HomeNational Headlinesरूसी तेल खरीद पर अमेरिकी कानून भारत की संप्रभुता का अपमान: कांग्रेस

रूसी तेल खरीद पर अमेरिकी कानून भारत की संप्रभुता का अपमान: कांग्रेस

रूस से कच्चे तेल की खरीद करने वाले देशों पर संभावित भारी शुल्क लगाने के अमेरिकी कदम को लेकर भारत में राजनीतिक बहस तेज हो गई है। अमेरिकी संसद द्वारा रूस और ईरान पर प्रतिबंधों से संबंधित विधेयक पारित किए जाने के बाद कांग्रेस ने केंद्र सरकार से अपनी विदेश नीति और ऊर्जा सुरक्षा पर स्पष्ट रुख अपनाने की मांग की है।

कांग्रेस महासचिव के.सी. वेणुगोपाल ने अमेरिकी कदम की आलोचना करते हुए सवाल उठाया कि क्या भारत की विदेश नीति और ऊर्जा सुरक्षा का नियंत्रण वॉशिंगटन से किया जाएगा। उन्होंने अमेरिकी कानून को भारत की संप्रभुता के लिए अपमानजनक बताया और केंद्र सरकार से इस मुद्दे पर मजबूती से प्रतिक्रिया देने की अपील की।

100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का प्रावधान

अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने 16 सितंबर 2026 को Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026 को 262-159 मतों से मंजूरी दी। इससे पहले अमेरिकी सीनेट इस विधेयक को 86-11 के अंतर से पारित कर चुकी थी।

विधेयक में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस से तेल और गैस खरीदने वाले प्रमुख देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार देने का प्रावधान है। इसमें रूस के ऊर्जा और रक्षा क्षेत्रों पर प्रतिबंधों के साथ-साथ प्रतिबंधों से बचने में मदद करने वाले जहाजों के खिलाफ कार्रवाई का प्रस्ताव भी शामिल है।

हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि विधेयक अपने आप भारत पर 100 प्रतिशत शुल्क लागू नहीं करता। यह अमेरिकी राष्ट्रपति को विशेष परिस्थितियों में ऐसा शुल्क लगाने का अधिकार देता है। कानून में राष्ट्रीय हित के आधार पर प्रतिबंधों से छूट देने की संभावना भी मौजूद है।

कांग्रेस ने केंद्र सरकार से मांगा जवाबकांग्रेस

कांग्रेस ने इस घटनाक्रम को केंद्र की विदेश नीति के लिए गंभीर चुनौती बताया है। पार्टी का तर्क है कि भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों, आर्थिक हितों और रणनीतिक स्वतंत्रता से जुड़े फैसले किसी बाहरी दबाव में नहीं लेने चाहिए।

कांग्रेस नेताओं ने सरकार से पूछा है कि यदि कोई विदेशी कानून भारत के व्यापार और ऊर्जा आयात को प्रभावित करने का प्रयास करता है, तो नई दिल्ली की प्रतिक्रिया क्या होगी। पार्टी ने केंद्र से संसद और जनता को यह बताने की मांग की है कि वह भारत के हितों की रक्षा के लिए कौन से कूटनीतिक और आर्थिक कदम उठाने की तैयारी कर रहा है।

कांग्रेस की आलोचना राजनीतिक बयानबाजी का हिस्सा है। वहीं, सरकार ने अपने आधिकारिक रुख में कहा है कि भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा और व्यापारिक हितों की रक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाएगा।

भारत की ऊर्जा सुरक्षा का मुद्दा

भारत दुनिया के प्रमुख कच्चे तेल आयातक देशों में शामिल है। देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए भारत अलग-अलग देशों से तेल खरीदता है। रूस से मिलने वाले कच्चे तेल की कीमत और उपलब्धता ने हाल के वर्षों में भारतीय रिफाइनरियों के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

भारत सरकार का कहना है कि लगभग 1.4 अरब लोगों की ऊर्जा सुरक्षा उसकी प्राथमिकता है। नई दिल्ली ने यह भी कहा है कि वह बाजार की बदलती परिस्थितियों और विभिन्न स्रोतों से आपूर्ति के आधार पर अपनी ऊर्जा नीति तय करेगी।

सरकार के अनुसार, भारत ऊर्जा आपूर्ति में विविधता बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है। इसका अर्थ है कि देश केवल एक आपूर्तिकर्ता पर निर्भर रहने के बजाय विभिन्न देशों और बाजारों से तेल प्राप्त करने की रणनीति पर काम करता रहेगा।

भारत-अमेरिका संबंधों पर संभावित प्रभाव

अमेरिकी विधेयक का असर भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक तथा रणनीतिक संबंधों पर पड़ सकता है। दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते को लेकर बातचीत पहले से चल रही है। ऐसे में रूसी तेल खरीद को लेकर संभावित अमेरिकी शुल्क वार्ता को और जटिल बना सकते हैं।

भारत ने पहले ही संकेत दिया है कि यदि अमेरिका रूसी ऊर्जा खरीद के कारण भारतीय उत्पादों पर भारी शुल्क लगाता है, तो इसका द्विपक्षीय संबंधों पर असर पड़ सकता है। भारतीय अधिकारियों ने अमेरिकी पक्ष को यह भी बताया है कि इस तरह के कदमों का प्रभाव वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ सकता है।

यदि भारत पर अतिरिक्त शुल्क लागू होते हैं, तो अमेरिकी बाजार में भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति प्रभावित हो सकती है। इससे निर्यातकों, उद्योगों और व्यापारिक संस्थानों पर दबाव बढ़ने की संभावना है। हालांकि, वास्तविक प्रभाव शुल्क की दर, उसके दायरे, अवधि और संभावित छूट पर निर्भर करेगा।

अमेरिकी पक्ष का तर्क

अमेरिकी विधेयक के समर्थकों का कहना है कि रूस की ऊर्जा आय को सीमित करके यूक्रेन युद्ध पर आर्थिक दबाव बढ़ाया जा सकता है। अमेरिकी सांसदों के एक वर्ग का मानना है कि रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों को प्रतिबंधों के माध्यम से अपनी नीति बदलने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए।

कुछ अमेरिकी नेताओं ने भारत और चीन से रूसी ऊर्जा खरीद कम करने या वैकल्पिक स्रोतों से तेल लेने की सार्वजनिक अपील भी की है। उनका तर्क है कि रूसी ऊर्जा खरीद से मिलने वाला राजस्व मॉस्को की युद्ध संबंधी गतिविधियों को समर्थन दे सकता है।

हालांकि, इस नीति की आलोचना करने वालों का कहना है कि राष्ट्रपति को व्यापक टैरिफ अधिकार देने से वैश्विक व्यापार और ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता बढ़ सकती है। अमेरिकी संसद के भीतर भी कुछ सांसदों ने कार्यपालिका को दिए जाने वाले व्यापक अधिकारों पर चिंता जताई है।

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आगे की रणनीति पर नजर

अब इस पूरे मामले में राष्ट्रपति ट्रंप के अगले कदम पर नजर रहेगी। यदि विधेयक पर हस्ताक्षर होते हैं, तो अमेरिकी प्रशासन के पास प्रमुख रूसी ऊर्जा आयातकों पर शुल्क लगाने का वैधानिक अधिकार होगा। हालांकि, शुल्क लागू करने का अंतिम निर्णय अमेरिकी सरकार की नीति, राष्ट्रीय हित और संबंधित देशों के साथ बातचीत पर निर्भर करेगा।

भारत के सामने एक ओर ऊर्जा की कीमतों और आपूर्ति को स्थिर रखने की चुनौती है, तो दूसरी ओर अमेरिका सहित प्रमुख व्यापारिक साझेदारों के साथ संबंध बनाए रखने की जरूरत है। सरकार को कूटनीतिक बातचीत, ऊर्जा स्रोतों में विविधता और निर्यातकों के हितों की रक्षा के बीच संतुलन बनाना होगा।

कांग्रेस का विरोध इस मुद्दे को घरेलू राजनीतिक बहस के केंद्र में ले आया है। आने वाले दिनों में भारत की आधिकारिक प्रतिक्रिया, अमेरिकी राष्ट्रपति का निर्णय और दोनों देशों के बीच व्यापार वार्ता यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे कि इस कानून का वास्तविक प्रभाव कितना व्यापक होगा।

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PandeyAbhishek
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Abhishek Pandey is a skilled news editor with 4-5 years of experience in the field, he covers mostly political, world news, sports and etc.
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