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क्या VPN इस्तेमाल करने पर पुलिस आपकी लोकेशन और पहचान पता लगा सकती है? जानिए पूरी सच्चाई

VPN Tracking को लेकर सबसे बड़ा भ्रम यही है कि VPN चालू करते ही इंटरनेट पर आप पूरी तरह गायब हो जाते हैं और पुलिस या जांच एजेंसियां आप तक कभी नहीं पहुंच सकतीं। असलियत इससे काफी अलग है। VPN आपकी कुछ जानकारी छिपाता जरूर है, लेकिन यह कोई जादुई पर्दा नहीं है।

VPN आखिर करता क्या है?

VPN यानी वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क आपके फोन या कंप्यूटर और इंटरनेट के बीच एक सुरक्षित सुरंग बना देता है। इससे आपका डेटा एन्क्रिप्ट हो जाता है। जिस वेबसाइट को आप खोलते हैं, उसे आपका असली IP एड्रेस नहीं दिखता, बल्कि VPN कंपनी के सर्वर का पता दिखता है।

इसी वजह से लोग मानते हैं कि उनकी लोकेशन छिप गई। लेकिन आपकी इंटरनेट कंपनी को यह जरूर पता रहता है कि आप VPN इस्तेमाल कर रहे हैं, भले ही वह यह न देख पाए कि आप कौन सी साइट खोल रहे हैं।

क्या भारत में VPN इस्तेमाल करना कानूनी है?

आम लोगों के लिए VPN का इस्तेमाल गैरकानूनी नहीं है। कंपनियां वर्क फ्रॉम होम और डेटा सुरक्षा के लिए बड़े पैमाने पर इसका इस्तेमाल करती हैं। हां, VPN की आड़ में किया गया कोई भी अपराध उतना ही अपराध है जितना बिना VPN के। धोखाधड़ी, साइबर ठगी या धमकी देने जैसे मामलों में VPN कोई कानूनी सुरक्षा नहीं देता।

VPN Tracking पर सरकार का नियम

भारत की साइबर सुरक्षा एजेंसी CERT-In ने अप्रैल 2022 में IT कानून के तहत VPN कंपनियों के लिए सख्त निर्देश जारी किए थे, जो सितंबर 2022 से लागू हैं। इनके तहत भारत में सेवा देने वाली VPN कंपनियों को ग्राहक का नाम, ईमेल, फोन नंबर, दिए गए IP एड्रेस, इस्तेमाल की अवधि और KYC जैसी जानकारी 5 साल तक संभालकर रखनी होती है।

इन नियमों के बाद कुछ बड़ी विदेशी VPN कंपनियों ने भारत से अपने फिजिकल सर्वर हटा लिए थे। फिर भी जांच के दौरान कानूनी प्रक्रिया से मिली जानकारी VPN Tracking को आसान बना देती है।

पुलिस किन रास्तों से पहचान तक पहुंचती है?

किसी गंभीर मामले में पुलिस कानूनी आदेश के जरिए VPN कंपनी, इंटरनेट कंपनी, बैंक या सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से रिकॉर्ड मांग सकती है। VPN खरीदने के लिए किया गया UPI या कार्ड भुगतान, उससे जुड़ा ईमेल और मोबाइल नंबर सीधे आपकी असली पहचान तक ले जा सकते हैं।

अगर आपने VPN चालू रखकर भी अपने Gmail, Facebook या किसी दूसरे अकाउंट में लॉगिन किया, तो उस प्लेटफॉर्म के पास आपकी पहचान पहले से मौजूद रहती है। कई बार तकनीकी खामी, जैसे DNS या WebRTC लीक, या VPN का कनेक्शन कुछ सेकेंड के लिए टूटना भी असली IP एड्रेस उजागर कर देता है। इसलिए VPN Tracking पूरी तरह नामुमकिन मानना बड़ी भूल है।

फ्री VPN से क्यों सावधान रहें

मुफ्त VPN ऐप्स अक्सर विज्ञापन दिखाकर या यूजर का डेटा बेचकर कमाई करते हैं। ऐसे ऐप आपकी ब्राउजिंग की जानकारी खुद ही इकट्ठा कर सकते हैं। कई फ्री सेवाएं अपने सर्वर पर यूजर की पूरी गतिविधि का रिकॉर्ड रखती हैं, इसलिए उनमें VPN Tracking का खतरा और भी बढ़ जाता है।

VPN Tracking
VPN Tracking

मांगे जाने पर यही रिकॉर्ड जांच एजेंसियों तक पहुंच सकता है। VPN हमेशा भरोसेमंद कंपनी का लें और उसकी प्राइवेसी पॉलिसी जरूर पढ़ें। सार्वजनिक Wi-Fi पर बैंकिंग करते समय यह आपकी सुरक्षा बढ़ाने में मदद करता है।

ऑनलाइन प्राइवेसी से जुड़ी और जानकारी के लिए ये लेख भी पढ़ें: WebRTC Leak क्या है, सार्वजनिक Wi-Fi पर होने वाली 7 गलतियां और भारत में डार्क वेब को लेकर नियम।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

1. क्या VPN Tracking से पुलिस मेरी सटीक लोकेशन जान सकती है?

सीधे VPN से नहीं, लेकिन कानूनी आदेश से मिले इंटरनेट कंपनी या मोबाइल नेटवर्क के रिकॉर्ड से आपके कनेक्शन की जगह का पता लगाया जा सकता है।

2. क्या VPN रखना ही अपने आप में अपराध है?

नहीं, सामान्य इस्तेमाल अपराध नहीं है। अपराध तब बनता है जब इसके जरिए कोई गैरकानूनी काम किया जाए।

3. क्या इनकॉग्निटो मोड से VPN Tracking जैसी प्राइवेसी मिलती है?

नहीं, इनकॉग्निटो मोड सिर्फ आपके डिवाइस पर हिस्ट्री सेव नहीं करता। आपका IP एड्रेस और इंटरनेट कंपनी का रिकॉर्ड उसमें नहीं छिपता।

4. VPN Tracking से जुड़े सरकारी निर्देश कहां पढ़ें?

VPN कंपनियों के लिए जारी आधिकारिक निर्देश CERT-In की वेबसाइट पर उपलब्ध हैं।

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उपरोक्त जानकारी गूगल और विभिन्न वेबसाइट/समाचार माध्यमों से ली गई है। सटीकता की गारंटी नहीं है।

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