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Space Launch System क्या है, कैसे काम करता है? आसान भाषा में समझें पूरी तकनीक

इंसानों को चांद और आगे मंगल तक पहुंचाने का सपना तभी पूरा हो सकता है, जब उन्हें वहां तक ले जाने वाला रॉकेट भी उतना ही ताकतवर हो। इसी मकसद से बनाया गया है Space Launch System, जिसे अब तक के सबसे शक्तिशाली रॉकेट सिस्टम में गिना जाता है। इस पोस्ट में आसान भाषा में समझेंगे कि Space Launch System क्या है, यह कैसे काम करता है और इसका मकसद क्या है।

Space Launch System क्या है?

Space Launch System, जिसे अक्सर SLS भी कहा जाता है, नासा का एक सुपर हेवी-लिफ्ट रॉकेट प्रोग्राम है, जिसे भारी-भरकम कार्गो और अंतरिक्ष यात्रियों को चांद, मंगल और उससे भी आगे भेजने के लिए बनाया गया है। यह रॉकेट इतना शक्तिशाली है कि यह भारी स्पेसक्राफ्ट को भी पृथ्वी की कक्षा से बाहर धकेल सकता है। इस रॉकेट का डिजाइन इस तरह तैयार किया गया है कि यह लंबी दूरी की डीप स्पेस मिशन के लिए जरूरी ताकत और भरोसेमंदी, दोनों दे सके।

Space Launch System कैसे काम करता है?

इस रॉकेट में कई स्टेज होते हैं, जो एक के बाद एक जलकर रॉकेट को धीरे-धीरे और तेज गति से ऊपर की ओर धकेलते हैं। शुरुआती स्टेज में सबसे ज्यादा ताकत की जरूरत होती है, ताकि रॉकेट पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण को पार कर सके। इसमें बड़े कोर स्टेज इंजन के साथ-साथ दोनों तरफ लगे बूस्टर भी काम करते हैं, जो शुरुआती उड़ान में एक्स्ट्रा पावर देते हैं।

एक बार तय ऊंचाई तक पहुंचने के बाद ये बूस्टर अलग हो जाते हैं और बाकी रॉकेट अपने मिशन की ओर आगे बढ़ता रहता है। ऊपर के हिस्से में मौजूद कैप्सूल में अंतरिक्ष यात्री या जरूरी उपकरण रखे जाते हैं, जिन्हें सुरक्षित तरीके से चांद या उससे आगे की यात्रा पर भेजा जाता है।

इसके फायदे

सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह रॉकेट एक साथ भारी वजन और लंबी दूरी, दोनों को संभाल सकता है, जिससे इंसानों को गहरे अंतरिक्ष तक भेजना संभव हो पाता है। इससे चांद पर दोबारा इंसान भेजने और भविष्य में मंगल मिशन जैसे बड़े लक्ष्य हासिल करने में मदद मिलती है। यह सिस्टम कई मिशनों के लिए दोबारा इस्तेमाल होने लायक डिजाइन पर आधारित है, जिससे लंबे समय में स्पेस प्रोग्राम को बनाए रखना आसान हो जाता है।

इसका इस्तेमाल कहां हो रहा है?

इस रॉकेट का सबसे बड़ा इस्तेमाल आर्टेमिस मिशन के तहत हो रहा है, जिसका मकसद इंसानों को दोबारा चांद पर भेजना और वहां लंबे समय तक रहने लायक व्यवस्था बनाना है। इसके अलावा भविष्य में गहरे अंतरिक्ष के अन्य मिशनों के लिए भी इस रॉकेट का इस्तेमाल होने की योजना है। इस प्रोग्राम से जुड़ी टेक्नोलॉजी और रिसर्च का असर सिर्फ स्पेस मिशन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इससे मिलने वाली जानकारी इंजीनियरिंग और मैटीरियल साइंस जैसे क्षेत्रों में भी काम आती है।

Space Launch System रॉकेट असेंबली फैसिलिटी में इंजीनियरों के साथ

Frequently Asked Questions (FAQ)

  • क्या Space Launch System दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है?
    इसके कुछ हिस्से दोबारा इस्तेमाल के लिए डिजाइन किए गए हैं, हालांकि पूरा रॉकेट पूरी तरह रीयूजेबल नहीं है।
  • क्या यह रॉकेट सिर्फ इंसानों को भेजने के लिए है?
    नहीं, इसका इस्तेमाल भारी कार्गो और वैज्ञानिक उपकरण भेजने के लिए भी किया जाता है, जरूरी नहीं कि हर मिशन में इंसान शामिल हों।
  • क्या भारत के पास भी Space Launch System टेक्नोलॉजी है?
    भारत की स्पेस एजेंसी और निजी कंपनियां भी अपने खुद के हेवी-लिफ्ट रॉकेट पर काम कर रही हैं, हालांकि क्षमता और स्केल में फर्क हो सकता है।
  • इस रॉकेट को बनाने में कितना समय लगा?
    इस प्रोग्राम को डिजाइन करने और तैयार करने में कई साल लगे, क्योंकि इतने बड़े और जटिल सिस्टम की सुरक्षा जांच बेहद बारीकी से की जाती है।
  • इस प्रोग्राम को कौन संचालित करता है?
    इस प्रोग्राम को अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी NASA संचालित करती है, जो इससे जुड़ी सभी तकनीकी और मिशन प्लानिंग की जिम्मेदारी संभालती है।

आगे और समाचार पढ़ें:

Space Launch System से जुड़ी जानकारी के अलावा, स्पेस टेक्नोलॉजी से जुड़ी ये खबरें भी पढ़ें: Skyroot Aerospace का भारत का पहला प्राइवेट ऑर्बिटल रॉकेट लॉन्च, जिसमें भारत की स्पेस इंडस्ट्री की जानकारी दी गई है; Vikram-1 रॉकेट लॉन्च से जुड़ी खबर, जिसमें भारत के पहले प्राइवेट ऑर्बिटल-क्लास रॉकेट की जानकारी दी गई है; और Optical Computing, जिसमें बताया गया है कि रोशनी से डेटा प्रोसेसिंग कैसे की जाती है।

उपरोक्त जानकारी गूगल और विभिन्न वेबसाइट/समाचार माध्यमों से ली गई है। सटीकता की गारंटी नहीं है।

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