ ही समय में नदियों के आसपास बसे इलाकों को अपनी चपेट में ले लिया। बाढ़ की गति इतनी तेज थी कि कई स्थानों पर लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाने का पर्याप्त समय तक नहीं मिल सका। विशेषज्ञों ने ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने और हिमालयी क्षेत्र में बदलते जलवायु पैटर्न को भी ऐसी घटनाओं के बढ़ते जोखिम से जोड़कर देखा है।
हजारों लोग अब भी लापता
सबसे बड़ी चिंता लापता लोगों की संख्या को लेकर है। नेपाल में हजारों लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं। इनमें स्थानीय नागरिकों के अलावा बड़ी संख्या में विदेशी नागरिक और हाइड्रोपावर परियोजनाओं में काम करने वाले कर्मचारी भी शामिल हैं। नेपाल और चीन के तिब्बत क्षेत्र को मिलाकर लापता लोगों की संख्या 4,700 से अधिक बताई गई है।
कई परिवार अपने लापता परिजनों की तलाश में अस्पतालों, राहत शिविरों और पहचान केंद्रों के चक्कर लगा रहे हैं। कई शवों की स्थिति बेहद खराब होने के कारण उनकी पहचान करना भी मुश्किल हो रहा है। अधिकारियों ने डीएनए नमूने और अन्य पहचान संबंधी रिकॉर्ड जुटाने की प्रक्रिया शुरू की है।
नेपाल में हाइड्रोपावर परियोजनाओं में फंसे लोगों पर नजर
बाढ़ से नेपाल के महत्वपूर्ण जलविद्युत परियोजना क्षेत्रों को भी भारी नुकसान पहुंचा है। कई कर्मचारियों के सुरंगों में फंसे होने की आशंका है। बचाव दल विशेष रूप से अपर त्रिशूली-3ए हाइड्रोपावर परियोजना के आसपास अभियान तेज कर रहे हैं।
एक सुरंग के प्रवेश हिस्से का पता लगाने के बाद बचावकर्मी रास्ता चौड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं ताकि ऑक्सीजन सिलेंडर और अन्य जरूरी उपकरण लेकर अंदर पहुंचा जा सके। अधिकारियों के लिए यह अभियान बेहद चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि सुरंगों में पानी, मलबा और ऑक्सीजन की कमी का खतरा बना हुआ है।
सड़कें और पुल तबाह, राहत पहुंचाना मुश्किल
बाढ़ ने नेपाल के कई हिस्सों में सड़क संपर्क को बुरी तरह प्रभावित किया है। दर्जनों पुल और सड़कें बह जाने से प्रभावित गांवों तक राहत सामग्री पहुंचाना मुश्किल हो गया है। कुछ इलाकों में लोग कई दिनों से मुख्य शहरों और प्रशासनिक केंद्रों से कटे हुए हैं।
नेपाल की सेना और सुरक्षा बलों ने बड़ी संख्या में लोगों को हेलीकॉप्टर और अन्य साधनों से सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया है। रिपोर्टों के अनुसार हजारों लोगों को अब तक बचाया जा चुका है, लेकिन खराब मौसम और दुर्गम पहाड़ी भूगोल के कारण अभियान में लगातार मुश्किलें आ रही हैं।
शवों की पहचान बनी बड़ी चुनौती
आपदा के बाद बड़ी संख्या में शव बरामद हुए हैं। कई शव पानी के तेज बहाव में दूर तक बह गए और कुछ नेपाल के अलग-अलग जिलों में पाए गए। पहचान की प्रक्रिया धीमी होने के कारण अधिकारियों ने कुछ अज्ञात शवों को अस्थायी रूप से दफनाना शुरू किया है।
इस प्रक्रिया में शवों की तस्वीरें, डीएनए नमूने और अन्य विवरण सुरक्षित रखे जा रहे हैं ताकि बाद में परिवारों की पहचान के दावे की पुष्टि की जा सके। भारत समेत कुछ देशों ने फोरेंसिक और अन्य तकनीकी सहायता उपलब्ध कराने की पेशकश की है।
सरकार और सुरक्षा एजेंसियों के सामने बड़ी चुनौती
नेपाल सरकार के सामने इस समय दोहरी चुनौती है—एक तरफ जीवित बचे लोगों को तत्काल भोजन, पानी, दवाइयां और आश्रय उपलब्ध कराना और दूसरी तरफ हजारों लापता लोगों की तलाश करना।
नेपाल की सेना और पुलिस के हजारों जवान राहत कार्य में लगाए गए हैं। लगातार बदलते मौसम और नए भूस्खलन के खतरे के कारण बचाव दलों को बेहद सावधानी से आगे बढ़ना पड़ रहा है। कई इलाकों में नदी का जलस्तर बढ़ने की चेतावनी भी जारी की गई है।
जलवायु परिवर्तन ने बढ़ाई चिंता
इस आपदा ने हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन और ग्लेशियरों की अस्थिरता को लेकर चिंता फिर बढ़ा दी है। वैज्ञानिकों का कहना है कि बढ़ता तापमान ग्लेशियरों और हिमनद झीलों की स्थिरता को प्रभावित कर सकता है। ऐसी स्थिति में अचानक ग्लेशियर टूटने, हिमस्खलन और बाढ़ जैसी घटनाओं का जोखिम बढ़ सकता है।
नेपाल पहले से ही भूकंप, भूस्खलन और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं के प्रति संवेदनशील है। ऐसे में शुरुआती चेतावनी प्रणाली, मजबूत आपदा प्रबंधन ढांचा और संवेदनशील इलाकों में बेहतर निगरानी की जरूरत पहले से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई है।
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आगे भी जारी रहेगा बचाव अभियान
आपदा के छठे दिन भी बचाव दलों का मुख्य लक्ष्य लापता लोगों को ढूंढना और सुरंगों में फंसे कर्मचारियों तक पहुंचना है। अधिकारियों का कहना है कि जब तक प्रभावित इलाकों में तलाश पूरी नहीं हो जाती, अभियान जारी रहेगा।
हालांकि मृतकों और लापता लोगों की संख्या लगातार बदल रही है। अलग-अलग एजेंसियों से प्राप्त आंकड़ों में अंतर भी देखा जा रहा है। इसलिए अंतिम आंकड़ा राहत और खोज अभियान पूरा होने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।
निष्कर्ष
नेपाल में आई यह बाढ़ हाल के वर्षों की सबसे गंभीर प्राकृतिक आपदाओं में शामिल हो गई है। ग्लेशियर और चट्टान के टूटने से शुरू हुई तबाही ने देखते ही देखते नदियों का स्वरूप बदल दिया और हजारों लोगों के जीवन को प्रभावित किया।
मृतकों की संख्या 900 के पार पहुंच चुकी है और हजारों लोग अब भी लापता हैं। हाइड्रोपावर सुरंगों में फंसे लोगों को बचाने के लिए विशेष अभियान चलाया जा रहा है, जबकि सेना और सुरक्षा बल दुर्गम इलाकों में राहत पहुंचाने में जुटे हैं।
अब सबसे बड़ी चुनौती लापता लोगों को तलाशना, शवों की पहचान करना और विस्थापित परिवारों को सुरक्षित पुनर्वास उपलब्ध कराना है। साथ ही, इस आपदा ने हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियरों की निगरानी और जलवायु परिवर्तन से जुड़े बढ़ते प्राकृतिक जोखिमों को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

