महीने के अंत में अक्सर यह सवाल उठता है कि सैलरी आखिर गई कहां, और यहीं पर Zero-Based Budgeting Method काम आता है।
यह तरीका 50/30/20 रूल से बिल्कुल अलग है, क्योंकि इसमें आपकी हर एक रुपये को पहले से कोई न कोई काम सौंपा जाता है।
इस गाइड में हम समझेंगे कि यह तकनीक कैसे काम करती है और इसे अपनाना क्यों फायदेमंद हो सकता है।
यह गाइड बेसिक कॉन्सेप्ट से लेकर स्टेप-बाय-स्टेप प्रोसेस तक हर पहलू को कवर करती है।
Zero-Based Budgeting Method आखिर है क्या?
इस तरीके में आपकी कुल इनकम माइनस कुल खर्च और बचत बराबर शून्य होना चाहिए, यानी हर रुपये का हिसाब पहले से तय होता है।
इसका मतलब यह नहीं कि पैसा बचता ही नहीं, बल्कि बचत को भी एक खर्च की तरह पहले से प्लान कर लिया जाता है।
यही वजह है कि Zero-Based Budgeting Method में कोई भी रुपया बिना मकसद के खर्च नहीं होता।
इससे यह साफ पता चलता है कि पैसा किस कैटेगरी में जा रहा है और कहां कटौती की जा सकती है।
यह 50/30/20 रूल से कैसे अलग है?
50/30/20 रूल में खर्च को सिर्फ तीन बड़ी कैटेगरी में बांटा जाता है, जबकि Zero-Based Budgeting Method में हर छोटी-बड़ी जरूरत की अलग लाइन आइटम बनाई जाती है।
इसमें किराया, राशन, EMI से लेकर मूवी टिकट तक, हर खर्च को पहले से नाम दिया जाता है।
यह तरीका थोड़ा ज्यादा समय मांगता है, लेकिन खर्च पर कंट्रोल कहीं ज्यादा सटीक हो जाता है।
अनियमित इनकम वाले फ्रीलांसर और छोटे बिजनेस मालिकों के लिए यह तरीका खासतौर पर उपयोगी साबित होता है।
इस बजटिंग को शुरू कैसे करें?
सबसे पहले पिछले तीन महीनों के बैंक स्टेटमेंट से अपनी औसत मासिक इनकम और खर्च का पैटर्न समझें।
इसके बाद हर खर्च को जरूरी, वैकल्पिक और बचत जैसी कैटेगरी में बांट लें।
हर कैटेगरी के लिए एक तय राशि सेट करें, ताकि कुल इनकम और कुल आवंटन बराबर हो जाए।
Zero-Based Budgeting Method को सफल बनाने के लिए महीने के बीच में भी खर्च को ट्रैक करना जरूरी है।
अगर किसी कैटेगरी में ज्यादा खर्च हो जाए, तो दूसरी कैटेगरी से एडजस्ट करके बैलेंस बनाए रखें।
इस तरीके के फायदे और सीमाएं क्या हैं?
सबसे बड़ा फायदा यह है कि फिजूलखर्ची अपने आप कम हो जाती है, क्योंकि हर रुपये का हिसाब सामने रहता है।
वित्तीय लक्ष्य जैसे इमरजेंसी फंड या बड़ी खरीदारी के लिए बचत करना भी आसान हो जाता है।
हालांकि Zero-Based Budgeting Method में शुरुआत में ज्यादा समय और अनुशासन लगता है, जो कुछ लोगों को मुश्किल लग सकता है।
जिन्हें डिटेल ट्रैकिंग पसंद नहीं, उनके लिए यह तरीका थोड़ा थकाऊ भी महसूस हो सकता है।
फिर भी, जो लोग एक बार इसे आदत बना लेते हैं, वे आमतौर पर पुराने तरीके पर वापस नहीं जाना चाहते।
बजट को लगातार बनाए रखने के लिए क्या करें?
हफ्ते में एक बार अपने खर्च की समीक्षा करें, ताकि किसी कैटेगरी में गड़बड़ी हो तो समय रहते ठीक की जा सके।
बड़े खर्च आने से पहले, जैसे त्योहार या यात्रा, उसके लिए अलग से लाइन आइटम पहले से जोड़ लें।
परिवार के सभी सदस्यों को बजट में शामिल करने से पारदर्शिता बढ़ती है और गलतफहमियां कम होती हैं।
समय के साथ यह आदत बन जाने पर पैसों को लेकर तनाव भी काफी हद तक कम हो जाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
1. Zero-Based Budgeting Method किसके लिए सबसे उपयोगी है?
जिनकी इनकम अनियमित है, जैसे फ्रीलांसर या छोटे बिजनेस मालिक, उनके लिए यह तरीका खर्च पर पूरा कंट्रोल देता है।
2. क्या इस बजटिंग के लिए ऐप जरूरी है?
नहीं, इसे साधारण एक्सेल शीट या कागज पर भी किया जा सकता है, हालांकि ऐप इस्तेमाल करने से ट्रैकिंग आसान हो जाती है।
3. क्या यह तरीका शुरुआती लोगों के लिए मुश्किल है?
शुरुआत में थोड़ा समय लगता है, लेकिन एक-दो महीने की प्रैक्टिस के बाद यह तरीका काफी आसान लगने लगता है।
4. क्या हर महीने बजट बदल सकता है?
हां, इनकम या खर्च में बदलाव होने पर हर महीने कैटेगरी और राशि दोबारा एडजस्ट की जा सकती है।
5. क्या Zero-Based Budgeting Method वाकई असरदार साबित हुआ है?
Investopedia के मुताबिक यह तरीका खर्च की आदतों में पारदर्शिता लाकर लंबे समय में बचत बढ़ाने में मदद करता है।
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