ये वीर सिर से पैर तक लहू-लुहान था, सीनियर्स द्वारा पीछे हटने का ऑर्डर मिला, मगर फिर भी इन्होंने पीछे हटने से इनकार कर दिया। घायल होने के बावजूद भी इस वीर ने दुश्मन के 60 टैंको को ध्वस्त कर दिया और पाकिस्तान की सीमा में 35 किलोमीटर अंदर घुसकर दुश्मनों को चुन चुन कर मौत के घाट उतारा।

इस वीर का नाम है Ardeshir Berjari Tarapore 18 अगस्त 1923 को मुंबई में जन्में तारापोर के पूर्वज छत्रपति शिवाजी महाराज की सेना का हिस्सा रहे। तारापोर के खून में ही देशभक्ति और बहादुरी थी, बचपन में उन्होंने गाय के हमले से अपनी बहन को बचाया था। तारापोर पढ़ाई, मुक्केबाज़ी, टेनिस, क्रिकेट और तैराकी में सबसे आगे थे, इसी वजह से उन्हें उनके शिक्षकों द्वारा भी काफी पसंद किया जाता था। इसके बाद तारापोर को उनेक माता पिता ने आगे की पढ़ाई के लिए पुणे के एक बोर्डिग स्कूल भेज दिया। इसी दौरान तारापोर ने मन बना लिया था कि वह सेना में भर्ती होंगे और उनका ये सपना पूरा हुआ 1940 में। गोलकोंडा से सैन्य प्रशिक्षण लेने के बाद उन्हें 7वीं हैदराबाद इन्फ़ैन्ट्री में सेकंड लेफ़्टिनेट के पद पर तैनाती मिली और साल 1951 तक वह इसका हिस्सा रहे। इसके बाद 1965 में तारापोर लेफ़्टिनेंट कर्नल के पद तक पहुंच चुके थे और इस दौरान वे पूना हॉर्स रेजिमेंट की कमान संभाल रहे थे। 1965 ही वो वर्ष था जब भारत- पाकिस्तान के बीच युद्ध छिड़ा था।

11 सितंबर 1965 को कमांडिंग ऑफिसर तारापोर की पूना हॉर्स रेजिमेंट को चविंडा की लड़ाई के दौरान सियालकोट सेक्टर में फिल्लौर जीतने का आदेश मिला। इसके बाद तारापोर अपनी सैन्य टुकड़ी के साथ आगे बढ़ ही रहे थे कि तभी पाकिस्तानियों ने वजीराली क्षेत्र के आसपास अमेरिका द्वारा दिए गए पैटन टैंकों से हमला बोल दिया। इस हमले में तारापोर बुरी तरह घायल हो गए थे, जिसके बाद सीनियर्स द्वारा उन्हें इलाज के लिए वापस आने के लिए कहा गया, मगर वीर तारापोर ने रणभूमि छोड़ वापस आने से इंकार कर दिया, वे रणभूमि में चट्टान की तरह अडिग रहे और दुश्मन को ऐसी मात दी की 13 सितंबर को तारापोर और उनकी तुकड़ी ने वजीराली पर भारत का तिरंगा फहरा दिया, जिसके बाद उनका अगला लक्ष्य था चाविंडा। जिसे तारापोर और उनकी सैन्य टुकड़ी ने योजनाबद्ध तरीके से हांसिल कर लिया और एक बार फिर से तारापोर दुश्मन सेना को पीछे खदेड़ने में कामयाब हो गए।

लगातार दो बार शिकस्त मिलने के बाद अब दुश्मन सेना बौखला गई थी। जिसके बाद पाकिस्तानी सेना ने और ज्यादा अमेरिकी पैटन टैंक युद्धभूमि में उतार दिए और इसके लिए तारापोर और उनकी सैन्य टुकड़ी पूरी तरह तैयार थी। जैसे ही पाकिस्तान की ओर से हमला हुआ वैसे ही हमारे भारतीय वीरों ने भी दुश्मन के टैंकों को नष्ट करना शुरू कर दिया। अब तारापोर की मदद के लिए भारतीय सेना के 42 टैंक पहुंचने ही वाले थे कि उससे पहले ही तारापोर ने पाकिस्तान के 60 टैंकों को तबाह कर दिया। इसके बाद तारापोर अगले टैंक को ध्वस्थ करने के लिए आगे बढ़ ही रहे थे कि तभी तारापोर के ऊपर एक गोला आकर गिरा और वो मातृभूमि की रक्षा करते हुए शहीद हो गए।

फिल्लौर पर भारतीय तिरंगा फहराने से पहले ही तारापोर इस दुनिया को छोड़कर चले गए, मगर उनकी सैन्य टुकड़ी ने तारापोर का सपना पूरा किया और दुश्मनों को चुन चुन कर मौत के घाट उतारने के बाद फिल्लौर पर भारतीय तिरंगा फहराया। भारतीय सेना को फिल्लौर में मिली इस जीत का काफी हद तक श्रेय तारापोर को ही जाता है। जिस बहादुरी से तारापोर ने दुश्मन के 60 टैंकों को तबाह किया उसको देखते हुए मरणोपरांत उन्हें परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।