एक अभिनेत्री जब मां बनती है, तो उसके जीवन में कई चीजें बदलती हैं—समय, प्राथमिकताएं, जिम्मेदारियां और शरीर। लेकिन क्या उसके शरीर पर समाज का फैसला भी बदल जाना चाहिए? बॉलीवुड अभिनेत्री कटरीना कैफ के हालिया पोस्टपार्टम लुक को लेकर सोशल मीडिया पर हुई ट्रोलिंग ने यही सवाल फिर खड़ा कर दिया है। इससे पहले ऐश्वर्या राय बच्चन भी मां बनने के बाद अपने वजन और बदले हुए लुक को लेकर सार्वजनिक आलोचना का सामना कर चुकी हैं।
कटरीना को हाल में सार्वजनिक कार्यक्रम में पति विक्की कौशल के साथ देखा गया। तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद कुछ यूजर्स ने उनके बढ़े हुए वजन और चेहरे में आए बदलावों पर टिप्पणियां कीं। मामला इतना बढ़ा कि बॉडी शेमिंग के खिलाफ फिल्म इंडस्ट्री से भी आवाजें उठीं। सलमान खान ने भी सार्वजनिक रूप से ऐसी ट्रोलिंग की आलोचना की।
मां बनते ही ‘पुरानी बॉडी’ वापस लाने का दबाव क्यों?
प्रेग्नेंसी और बच्चे के जन्म के बाद शरीर में बदलाव होना सामान्य प्रक्रिया है। वजन, त्वचा, हार्मोन और शरीर के आकार में परिवर्तन हो सकता है और हर महिला का पोस्टपार्टम अनुभव अलग होता है। इसके बावजूद सोशल मीडिया पर एक धारणा दिखाई देती है कि अभिनेत्री को बच्चे के जन्म के कुछ समय बाद ही पहले जैसी फिटनेस और शक्ल में लौट आना चाहिए।
यही ‘बाउंस बैक’ वाली मानसिकता समस्या पैदा करती है। किसी महिला के लिए बच्चे के जन्म के बाद प्राथमिकता स्वास्थ्य, आराम और बच्चे की देखभाल हो सकती है, लेकिन सार्वजनिक हस्तियों के मामले में अक्सर उनकी तस्वीरों को उनके शरीर के पैमाने से देखा जाने लगता है।
सवाल यह है कि अगर किसी अभिनेत्री ने कुछ समय के लिए अपने शरीर को बदलने की अनुमति खुद को दी है, तो उसमें किसी बाहरी व्यक्ति को फैसला सुनाने का अधिकार कहां से मिल जाता है?
ऐश्वर्या राय भी झेल चुकी हैं ऐसी टिप्पणियां
यह पहली बार नहीं है जब किसी बड़ी अभिनेत्री को मातृत्व के बाद शरीर को लेकर सार्वजनिक आलोचना का सामना करना पड़ा हो। ऐश्वर्या राय बच्चन ने 2011 में बेटी आराध्या को जन्म दिया था। इसके बाद 2012 में कान्स फिल्म फेस्टिवल में उनकी उपस्थिति के दौरान उनके पोस्टपार्टम वजन को लेकर काफी चर्चा हुई।
उस समय सोशल मीडिया आज जितना व्यापक नहीं था, लेकिन मनोरंजन मीडिया और सार्वजनिक टिप्पणियों के जरिए ऐश्वर्या के शरीर को लेकर बहस हुई। बाद के वर्षों में करीना कपूर खान, बिपाशा बसु, नेहा धूपिया और अन्य अभिनेत्रियों को भी प्रेग्नेंसी के बाद अपने शरीर को लेकर आलोचनाओं का सामना करना पड़ा।
यानी चेहरे बदलते रहे, प्लेटफॉर्म बदलते रहे, लेकिन सवाल लगभग वही रहा—मां बनने के बाद महिला का शरीर कैसा दिखना चाहिए?
अभिनेत्री होने का मतलब ‘हमेशा परफेक्ट’ दिखना नहीं
फिल्म इंडस्ट्री में महिलाओं से लंबे समय से एक खास तरह की शारीरिक छवि की अपेक्षा की जाती रही है। अभिनेत्री अगर ज्यादा वजन के साथ दिखे तो टिप्पणी होती है, वजन कम करे तो उसके डाइट और फिटनेस रूटीन पर चर्चा शुरू हो जाती है। कपड़ों से लेकर उम्र तक, उनके व्यक्तित्व को अक्सर उनके शरीर और लुक से जोड़कर देखा जाता है।
कटरीना की मौजूदा स्थिति इसी दोहरे दबाव को सामने लाती है। एक तरफ उनसे एक अभिनेत्री के रूप में ‘ग्लैमरस’ दिखने की उम्मीद होती है, वहीं दूसरी तरफ मां बनने के बाद उनसे तत्काल पुराने शरीर में लौटने की अपेक्षा की जाती है।
कटरीना ने हालिया बातचीत में खुद बताया कि मातृत्व के बाद सुंदरता को लेकर उनकी सोच बदली है। उन्होंने कहा कि अब अच्छा दिखना उनके लिए सिर्फ बाहरी रूप से नहीं, बल्कि अंदर से अच्छा महसूस करने से जुड़ा है।
क्या सेलिब्रिटी होने से निजी जिंदगी पर अधिकार मिल जाता है?
यहां सबसे अहम सवाल ‘सेलिब्रिटी’ और ‘निजी जिंदगी’ के बीच की सीमा का है। किसी अभिनेत्री का सार्वजनिक जीवन उसके काम से जुड़ा हो सकता है, लेकिन उसका शरीर और मातृत्व उसकी निजी जिंदगी का हिस्सा हैं।
किसी फिल्म, अभिनय या सार्वजनिक कार्यक्रम पर राय देना एक बात है, लेकिन बच्चे को जन्म देने के बाद महिला के शरीर पर अपमानजनक टिप्पणी करना दूसरी।
सोशल मीडिया ने हर व्यक्ति को अपनी राय रखने का मंच दिया है, लेकिन राय रखने की आजादी और किसी के शरीर को सार्वजनिक रूप से शर्मिंदा करने के बीच फर्क है।
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मुद्दा सिर्फ कटरीना या ऐश्वर्या का नहीं
कटरीना और ऐश्वर्या के उदाहरण इसलिए चर्चा में आते हैं क्योंकि वे बेहद लोकप्रिय अभिनेत्रियां हैं। लेकिन पोस्टपार्टम बॉडी को लेकर दबाव केवल सेलिब्रिटीज तक सीमित नहीं है। आम महिलाएं भी परिवार, रिश्तेदारों, दोस्तों और सोशल मीडिया से इसी तरह की टिप्पणियों का सामना कर सकती हैं।
मातृत्व के बाद महिला से यह पूछने के बजाय कि “वजन कब कम करोगी?”, शायद सवाल यह होना चाहिए कि “तुम कैसी हो?”
आखिरकार, मां बनना किसी महिला की पहचान को खत्म नहीं करता और न ही उसे अपने शरीर के बारे में समाज की तय की हुई कसौटी पर खरा उतरने के लिए बाध्य करता है। अभिनेत्री हो या आम महिला—उसके शरीर में बदलाव पर फैसला सुनाने का अधिकार समाज को नहीं, उस महिला को होना चाहिए।

